नितिन सोलंकी का आदेश जारी होने के बाद क्यों बदला प्रत्याशी? भाजपा की चूक और कांग्रेस को नई जिम्मेदारी
जालोर
जालोर नगर परिषद के सभापति चुनाव में कांग्रेस के बंशीलाल माली ने भाजपा प्रत्याशी जयसिंह को 23 के मुकाबले 17 मतों से पराजित कर दिया। छह मतों से मिली इस जीत के साथ नगर परिषद में कांग्रेस का बोर्ड बन गया। नगर परिषद के 40 पार्षदों में कांग्रेस के 19, भाजपा के 14 और सात निर्दलीय निर्वाचित हुए थे। किसी भी दल के पास अपने स्तर पर स्पष्ट बहुमत नहीं था, इसलिए सभापति का चुनाव पूरी तरह राजनीतिक रणनीति, सामाजिक समीकरण और निर्दलीय पार्षदों के समर्थन पर निर्भर था।
परिणाम का सीधा गणित बताता है कि कांग्रेस प्रत्याशी बंशीलाल माली को अपने 19 पार्षदों के अतिरिक्त चार मत मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी जयसिंह अपने दल के 14 पार्षदों से आगे केवल तीन मत ही जुटा सके। लेकिन यह चुनाव केवल छह मतों से हुई हार-जीत नहीं है। इसके पीछे भाजपा द्वारा अंतिम समय में बदले गए प्रत्याशी और उस निर्णय के राजनीतिक परिणामों की पूरी कहानी छिपी है।
आदेश नितिन सोलंकी के नाम जारी हुआ, नामांकन जयसिंह ने भरा
यह केवल राजनीतिक चर्चा या संभावना नहीं थी कि भाजपा नितिन सोलंकी को सभापति प्रत्याशी बनाने जा रही है। राजस्थान भाजपा मुख्यालय से पार्टी के अधिकृत पदाधिकारी श्रवण सिंह बघरी के हस्ताक्षर से नितिन सोलंकी को जालोर नगर परिषद के सभापति पद का अधिकृत प्रत्याशी बनाए जाने का आदेश जारी हो चुका था। यह आदेश मीडिया और समाचार-पत्रों के माध्यम से सार्वजनिक भी हो गया था।
इसके बावजूद सभापति पद के लिए नामांकन प्रस्तुत किए जाने के समय अचानक नितिन सोलंकी का नाम बदल दिया गया और भाजपा ने जयसिंह को अपना प्रत्याशी बना दिया। इसलिए अब प्रश्न यह नहीं है कि नितिन सोलंकी के नाम पर पार्टी में केवल विचार चल रहा था। असली प्रश्न यह है कि पार्टी मुख्यालय से विधिवत आदेश जारी हो जाने के बाद उसे बदलने की आवश्यकता क्यों पड़ी और यह निर्णय किसके कहने पर लिया गया?
जालोर विधायक एवं मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग की ऐसी क्या राजनीतिक मजबूरी थी कि उन्हें पार्टी मुख्यालय से जारी आदेश के बावजूद अंतिम समय में प्रत्याशी बदलना पड़ा? क्या कोई नया समीकरण सामने आया था? क्या भाजपा के पास जयसिंह के पक्ष में कोई ऐसी मजबूत आंतरिक रिपोर्ट थी, जो नितिन सोलंकी की सामाजिक स्वीकार्यता और सार्वजनिक छवि से अधिक प्रभावशाली थी? पार्टी को इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर देना चाहिए।
समाजसेवी और अनुभवी प्रशासक की छवि रखते हैं नितिन सोलंकी
नितिन सोलंकी की प्रमुख पहचान किसी बड़े भाजपा नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक समाजसेवी, भाजपा कार्यकर्ता और अच्छे प्रशासक के रूप में रही है। वे जालोर नागरिक सहकारी बैंक के निर्वाचित अध्यक्ष रह चुके हैं और वर्तमान में माली समाज सेवा संस्थान के अध्यक्ष हैं। सामाजिक संस्थाओं तथा सहकारिता क्षेत्र में काम करने के कारण शहर के विभिन्न वर्गों में उनका संपर्क और स्वीकार्यता रही है।
नगर परिषद चुनाव में भाजपा ने उन्हें वार्ड संख्या चार से प्रत्याशी बनाया और उन्होंने जीत दर्ज की। चुनाव से पहले प्रकाशित रिपोर्टों में भी उन्हें सभापति पद के प्रमुख दावेदारों में माना जा रहा था।
चुनाव-पूर्व रिपोर्टशहर में यह धारणा मजबूत थी कि नितिन सोलंकी को सभापति प्रत्याशी बनाने पर माली समाज का व्यापक और लगभग एकमत समर्थन उनके साथ आ सकता था। उनके सामाजिक संपर्क, प्रशासनिक अनुभव और अपेक्षाकृत स्वीकार्य छवि के कारण अन्य समाजों के कई लोग भी उन्हें सभापति के रूप में देखना चाहते थे।
भाजपा ने अपने मजबूत सामाजिक समीकरण को स्वयं कमजोर किया
जालोर नगर परिषद में माली समाज से 14 पार्षद निर्वाचित हुए। यह संख्या स्वयं बताती है कि सभापति के चुनाव में समाज की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण थी। ऐसे में भाजपा के पास नितिन सोलंकी के रूप में ऐसा चेहरा उपलब्ध था, जो सामाजिक प्रतिनिधित्व के साथ प्रशासनिक अनुभव और स्थानीय स्वीकार्यता भी रखता था।
यदि भाजपा नितिन सोलंकी को अधिकृत प्रत्याशी बनाए रखने के अपने मूल निर्णय पर कायम रहती, तो उनके पक्ष में भाजपा के पार्षदों के साथ माली समाज तथा कुछ निर्दलीय पार्षदों का समर्थन जुटने की अच्छी संभावना थी। कांग्रेस के भीतर भी माली समाज से ही सभापति बनाने की मांग कमजोर पड़ सकती थी, क्योंकि समाज की प्राथमिकता यह रहती कि उसका कोई योग्य और स्वीकार्य प्रतिनिधि सभापति बने।
यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि नितिन सोलंकी प्रत्याशी होते तो भाजपा की विजय हर हाल में तय थी। गुप्त मतदान में प्रत्येक पार्षद का निर्णय कई व्यक्तिगत, स्थानीय और राजनीतिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि सामाजिक गणित, प्रशासनिक अनुभव और सार्वजनिक स्वीकार्यता के आधार पर नितिन सोलंकी भाजपा के लिए अधिक मजबूत संभावना प्रस्तुत करते थे।
जयसिंह को चुनने का आधार क्या था?
इसके विपरीत जयसिंह के पक्ष में ऐसा कोई स्पष्ट सामाजिक, जातिगत या सार्वजनिक समीकरण दिखाई नहीं देता था, जो उन्हें भाजपा का स्वाभाविक और सर्वस्वीकार्य सभापति प्रत्याशी बनाता। उनकी स्थानीय लोकप्रियता तथा व्यापक सामाजिक आधार को लेकर भी प्रश्न थे।
पार्षद चुनाव के दौरान कुछ वार्डों और मतदान केंद्रों पर उनकी कार्यशैली को लेकर विरोध और शिकायतों की चर्चाएँ सामने आई थीं। उन पर मतदान प्रक्रिया में अनावश्यक हस्तक्षेप करने जैसे आरोप भी लगाए गए थे। पुलिस-प्रशासन या सत्ता के कथित सहयोग से संबंधित बातों की स्वतंत्र जाँच आवश्यक है, इसलिए उन्हें प्रमाणित तथ्य नहीं कहा जा सकता। लेकिन किसी प्रत्याशी को लेकर पहले से सार्वजनिक नाराजगी हो, तो पार्टी नेतृत्व का दायित्व था कि अंतिम निर्णय से पहले उसका गंभीरता से आकलन करता।
जब एक ओर नितिन सोलंकी के नाम से पार्टी का आदेश जारी हो चुका था और दूसरी ओर जयसिंह की स्वीकार्यता को लेकर प्रश्न मौजूद थे, तब अंतिम समय में प्रत्याशी बदलना भाजपा की ऐसी रणनीतिक चूक दिखाई देती है, जिसने पार्टी के लिए जीत की संभावनाओं को कमजोर कर दिया।
माली समाज के रुख पर भी रहेगी नजर
माली समाज लंबे समय से भाजपा और विधायक जोगेश्वर गर्ग का समर्थक रहा है। ऐसे में यह चुनाव समाज के सहयोग और समर्थन के प्रति राजनीतिक आभार व्यक्त करने का अवसर भी था। भाजपा नितिन सोलंकी को प्रत्याशी बनाकर समाज को सम्मानजनक प्रतिनिधित्व देने के साथ नगर परिषद में अपना बोर्ड बनाने का मजबूत प्रयास कर सकती थी।
अब जबकि भाजपा का मूल आदेश बदल दिया गया और कांग्रेस के बंशीलाल माली सभापति निर्वाचित हो गए हैं, आगे यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि माली समाज का भाजपा तथा जोगेश्वर गर्ग के प्रति क्या रुख रहता है। यदि समाज के भीतर यह धारणा बनती है कि पर्याप्त प्रतिनिधित्व और एक सक्षम दावेदार उपलब्ध होने के बावजूद उसके स्वीकार्य चेहरे की अनदेखी की गई, तो इसका राजनीतिक प्रभाव नगर परिषद तक सीमित नहीं रहेगा।
कांग्रेस के लिए जीत नहीं, जवाबदेही की शुरुआत
दूसरी ओर, बंशीलाल माली और कांग्रेस के लिए यह परिणाम केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं है। जालोर नगर परिषद में पिछले दो कार्यकाल से भाजपा का बोर्ड रहा है। अब सत्ता परिवर्तन के बाद शहरवासियों की आशाएँ और अपेक्षाएँ स्वाभाविक रूप से बढ़ेंगी।
सफाई व्यवस्था, टूटी सड़कें, नालियाँ, जल निकासी, पेयजल, सार्वजनिक प्रकाश व्यवस्था, अतिक्रमण, यातायात, नगर नियोजन और लंबित विकास कार्यों पर नए बोर्ड को ठोस परिणाम देने होंगे। कांग्रेस और सभापति यदि केवल राजनीतिक विजय तथा पद प्राप्ति में ही मशगूल हो गए और शहर की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया, तो पाँच वर्ष बाद जनता उनके सामने भी वही प्रश्न खड़े करेगी, जो आज भाजपा से पूछे जा रहे हैं।बंशीलाल माली को मिले 23 मत किसी एक चेहरे, दल या समाज की निजी जीत नहीं माने जाने चाहिए। यह परिणाम शहर के अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक वर्गों से बने जनादेश की अभिव्यक्ति है। इसलिए नए सभापति को राजनीतिक भेदभाव से ऊपर उठकर सभी 40 वार्डों और पूरे जालोर शहर के विकास के लिए काम करना होगा।
इस चुनाव ने भाजपा को आत्ममंथन का संदेश दिया है और कांग्रेस को जिम्मेदारी का अवसर। वास्तविक विजय उसी दिन मानी जाएगी, जब नगर परिषद की कार्यप्रणाली सुधरेगी, शहर की बुनियादी समस्याएँ कम होंगी और नागरिक स्वयं अनुभव करेंगे कि सत्ता परिवर्तन से जालोर में सकारात्मक बदलाव आया है।

