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जनमुद्दे - बहस

पढ़ाई में क्या धरा है भाई!(एक व्यंग्यात्मक कविता)

प्रकाशित: 22 September 2026, 11:58 am

समाज-सेवा धर्म है भाई,

पढ़ाई में क्या धरा है ताई!

किताबों में सिर क्यों खपाएं,

जब राजनीति दे मलाई!

लोगों के घर आना-जाना,

तीज-त्योहारों में मुस्काना,

रात-दिन चौपाल सजाना,

हर गप में अपना रंग जमाना।

सुख में माला, दुख में फोटो,

सेवा का हर दृश्य हो मोटा,

कैमरा आए, हाथ बढ़ाओ,

फिर सोशल मीडिया पर छा जाओ।

सच बोलेंगे थोड़ा-आधा,

झूठ रहेगा पूरा ज्यादा,

बड़े जनों की जय-जय करना,

छोटों का हक चुपके हरना।

डॉक्टर बनकर रातें काटूं?

इंजीनियर बन पुल बनवाऊं?

बाबू बनकर फाइलें ढोऊं?

क्यों मैं इतना श्रम उठाऊं?

वार्ड पार्षद बनना बेहतर,

उजला कुर्ता, रूप मनोहर,

गले में लाल दुपट्टा डालूं,

सेवा-सेवा ढोल बजाऊं!

क्यों किसी दल का मैं पट्टा

अपने गले में आज लगाऊं?

निर्दलीय बनकर आऊंगा,

हर दल से सौदा करवाऊंगा!

पूछो तो—निर्दलीय कौन है?

जिसका कोई सिद्धांत नहीं है,

छुट्टा घूमे, छुट्टा कमाए,

जिससे लाभ मिले, वहीं झुक जाए!

सबसे उसका गहरा नाता,

सबसे मिलता, सबको भाता,

जहां अधिक कुछ माल मिलेगा,

वहीं खड़ा वह ढाल बनेगा!

कभी इधर और कभी उधर है,

भाव जिधर हो, कदम उधर है,

दल वाले बंध जाते दल में,

निर्दलीय का खुला महल है!

सुना है कीमत पचास लाख है,

कहीं साठ की भी कुछ बात है,

बड़े चुनावों में बड़े ही भाव,

दो-दो करोड़ की सौगात है!

एक मेरा मत, छोटा-सा मत,

सत्ता में रखता पूरा दम,

बोली ऊंची लग जाए जिस दिन,

लोकतंत्र हो जाए नीलाम!

आज इधर हूं, कल उस दल में,

परसों बैठूं सत्ता-बल में,

विचारधारा रख दो कोने,

माल पड़े बस अपने झोले!

पट्टा कोई बनवाना चाहे,

चरणों में ही दौड़ा आए,

नक्शा, नाली, सड़क, सफाई,

हर काम में अपनी कमाई,

थोड़ी मिट्टी, थोड़ा चूना,

सीमेंट में हिस्सा दूना,

लोहा यदि बच जाए कहीं तो,

जनता का है—बेचूं क्यों ना!

कागज पर सड़कें चमकाऊं,

गड्ढों में फिर काम लगाऊं,

टेंडर बोले—सेवा मेरी,

कमीशन बोले—मेहनत मेरी!

बाजारों में मंच लगवाऊं,

अपने नाम के नारे लगवाऊं,

महापुरुष की फोटो पीछे,

अपना चेहरा आगे लाऊं!

झंडा भी मैं ही फहराऊं,

माला पहले मैं पहन पाऊं,

भाषण में विकास गिनाऊं,

फिर बिल बनाकर घर को जाऊं!

जनता पूछे—काम कहां है?

कह दूंगा—षड्यंत्र यहां है!

पांच बरस जो प्रश्न उठाए,

उसको विरोधी दल बतलाएं!

विद्यालय में शिक्षक कम हों,

अस्पताल में कमरे नम हों,

मुझको उससे क्या लेना है,

बस मेरा भाषण उत्तम हो!

इसलिए बच्चों, मत पढ़ना,

मेहनत की सीढ़ी मत चढ़ना,

बस अवसर की राह निहारो,

नेताओं के जयकारे मारो!

एक अवसर यदि हाथ लगा तो,

सूखा जीवन हरा-भरा हो,

एक मत की कीमत मिल जाए,

सात पीढ़ियों का भला हो!

सुबह किसी के जन्मदिन पर,

शाम किसी के अभिनंदन पर,

रात कहीं पर भोज उड़ाऊं,

सुबह नई तस्वीर लगाऊं!

हार किसी की, माला मेरी,

जीत किसी की, चर्चा मेरी,

काम किसी का, फीता मेरा,

यही दिखावटी सेवा का फेरा!

समाज-सेवा धर्म है भाई,

पढ़ाई में क्या धरा है ताई!

किताबों में सिर क्यों खपाएं,

जब राजनीति दे मलाई!