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राजस्थान में एसटी आरक्षण का बंटवारा: मीणा–भील प्रतिनिधित्व की बहस में आंकड़े क्या कहते हैं?

प्रकाशित: 18 September 2026, 6:24 am

धर्मेन्द सुन्देशा

हाईकोर्ट में भील समुदाय के लिए नौ प्रतिशत उप-आरक्षण की मांग; जनसंख्या लगभग बराबर, लेकिन आर्थिक और राजकीय प्रतिनिधित्व का जनजातिवार सरकारी डेटा उपलब्ध नहीं

राजस्थान में अनुसूचित जनजातियों को मिल रहे 12 प्रतिशत आरक्षण के भीतर भील समुदाय के लिए नौ प्रतिशत उप-आरक्षण निर्धारित करने की मांग अब राजस्थान हाईकोर्ट पहुंच गई है। आदिवासी भील आरक्षण संघर्ष समिति से जुड़े शंकरलाल दहिया एवं अन्य की याचिका पर न्यायमूर्ति इंद्रजीत सिंह और न्यायमूर्ति संदीप तनेजा की खंडपीठ ने राज्य सरकार, केंद्र सरकार और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से जवाब मांगा है।

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि मीणा समुदाय सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से काफी आगे बढ़ चुका है तथा एसटी आरक्षण के लाभों का बड़ा हिस्सा उसे मिल रहा है। इसके विपरीत भील समुदाय अपनी बड़ी आबादी के बावजूद राजकीय सेवाओं और अन्य क्षेत्रों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं कर सका। हालांकि न्यायालय ने इन आरोपों पर अभी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। केवल संबंधित सरकारों और अधिकारियों से जवाब मांगा गया है।

राजस्थान में कितने मीणा और कितने भील?

जनगणना-2011 राजस्थान की जनजातिवार आबादी का नवीनतम अधिकृत स्रोत है। इसके अनुसार राज्य की कुल जनसंख्या 6 करोड़ 85 लाख 48 हजार 437 थी। इनमें 92 लाख 38 हजार 534 व्यक्ति अनुसूचित जनजातियों से थे, जो राज्य की कुल आबादी का 13.48 प्रतिशत है।

राजस्थान की एसटी आबादी में सबसे बड़ा समुदाय मीणा है, जिसकी जनसंख्या 43 लाख 45 हजार 528 थी। यह कुल एसटी आबादी का 47.04 प्रतिशत और राजस्थान की कुल आबादी का लगभग 6.34 प्रतिशत है।

भील और उससे संबंधित अधिसूचित समूहों की जनसंख्या 41 लाख 264 थी। इसमें भील, भील गरासिया, ढोली भील, डूंगरी भील, डूंगरी गरासिया, मेवासी भील, रावल भील, तड़वी भील, भगालिया, भिलाला, पावरा और वसावा जैसे समूह सम्मिलित हैं। इनकी संयुक्त संख्या एसटी आबादी का 44.38 प्रतिशत और राजस्थान की कुल जनसंख्या का लगभग 5.98 प्रतिशत है।

इस प्रकार मीणा और भील समूह के बीच जनसंख्या का अंतर लगभग 2.45 लाख है। दोनों मिलकर राजस्थान की 91.42 प्रतिशत एसटी आबादी बनाते हैं।

अन्य प्रमुख जनजातियों में गरासिया की जनसंख्या 3,14,194, सहरिया की 1,11,377, भील मीणा की 1,05,393, धानका और संबंधित समूहों की 96,737 तथा डामोर की 91,463 थी। शेष नायकड़ा, कथोड़ी, कोली ढोर, पटेलिया और कोकना जैसे समुदाय संख्यात्मक रूप से काफी छोटे हैं।

क्या जनसंख्या के आधार पर नौ प्रतिशत उप-आरक्षण बनता है?

यदि 12 प्रतिशत एसटी आरक्षण को केवल जनसंख्या के अनुपात में बांटा जाए तो भील समूह का हिस्सा लगभग 5.33 प्रतिशत-बिंदु और मीणा समुदाय का लगभग 5.64 प्रतिशत-बिंदु बनेगा। शेष लगभग 1.03 प्रतिशत अन्य जनजातियों के हिस्से आएगा।

नौ प्रतिशत आरक्षण पूरे एसटी कोटे का 75 प्रतिशत होता है, जबकि भील समूह एसटी आबादी का 44.38 प्रतिशत है। इसलिए नौ प्रतिशत की मांग को केवल जनसंख्या के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए याचिकाकर्ताओं को यह प्रमाणित करना होगा कि भील समुदाय तुलनात्मक रूप से अत्यधिक सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन का सामना कर रहा है तथा राजकीय सेवाओं में उसका प्रतिनिधित्व उसकी आबादी से बहुत कम है।

आर्थिक स्थिति में दिखाई देता है क्षेत्रीय अंतर

मीणा समुदाय की बड़ी आबादी दौसा, करौली, सवाई माधोपुर, जयपुर, अलवर और टोंक सहित पूर्वी राजस्थान में रहती है। राजधानी एवं प्रमुख शहरों से अपेक्षाकृत बेहतर संपर्क, शिक्षा संस्थानों तक पहुंच, राजनीतिक संगठन और प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रति जागरूकता ने समुदाय के एक वर्ग को सरकारी सेवाओं एवं उच्च शिक्षा में आगे बढ़ने में सहायता दी है।

इसके बावजूद संपूर्ण मीणा समुदाय को आर्थिक रूप से सम्पन्न मानना उचित नहीं होगा। समुदाय में छोटे किसान, भूमिहीन मजदूर, बेरोजगार और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार भी बड़ी संख्या में हैं।

भील आबादी मुख्यतः बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर, प्रतापगढ़, सिरोही और दक्षिणी राजस्थान के पहाड़ी क्षेत्रों में केंद्रित है। इन क्षेत्रों में छोटी एवं वर्षा-आधारित कृषि जोत, कृषि मजदूरी, गुजरात की ओर मौसमी प्रवासन, बिखरी हुई बस्तियां, माध्यमिक और उच्च शिक्षा संस्थानों की दूरी तथा नियमित वेतन वाले रोजगार की कमी जैसी समस्याएं अधिक दिखाई देती हैं।

गरासिया, डामोर, धानका और कथोड़ी समुदायों की स्थिति पर भी अलग और विस्तृत सरकारी अध्ययन उपलब्ध नहीं है। बारां जिले में रहने वाला सहरिया समुदाय केंद्र सरकार की विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह—पीवीटीजी—श्रेणी में शामिल है। खाद्य असुरक्षा, कुपोषण, भूमिहीनता और कम शैक्षिक उपलब्धि के कारण सहरिया राजस्थान की सर्वाधिक वंचित जनजातियों में माना जाता है।

सरकारी सेवाओं में किसके कितने कर्मचारी—इसका उत्तर उपलब्ध नहीं

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि केंद्र और राजस्थान सरकार के प्रकाशित कर्मचारी आंकड़ों में अनुसूचित जनजातियों का विवरण आमतौर पर संयुक्त “एसटी” श्रेणी में रखा जाता है। कर्मचारियों को मीणा, भील, गरासिया, डामोर अथवा सहरिया के रूप में अलग करके कोई समेकित सार्वजनिक रिपोर्ट जारी नहीं होती।

इसी कारण यह अधिकृत रूप से नहीं बताया जा सकता कि—

राजस्थान सरकार में कितने मीणा और कितने भील कर्मचारी हैं;

राजस्थान प्रशासनिक सेवा, पुलिस, शिक्षा और चिकित्सा में उनका अलग-अलग प्रतिनिधित्व कितना है;

समूह ‘ए’, ‘बी’, ‘सी’ और ‘डी’ के पदों पर कौन-सी जनजाति कितनी संख्या में है;

पिछले वर्षों की भर्तियों में किस समुदाय को कितना लाभ मिला;

केंद्र सरकार की सेवाओं में राजस्थान के मीणा और भील समुदाय से कितने लोग नियुक्त हैं।

केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग केवल कुल एससी, एसटी और ओबीसी प्रतिनिधित्व प्रकाशित करता है। उसमें कर्मचारी की विशिष्ट जनजाति और मूल राज्य नहीं बताया जाता। इसी प्रकार राजस्थान के आरक्षण रोस्टर में कर्मचारी की श्रेणी एसटी दर्ज हो सकती है, लेकिन जनजातिवार समेकित आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए जाते।

ऐसी स्थिति में उपनामों, सार्वजनिक पदाधिकारियों अथवा कुछ चयन-सूचियों को देखकर पूरे राजकीय प्रतिनिधित्व का निष्कर्ष निकालना वैज्ञानिक नहीं होगा।

‘99 प्रतिशत लाभ’ का दावा अभी प्रमाणित नहीं

मीणा समुदाय द्वारा एसटी आरक्षण का 99 प्रतिशत लाभ लेने का दावा वर्तमान में याचिकाकर्ताओं का आरोप है, अधिकृत सरकारी आंकड़ा नहीं। इसे प्रमाणित करने के लिए सभी विभागों, सरकारी उपक्रमों, विश्वविद्यालयों, स्थानीय निकायों और भर्ती संस्थाओं की कई वर्षों की नियुक्तियों का जनजातिवार अध्ययन आवश्यक होगा।

इसके साथ छात्रवृत्ति, उच्च शिक्षा, व्यावसायिक प्रवेश, छात्रावास, प्रतियोगी परीक्षा सहायता और स्वरोजगार योजनाओं के लाभार्थियों का भी जनजातिवार विश्लेषण करना पड़ेगा। ऐसा समेकित अध्ययन अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

उप-वर्गीकरण संभव, पर ठोस आंकड़े जरूरी

सुप्रीम कोर्ट की सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अगस्त 2024 में पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह मामले में माना था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे आरक्षित वर्गों के भीतर अधिक वंचित समुदायों के लिए उप-वर्गीकरण किया जा सकता है।

लेकिन सरकार को यह निर्णय राजनीतिक धारणा या अनुमान के आधार पर नहीं, बल्कि अनुभवजन्य आंकड़ों के आधार पर करना होगा। सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन, सरकारी सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व तथा आरक्षण के लाभों के असमान वितरण को प्रमाणित करना आवश्यक है।

राज्य सरकार किसी जनजाति को संविधान के अनुच्छेद 342 की सूची से निकाल या उसमें नई जनजाति जोड़ नहीं सकती, लेकिन पर्याप्त अध्ययन के आधार पर आरक्षण के लाभों का न्यायसंगत वितरण करने के लिए सूची के भीतर उप-वर्गीकरण कर सकती है।

पहले सर्वेक्षण, फिर नीतिगत निर्णय

राजस्थान में निष्पक्ष समाधान के लिए प्रत्येक अधिसूचित जनजाति का विस्तृत सामाजिक-आर्थिक और राजकीय-सेवा सर्वेक्षण कराया जाना आवश्यक है। इसमें आय, भूमि, शिक्षा, रोजगार, प्रवासन, स्वास्थ्य, सरकारी सेवा, पद-स्तर, छात्रवृत्ति और विभिन्न योजनाओं से मिले लाभों का जनजातिवार विवरण शामिल होना चाहिए।

व्यक्तिगत पहचान सार्वजनिक किए बिना ये आंकड़े सांख्यिकीय रूप में तैयार किए जा सकते हैं। इससे यह स्पष्ट होगा कि आरक्षण का लाभ वास्तव में किन समुदायों तक पहुंचा, कौन पीछे रह गया और किसके लिए विशेष उपाय जरूरी हैं।

राजस्थान की एसटी आबादी में मीणा और भील लगभग समान आकार के दो सबसे बड़े समुदाय हैं। उपलब्ध क्षेत्रीय संकेतक भील, गरासिया, डामोर और सहरिया समुदायों में गंभीर वंचना की ओर संकेत करते हैं, जबकि मीणा समुदाय के एक हिस्से ने शिक्षा और सरकारी सेवाओं में तुलनात्मक प्रगति की है। लेकिन ठोस जनजातिवार आंकड़ों के अभाव में किसी समुदाय को संपूर्ण लाभ का एकाधिकार रखने वाला अथवा दूसरे को पूरी तरह वंचित घोषित करना जल्दबाजी होगी।

आरक्षण के न्यायपूर्ण बंटवारे की बहस का स्थायी समाधान आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि पारदर्शी जनजातिवार डेटा और उसके आधार पर बनाई गई संवैधानिक नीति ही हो सकती है।