AI सहायक हो सकता है, निर्णायक नहीं: सर्वोच्च न्यायालय
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने Vijay Ghanshyam Gadiya v. Union of India & Another, 2026 INSC 947 में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के न्यायिक तथा अर्ध-न्यायिक उपयोग पर अत्यंत महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने कहा—
“AI may well serve as training wheels but entrusting it with the pilot’s seat would be both imprudent and dangerous.”
इसका सरल भावार्थ है—AI सीखने, शोध करने और काम को गति देने वाले सहायक पहियों की भूमिका निभा सकता है, लेकिन निर्णय की पूरी कमान उसे सौंपना अविवेकपूर्ण और खतरनाक होगा।
प्रकरण की पृष्ठभूमि
अतिरिक्त सीमा-शुल्क आयुक्त, सूरत ने 8 अक्टूबर 2025 को विजय घनश्याम गड़िया के विरुद्ध सीमा-शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 114 के अंतर्गत ₹425,27,99,100, यानी लगभग ₹425.28 करोड़ का दंड लगाया था।
आरोप था कि प्राकृतिक हीरों की एक खेप को कम सीमा-शुल्क दर का लाभ लेने के लिए प्रयोगशाला में निर्मित हीरों—Lab-grown Diamonds—के रूप में गलत घोषित किया गया।
व्यापारी ने इस आदेश को गुजरात उच्च न्यायालय में चुनौती दी, लेकिन उच्च न्यायालय ने 20 जनवरी 2026 को उसकी चुनौती खारिज कर दी। इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा।
सर्वोच्च न्यायालय के सामने मुख्य प्रश्न
सर्वोच्च न्यायालय ने हीरों की वास्तविक प्रकृति, गलत घोषणा अथवा दंड की राशि के गुण-दोष पर विचार करना आवश्यक नहीं समझा। अपीलकर्ता की ओर से उससे भी गंभीर प्रश्न उठाया गया था—सीमा-शुल्क अधिकारी ने अपने आदेश में जिन निर्णयों और कानूनी लेखों का उल्लेख किया था, उनमें से कई सामग्री कथित रूप से AI द्वारा तैयार की गई थी।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस आरोप को केवल वकील के कथन के आधार पर स्वीकार नहीं किया। पीठ ने संबंधित निर्णयों और लेखों की अलग-अलग जाँच की। जाँच में सामने आया कि—
कुछ उद्धृत न्यायिक निर्णय अस्तित्व में ही नहीं थे।
कुछ के citation अर्थात संदर्भ काल्पनिक या गलत थे।
कुछ निर्णय वास्तव में मौजूद थे, लेकिन उनमें वह कानूनी सिद्धांत नहीं दिया गया था जो सीमा-शुल्क अधिकारी ने अपने आदेश में उनसे निकाला था।
न्यायालय के अनुसार यह स्थिति AI hallucination प्रतीत होती थी।
AI hallucination का अर्थ ऐसी सामग्री से है जिसे AI अत्यंत विश्वासपूर्ण और प्रामाणिक दिखने वाले ढंग से प्रस्तुत करता है, लेकिन तथ्यतः वह सामग्री काल्पनिक, गलत अथवा भ्रामक होती है।
न्यायालय के उद्धरण का वास्तविक अर्थ
“Training wheels” से आशय बच्चों की साइकिल में लगाए जाने वाले सहायक पहियों से है। वे संतुलन बनाने और सीखने में सहायता करते हैं, लेकिन साइकिल चलाने वाले व्यक्ति का स्थान नहीं लेते।
इसी प्रकार न्यायालय ने AI की स्वीकार्य भूमिका बताई—
कानूनी शोध को तेज करना;
दस्तावेजों को व्यवस्थित करना;
प्रासंगिक विषयों अथवा संभावित निर्णयों की पहचान करना;
प्रारंभिक मसौदा या सार तैयार करने में सहायता करना।
लेकिन “pilot’s seat” अर्थात निर्णय की चालक सीट मनुष्य—न्यायाधीश, न्यायिक अधिकारी या वैधानिक प्राधिकारी—के पास ही रहनी चाहिए। कारण यह है कि न्याय-निर्णयन में केवल सूचना एकत्र करना पर्याप्त नहीं होता। उसमें तथ्यों का परीक्षण, पक्षकारों को सुनना, साक्ष्यों की विश्वसनीयता, कानून की सही व्याख्या, प्राकृतिक न्याय और निर्णय के मानवीय परिणामों का मूल्यांकन भी शामिल होता है।
इसीलिए न्यायालय ने उद्धरण से ठीक पहले यह भी कहा—
“Assistance can never be substituted for adjudication.”
अर्थात सहायता को कभी भी न्याय-निर्णयन का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
पूर्व निर्णय में घोषित ‘जीरो टॉलरेंस’ सिद्धांत
पीठ ने Pooja Ramesh Singh v. Jammu & Kashmir Bank Ltd., 2026 SCC OnLine SC 1258 का उल्लेख किया। उस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि बिना सत्यापन के AI-जनित न्यायिक मिसाल प्रस्तुत करने, उद्धृत करने या उस पर भरोसा करने के प्रति न्यायालयों को “जीरो टॉलरेंस” अपनाना चाहिए।
उस सिद्धांत के अनुसार—
अधिवक्ता द्वारा काल्पनिक निर्णय उद्धृत करना पेशेवर कदाचार हो सकता है।
न्यायाधीश या निर्णय देने वाले अधिकारी द्वारा ऐसी सामग्री पर भरोसा करना गंभीर त्रुटि है।
AI-जनित नकली सामग्री का थोड़ा-सा हिस्सा भी निर्णय-प्रक्रिया में प्रवेश कर जाए तो वह न्याय-निर्णयन की पवित्रता और विश्वसनीयता को प्रभावित करता है।
ऐसा निर्णय कानून की दृष्टि में वैध निर्णय नहीं माना जा सकता।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि आपत्ति AI के प्रत्येक उपयोग पर नहीं है। आपत्ति काल्पनिक या असत्यापित सामग्री को वास्तविक न्यायिक मिसाल मानकर उपयोग करने पर है।
सर्वोच्च न्यायालय ने क्या आदेश दिया?
सर्वोच्च न्यायालय ने लगभग ₹425.28 करोड़ का सीमा-शुल्क दंड लगाने वाला मूल आदेश तथा उसे कायम रखने वाला गुजरात उच्च न्यायालय का आदेश—दोनों रद्द कर दिए।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि न्यायालय ने व्यापारी को आरोपों से निर्दोष घोषित कर दिया या सीमा-शुल्क विवाद हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। न्यायालय ने कार्यवाही को पुनर्जीवित करके नए सिरे से निर्णय देने का निर्देश दिया है। यह निर्णय उसी स्तर का कोई दूसरा अधिकारी करेगा; वह अधिकारी नहीं जिसने 8 अक्टूबर 2025 का दोषपूर्ण आदेश दिया था।
सर्वोच्च न्यायालय ने नियुक्ति प्राधिकारी को यह स्वतंत्रता भी दी कि वह मूल आदेश लिखने वाले अधिकारी के विरुद्ध परिस्थितियों के अनुसार और कानून के अंतर्गत उचित कार्रवाई पर विचार कर सकता है। यह कार्रवाई अनिवार्य रूप से करने का सीधा आदेश नहीं है; निर्णय नियुक्ति प्राधिकारी के विवेक पर छोड़ा गया है।
निर्णय का व्यापक महत्त्व
यह निर्णय केवल सीमा-शुल्क अथवा हीरे के व्यापार तक सीमित नहीं है। इसका संदेश न्यायालयों, न्यायाधिकरणों, कर अधिकारियों, विभागीय अपीलीय प्राधिकारियों और अन्य अर्ध-न्यायिक संस्थाओं के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण है।
किसी सरकारी आदेश में भारी दंड, कर-देयता अथवा नागरिक अधिकारों पर प्रभाव डालने वाले निष्कर्ष केवल ऐसी सामग्री के आधार पर नहीं दिए जा सकते जिसकी प्रामाणिकता जाँची ही न गई हो। AI से सामग्री प्राप्त करने वाला अधिकारी अंततः स्वयं यह सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी रहेगा कि—
उद्धृत निर्णय वास्तव में मौजूद है;
उसका नाम और citation सही है;
निर्णय में वास्तव में वही सिद्धांत दिया गया है;
वह निर्णय वर्तमान मामले पर लागू होता है;
उसे बाद में पलटा या अप्रभावी नहीं किया गया है।
इस फैसले का केंद्रीय संदेश साफ है: तकनीक न्याय-व्यवस्था की गति बढ़ा सकती है, लेकिन सत्यापन, विवेक और उत्तरदायित्व का स्थान नहीं ले सकती। न्यायिक निर्णय का लेखक मनुष्य है और निर्णय की शुद्धता की अंतिम जिम्मेदारी भी उसी की रहेगी।
सर्वोच्च न्यायालय का आधिकारिक आदेश—2 सितंबर 2026
