क्या चुनावी जीत का उन्मादी जश्न स्वस्थ लोकतांत्रिक संस्कृति का प्रतीक है?
क्या चुनावी जीत का उन्मादी जश्न स्वस्थ लोकतांत्रिक संस्कृति का प्रतीक है?
चुनाव में जीत और हार लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। जनता अपने मताधिकार का प्रयोग करती है और उसके आधार पर सरकारें बनती-बिगड़ती हैं। लेकिन एक गंभीर प्रश्न यह है कि क्या चुनाव परिणाम आने के बाद सड़कों पर अत्यधिक शोर-शराबा, नाच-गाना, शक्ति प्रदर्शन और विरोधियों का उपहास करना हमारी लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक परिपक्वता का परिचायक है?
खुशी व्यक्त करना स्वाभाविक है। किसी दल या प्रत्याशी की जीत पर समर्थकों का प्रसन्न होना भी असामान्य नहीं है। किंतु जब यह खुशी संयम छोड़कर उन्माद का रूप लेने लगे, तब यह विचार का विषय बन जाती है। लोकतंत्र में चुनाव कोई युद्ध नहीं होता, न ही विजेता शत्रु पर विजय प्राप्त करता है। लोकतंत्र में सभी नागरिक एक ही राष्ट्र के अंग हैं और चुनाव के बाद भी सभी के अधिकार, सम्मान और कर्तव्य समान रहते हैं।
यह भी विचारणीय है कि क्या एक जागरूक, शिक्षित और सभ्य समाज की पहचान केवल अपनी राजनीतिक पसंद की जीत पर सार्वजनिक प्रदर्शन करना है, या फिर वह समाज चुनाव परिणाम को विनम्रता से स्वीकार करते हुए विजयी प्रतिनिधि से उसके वादों और उत्तरदायित्वों का पालन करवाने पर अधिक ध्यान देता है?
लोकतंत्र का उद्देश्य किसी दल की विजय नहीं, बल्कि राष्ट्रहित, सुशासन, जनकल्याण और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा है। यदि चुनाव परिणाम के बाद नागरिकों की ऊर्जा केवल जश्न, नारेबाजी और शक्ति प्रदर्शन में खर्च हो जाए, तो लोकतंत्र का मूल उद्देश्य पीछे छूट सकता है।
एक परिपक्व लोकतांत्रिक संस्कृति में जीत के साथ विनम्रता, हार के साथ गरिमा, और दोनों पक्षों में राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की भावना अपेक्षित होती है। चुनाव परिणाम एक राजनीतिक घटना है; उसे सामाजिक विभाजन या उन्माद का माध्यम नहीं बनना चाहिए।
बहस का प्रश्न यही है:
क्या चुनावी जीत का अत्यधिक सार्वजनिक प्रदर्शन लोकतांत्रिक उत्सव है, या यह राजनीतिक उन्माद की अभिव्यक्ति है? और क्या भारत जैसे लोकतंत्र में अब ऐसी राजनीतिक संस्कृति विकसित करने की आवश्यकता है, जहाँ उत्सव से अधिक महत्व जनसेवा, उत्तरदायित्व और राष्ट्रहित को दिया जाए?
आलेख –
Dharmendra Sundesha
