मतपत्र की मांग के साथ गैर-नागरिकों के अवैध मतदान का विरोध भी जरूरी
लोकतंत्र में विश्वास का प्रश्न केवल मतदान मशीन तक सीमित नहीं है। उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि मतदान करने वाला व्यक्ति उस अधिकार का पात्र है या नहीं। भारत की सरकार चुनने का अधिकार भारतीय नागरिकों का है। किसी गैर-नागरिक ने फर्जी दस्तावेजों से मतदाता पहचान पत्र बनवा लिया हो या निर्वाचक नामावली में नाम जुड़वा लिया हो, तो उसकी निष्पक्ष जाँच और कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 भी गैर-भारतीय नागरिक को मतदाता सूची में पंजीकरण के अयोग्य ठहराती है।
इस मामले में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को भी स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए। सरकार यदि प्रमाणों के आधार पर गैर-नागरिकों के अवैध पंजीकरण की पहचान करती है, तो उस प्रक्रिया का समर्थन होना चाहिए। किसी दल को अपने संभावित वोटों के लाभ के लिए अपात्र व्यक्ति का बचाव नहीं करना चाहिए। फर्जी दस्तावेज बनाने वाले, बनवाने वाले और जानबूझकर गलत पंजीकरण में सहायता करने वाले लोगों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
जहाँ नागरिकता पर ठोस और विशिष्ट संदेह हो, वहाँ संबंधित व्यक्ति को आरोप का आधार बताया जाए और कानून के अनुसार अपनी नागरिकता संबंधी साक्ष्य प्रस्तुत करने तथा सुनवाई का उचित अवसर मिले। निर्णय पारदर्शी हो और उसे चुनौती देने का उपलब्ध कानूनी अवसर भी मिले। केवल राजनीतिक आरोप, धर्म, भाषा, पहनावे या गरीबी को किसी के विदेशी होने का प्रमाण नहीं बनाया जा सकता।
जाँच में गैर-नागरिक होना स्थापित होने पर मतदाता सूची से नाम हटाया जाए। यदि उसका भारत में प्रवेश या निवास भी अवैध पाया जाए, तो लागू कानून और आवश्यक प्रक्रिया के अनुसार निष्कासन की कार्रवाई हो। मतदान की पात्रता और देश में रहने की वैध अनुमति अलग प्रश्न हैं: विदेशी नागरिक को मताधिकार नहीं होता, लेकिन वह वैध वीजा या अन्य अनुमति से भारत में रह सकता है। इसी तरह, कोई दस्तावेज तत्काल प्रस्तुत न कर पाना अपने आप किसी भारतीय नागरिक को विदेशी घोषित करने का पर्याप्त आधार नहीं होना चाहिए।
देश के नागरिकों की सुरक्षा, रोजगार के अवसर, संसाधन और भविष्य की रक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। अवैध प्रवेश और दस्तावेजी फर्जीवाड़े पर कार्रवाई इस जिम्मेदारी का हिस्सा है। लेकिन किसी पूरे समुदाय को अशांति फैलाने वाला या देश के प्रति निष्ठाहीन मान लेना निष्पक्ष जाँच का स्थान नहीं ले सकता। नागरिकता का निर्णय कानून और साक्ष्य से होना चाहिए, राजनीतिक निष्ठा की परीक्षा से नहीं।
हमारा आग्रह दोनों पक्षों से है। सत्तापक्ष मतपत्र आधारित चुनाव की मांग को जनता का विश्वास बहाल करने के प्रश्न के रूप में स्वीकार करे। विपक्ष गैर-नागरिकों के अवैध मतदान को रोकने की निष्पक्ष, प्रमाण आधारित कार्रवाई का समर्थन करे। दोनों विषयों को सौदेबाजी की शर्त बनाने की जरूरत नहीं है; दोनों अपने आप में लोकतंत्र की बुनियादी जिम्मेदारियाँ हैं।
न कोई गैर-नागरिक अवैध रूप से भारत का मतदाता बने, न किसी पात्र भारतीय का मताधिकार गलत तरीके से छीना जाए। और प्रत्येक वैध मतदाता को विश्वास हो कि उसका वोट सही दर्ज हुआ तथा सही गिना गया। यही लोकतंत्र, नागरिक अधिकार और राष्ट्रहित की साझा कसौटी होनी चाहिए।
