देश के विश्वविद्यालयों में हजारों पद रिक्त: क्या उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ रहा है गंभीर प्रभाव?
देश के विश्वविद्यालयों में हजारों पद रिक्त: क्या उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ रहा है गंभीर प्रभाव?
भारत नई शिक्षा नीति, शोध, नवाचार और विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों की दिशा में आगे बढ़ने का दावा कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर देश के अनेक विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकीय एवं अशैक्षणिक पदों की हजारों रिक्तियां आज भी चिंता का विषय बनी हुई हैं। इन रिक्तियों का सीधा प्रभाव शिक्षा की गुणवत्ता, शोध कार्य, विश्वविद्यालय प्रशासन तथा विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ रहा है।
संसद में प्रस्तुत विभिन्न सरकारी उत्तरों से स्पष्ट होता है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों सहित अनेक उच्च शिक्षण संस्थानों में बड़ी संख्या में स्वीकृत पद रिक्त हैं। सरकार समय-समय पर मिशन मोड में भर्ती अभियान चलाने की बात करती रही है, फिर भी अनेक संस्थानों में नियमित नियुक्तियों की प्रक्रिया अपेक्षित गति से पूरी नहीं हो सकी है। इसके परिणामस्वरूप कई विश्वविद्यालयों में अतिथि एवं संविदा शिक्षकों पर निर्भरता बढ़ी है।
समस्या केवल शिक्षकों तक सीमित नहीं है। अनेक विश्वविद्यालयों में सहायक कुलसचिव (Assistant Registrar), अनुभाग अधिकारी, परीक्षा शाखा, वित्त, पुस्तकालय, प्रयोगशाला तथा अन्य प्रशासनिक पद भी लंबे समय से रिक्त हैं। इसका प्रभाव परीक्षा परिणामों, छात्र सेवाओं, शोध परियोजनाओं और विश्वविद्यालयों के दैनिक प्रशासन पर भी दिखाई देता है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि रिक्त पदों का सबसे बड़ा नुकसान विद्यार्थियों को उठाना पड़ता है। नियमित शिक्षकों की कमी से कक्षाओं का संचालन प्रभावित होता है, शोध निर्देशन सीमित हो जाता है, प्रयोगशालाओं और शैक्षणिक संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं हो पाता तथा विश्वविद्यालयों की राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग पर भी असर पड़ता है। उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट का यह एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है।
उच्च शिक्षा में आरक्षण व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर भी समय-समय पर प्रश्न उठते रहे हैं। संसद में सरकार ने बताया है कि शिक्षकों के कैडर में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए आरक्षण लागू है। इसके बावजूद विभिन्न छात्र संगठनों, शिक्षक संगठनों तथा सामाजिक संगठनों का कहना है कि आरक्षित वर्गों, विशेषकर OBC वर्ग के अनेक पद लंबे समय तक रिक्त रहते हैं और भर्ती प्रक्रियाओं में विलंब होता है। इस विषय पर समय-समय पर विरोध प्रदर्शन और ज्ञापन भी दिए जाते रहे हैं।
उपलब्ध संसदीय आंकड़ों के अनुसार केवल केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ही हजारों शिक्षकीय पद रिक्त हैं, जिनमें OBC, SC, ST तथा EWS वर्गों के आरक्षित पद भी शामिल हैं। हालांकि पूरे देश के सभी केंद्रीय, राज्य, निजी, तकनीकी तथा मुक्त विश्वविद्यालयों के शिक्षकीय एवं अशैक्षणिक रिक्त पदों का कोई एकीकृत और अद्यतन राष्ट्रीय आंकड़ा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए इस विषय पर व्यापक और पारदर्शी राष्ट्रीय डाटाबेस तैयार किए जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
भर्ती प्रक्रियाओं में विलंब के पीछे सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन विभिन्न कारण बताते हैं। इनमें वित्तीय स्वीकृतियों में देरी, न्यायालयों में लंबित मामले, आरक्षण रोस्टर का पुनर्निर्धारण, चयन समितियों के गठन में विलंब तथा प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता प्रमुख हैं। दूसरी ओर अभ्यर्थियों और शिक्षक संगठनों का कहना है कि यदि समयबद्ध भर्ती व्यवस्था लागू की जाए तो अधिकांश रिक्तियां वर्षों तक लंबित नहीं रहेंगी।
वर्तमान में ऐसा कोई सामान्य केंद्रीय कानूनी प्रावधान नहीं है जो सभी विश्वविद्यालयों को प्रत्येक रिक्त पद निश्चित समय-सीमा में भरने के लिए बाध्य करता हो। अधिकांश विश्वविद्यालय अपने अधिनियम, सेवा नियमों तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के दिशा-निर्देशों के अनुसार भर्ती प्रक्रिया संचालित करते हैं। यही कारण है कि कई स्थानों पर वर्षों तक नियमित नियुक्तियां नहीं हो पातीं।
उच्च शिक्षा के नियामक ढांचे में सुधार की दिशा में भी केंद्र सरकार विभिन्न पहल कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नई नीतियां बनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि रिक्त पदों को समयबद्ध तरीके से भरना, पारदर्शी चयन प्रक्रिया अपनाना और विश्वविद्यालयों को पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराना भी उतना ही आवश्यक है।
भारत यदि ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था और वैश्विक शिक्षा केंद्र बनने का लक्ष्य प्राप्त करना चाहता है, तो विश्वविद्यालयों में रिक्त पड़े शिक्षकीय एवं अशैक्षणिक पदों को शीघ्र भरना राष्ट्रीय प्राथमिकता बननी चाहिए। गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा का आधार केवल आधुनिक पाठ्यक्रम या नई शिक्षा नीति नहीं, बल्कि पर्याप्त संख्या में योग्य शिक्षक, सक्षम प्रशासनिक व्यवस्था और नियमित भर्ती प्रक्रिया है। लाखों विद्यार्थियों के भविष्य और देश की ज्ञान-सम्पदा को मजबूत करने के लिए इस दिशा में ठोस और समयबद्ध कदम उठाना समय की आवश्यकता है।
