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मंदिरों में दान घोटाले: आस्था की रक्षा का समय

प्रकाशित: 6 August 2026, 7:19 am अपडेट: 12 August 2026, 6:00 am

मंदिरों में दान घोटाले: आस्था की रक्षा का समय

धार्मिक स्थलों पर दिया जाने वाला दान केवल धन नहीं होता, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, विश्वास और लोककल्याण की भावना का प्रतीक होता है। मंदिरों में चढ़ाया गया प्रत्येक रुपया इस विश्वास के साथ अर्पित किया जाता है कि उसका उपयोग धर्म, सेवा, शिक्षा, चिकित्सा, अन्नक्षेत्र और जनहित के कार्यों में होगा। इसलिए जब किसी धार्मिक संस्था में दान, चढ़ावे या संपत्ति के प्रबंधन को लेकर अनियमितताओं, चोरी या गबन के आरोप सामने आते हैं, तो सबसे बड़ी चोट श्रद्धालुओं की भावनाओं पर पड़ती है।

हाल के वर्षों में मुंबई के श्री सिद्धिविनायक मंदिर, अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर तथा तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् (TTD) जैसे प्रतिष्ठित धार्मिक संस्थानों में दान प्रबंधन से जुड़े विवाद और जांच सार्वजनिक चर्चा का विषय बने हैं। इसी प्रकार विभिन्न राज्यों में वक्फ बोर्डों और अन्य धार्मिक ट्रस्टों की संपत्तियों एवं वित्तीय प्रबंधन को लेकर भी समय-समय पर जांच और न्यायालयीन हस्तक्षेप हुए हैं। इन घटनाओं का उद्देश्य किसी धर्म या संस्था को कटघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि जहाँ श्रद्धालुओं का धन जुड़ा हो, वहाँ पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि अनेक मामलों में जांच अभी जारी है और अंतिम निष्कर्ष सक्षम न्यायालय अथवा जांच एजेंसियाँ ही तय करती हैं।

इस विषय का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि धार्मिक दान को केवल धार्मिक अनुष्ठानों या भवन निर्माण तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। जिस मंदिर की जितनी आय और जितना प्रभाव क्षेत्र हो, उसी अनुपात में उसका सामाजिक दायित्व भी होना चाहिए। छोटा मंदिर अपने गांव, वार्ड या आसपास की बस्तियों की स्वच्छता, गरीब विद्यार्थियों की शिक्षा, जरूरतमंद परिवारों की सहायता और चिकित्सा सहयोग का केंद्र बन सकता है। बड़े मंदिर अपने आसपास के अनेक गांवों, कस्बों या शहरों में स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, पौधारोपण, छात्रवृत्ति, अस्पताल, अन्नक्षेत्र, गौसेवा, रक्तदान, कौशल विकास और जनकल्याण जैसे स्थायी कार्यक्रम चला सकते हैं।

धार्मिक संस्थानों को चाहिए कि वे अनावश्यक दिखावे और गैर-जरूरी खर्चों को सीमित करते हुए दान राशि का अधिकाधिक उपयोग समाजोपयोगी कार्यों में करें। इससे श्रद्धालुओं का विश्वास भी बढ़ेगा और धर्मस्थल वास्तव में समाज निर्माण के केंद्र बनेंगे।

साथ ही, सभी बड़े धार्मिक संस्थानों में स्वतंत्र वार्षिक ऑडिट, सामाजिक लेखा-परीक्षण (Social Audit), आय-व्यय का सार्वजनिक प्रकाशन, डिजिटल दान व्यवस्था, सीसीटीवी निगरानी, दान की पारदर्शी गणना तथा नागरिक सहभागिता वाली प्रबंधन प्रणाली को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। पारदर्शिता केवल अनियमितताओं को रोकने का माध्यम नहीं, बल्कि ईमानदारी से कार्य कर रहे धार्मिक संस्थानों की प्रतिष्ठा को भी मजबूत करती है।

धर्म का उद्देश्य केवल पूजा-अर्चना नहीं, बल्कि लोककल्याण भी है। श्रद्धालुओं की आस्था से प्राप्त प्रत्येक दान समाज के विकास, सेवा और मानव कल्याण का माध्यम बने—यही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।