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क्या गणेशोत्सव से गणेशजी के आदर्श ही अनुपस्थित होते जा रहे हैं?

प्रकाशित: 17 September 2026, 4:46 pm

भक्ति, सद्बुद्धि और सामाजिक जागरण का पर्व कहीं शोर, प्रदर्शन और प्रतिस्पर्धा का आयोजन तो नहीं बन रहा

देशभर में गणेशोत्सव की धूम है। भव्य पंडाल सजाए जा रहे हैं, विशाल प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं और सड़कों पर विसर्जन यात्राएं निकाली जा रही हैं। बड़ी संख्या में लोग श्रद्धा, सेवा और सामुदायिक भावना के साथ इन आयोजनों में भाग लेते हैं। अनेक गणेश मंडल रक्तदान, अन्नदान, चिकित्सा शिविर, स्वच्छता अभियान और जरूरतमंद विद्यार्थियों की सहायता जैसे उपयोगी कार्य भी करते हैं। इसलिए पूरे सार्वजनिक गणेशोत्सव को अनुचित ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा।

लेकिन एक असहज और आवश्यक प्रश्न पूछा जाना चाहिए—क्या आज के बहुत से आयोजनों में भगवान गणेश और उनके आदर्श केंद्र में हैं, या केवल उनका नाम और प्रतिमा रह गई है?

भगवान गणेश भारतीय परंपरा में बुद्धि, विवेक, विनम्रता, धैर्य, अनुशासन और विघ्नों को दूर करने वाली चेतना के प्रतीक हैं। उनका विशाल मस्तक व्यापक चिंतन, बड़े कान ध्यानपूर्वक सुनने, छोटी आंखें एकाग्रता और सूंड परिस्थितियों के अनुसार व्यवहार करने की शिक्षा देती है। किंतु कितने पंडालों में इन गुणों की व्याख्या होती है? कितने आयोजनों में बच्चों और युवाओं को विवेक, पर्यावरण संरक्षण, माता-पिता के सम्मान, सामाजिक उत्तरदायित्व और अनुशासन की शिक्षा दी जाती है?

यदि किसी पंडाल में कई दिनों तक फिल्मी गाने, असहनीय डीजे, राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन, चंदे की प्रतिस्पर्धा और सोशल मीडिया के लिए दृश्य तैयार करना ही मुख्य गतिविधि बन जाए, तो उसके धार्मिक और सामाजिक उद्देश्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

लोकमान्य तिलक की कल्पना केवल मनोरंजन की नहीं थी

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने वर्ष 1893 में गणेशोत्सव को सार्वजनिक स्वरूप देकर उसे सामाजिक संगठन और राष्ट्रीय जागरण का प्रभावशाली माध्यम बनाया। औपनिवेशिक शासन के समय सार्वजनिक सभाओं पर पाबंदियों के बीच गणेशोत्सव ने लोगों को एकत्र होने, देश और समाज के विषयों पर विचार करने तथा सांस्कृतिक चेतना जगाने का मंच दिया।

उस समय उत्सव में व्याख्यान, भजन, कीर्तन, नाटक, सामाजिक प्रश्नों पर संवाद और राष्ट्रीय विचारों का प्रसार होता था। उद्देश्य समुदाय को जाग्रत, शिक्षित और संगठित करना था। आज यदि उसी मंच पर बौद्धिक चर्चा और सामाजिक चेतना के स्थान पर केवल तेज संगीत, नाच-गाना और प्रदर्शन रह जाए, तो वह लोकमान्य तिलक की मूल सामाजिक परिकल्पना का विस्तार नहीं, बल्कि उसका संकुचन है।

भक्ति का प्रमाण ध्वनि की ऊंचाई नहीं

सनातन आध्यात्मिक परंपरा पूजा में श्रद्धा, शुद्धता, संयम, सात्त्विकता, ध्यान और लोककल्याण को प्रधान मानती है। बाहरी भव्यता को कभी भी आंतरिक भक्ति का विकल्प नहीं माना गया।

गणेश उपासना का मूल उद्देश्य सद्बुद्धि प्राप्त करना और जीवन के विघ्नों से मुक्ति की प्रार्थना करना है। यदि किसी आयोजन से रोगी बेचैन हों, विद्यार्थियों की पढ़ाई बाधित हो, बुजुर्गों और छोटे बच्चों की नींद खराब हो तथा सामान्य लोगों के लिए सड़क पर चलना कठिन हो जाए, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि ऐसी गतिविधि विघ्न दूर कर रही है या नए विघ्न उत्पन्न कर रही है।

संत परंपरा का व्यापक संदेश भी यही है कि ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता अहंकार, दिखावे और दूसरों को कष्ट देने से नहीं, बल्कि नाम-स्मरण, सेवा, करुणा, सात्त्विकता और आत्मसंयम से बनता है। बाहरी प्रदर्शन के मुकाबले आंतरिक शुद्धि और निष्कपट भक्ति को आध्यात्मिक साधना का आधार माना गया है।

धर्म के नाम पर प्रदूषण को न्यायपालिका की भी स्वीकृति नहीं

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति अभय एस. ओका ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि पटाखों, लाउडस्पीकरों और नदियों में प्रतिमा विसर्जन से होने वाले प्रदूषण को धार्मिक प्रथा बताकर उचित नहीं ठहराया जा सकता। उनके अनुसार कोई भी धर्म पर्यावरण नष्ट करने अथवा जीवों को कष्ट पहुंचाने की अनुमति नहीं देता।

न्यायालयों का स्थापित दृष्टिकोण भी यही है कि धार्मिक स्वतंत्रता दूसरों पर अनचाही तेज आवाज थोपने का अधिकार नहीं देती। बॉम्बे हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि लाउडस्पीकर धार्मिक आचरण का अनिवार्य हिस्सा नहीं हैं। किसी धर्म में दूसरों की शांति भंग करके प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं बताई गई है।

इसका अर्थ उत्सव, सामूहिक आरती अथवा धार्मिक अभिव्यक्ति पर रोक नहीं है। इसका सीधा अर्थ है कि एक व्यक्ति या समुदाय की धार्मिक अभिव्यक्ति दूसरे नागरिक के स्वास्थ्य, शांति और समान अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकती।

डीजे का विरोध अब केवल व्यक्तिगत शिकायत नहीं

पुणे में सामाजिक कार्यकर्ता विद्यानंद बापट के नेतृत्व में नागरिकों ने धार्मिक आयोजनों में डीजे और अत्यधिक तेज ध्वनि के विरुद्ध अभियान चलाया। नागरिकों की मांग थी कि पर्वों को डीजे और कानफोड़ू संगीत से मुक्त किया जाए।

इसके बाद लातूर पुलिस ने गणेश मंडलों को डीजे, डॉल्बी और अत्यधिक ध्वनि-विस्तारक उपकरणों का उपयोग नहीं करने के निर्देश दिए। नांदेड़ प्रशासन ने भी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163(1) के अंतर्गत उच्च ध्वनि वाले उपकरणों पर प्रतिबंध लगाया।

नांदेड़ के जिलाधिकारी राहुल कार्डिले ने कहा कि अत्यधिक ध्वनि से श्रवण क्षमता और हृदय स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, बच्चों और रोगियों के लिए इसका जोखिम अधिक होता है। महाराष्ट्र के मंत्री संजय राठौड़ ने भी डीजे से अपने कानों में हुई परेशानी का उल्लेख करते हुए शांतिपूर्ण और पारंपरिक तरीके से त्योहार मनाने की अपील की।

विश्व स्वास्थ्य संगठन भी पर्यावरणीय शोर को केवल असुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्या मानता है। लगातार तेज आवाज नींद, मानसिक शांति, सुनने की क्षमता और हृदय स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। ऐसी स्थिति में डीजे का विरोध धर्म-विरोध नहीं, बल्कि नागरिक स्वास्थ्य और संवेदनशीलता का प्रश्न है।

प्रतिस्पर्धा ने उत्सव को महंगा और दिखावटी बनाया

कई स्थानों पर सबसे विशाल प्रतिमा, सबसे महंगा पंडाल, सबसे शक्तिशाली ध्वनि व्यवस्था और सबसे लंबी विसर्जन यात्रा निकालने की होड़ दिखाई देती है। सजावट, विज्ञापन, बिजली, डीजे और आतिशबाजी पर बड़ी रकम खर्च होती है। कुछ स्थानों पर यह धन स्वैच्छिक सहयोग के बजाय व्यापारियों और स्थानीय नागरिकों पर सामाजिक दबाव बनाकर एकत्र किए जाने की शिकायतें भी सामने आती हैं।

प्रश्न यह नहीं है कि श्रद्धालु अपना धन क्यों खर्च करते हैं। प्रश्न यह है कि क्या उसी धन का एक हिस्सा गरीब बच्चों की शिक्षा, अस्पतालों की सहायता, निराश्रितों के भोजन, जल संरक्षण, सार्वजनिक पुस्तकालय अथवा किसी स्थायी सामुदायिक सुविधा पर खर्च करने से गणेशोत्सव अधिक सार्थक नहीं होगा?

भगवान गणेश को मोदक अर्पित करना परंपरा है, लेकिन किसी भूखे बच्चे को भोजन देना उस परंपरा की आत्मा हो सकता है।

मनोरंजन के आगे बढ़ती विकृतियां भी चिंता का विषय

कुछ स्थानों पर गणेश पंडालों और विसर्जन यात्राओं के आसपास नशा, अभद्र नृत्य, अश्लील गीत, आपसी विवाद, यातायात अवरोध और राजनीतिक वर्चस्व का प्रदर्शन भी दिखाई देता है। ऐसी गतिविधियों का भगवान गणेश की उपासना से कोई संबंध नहीं हो सकता।

जब धार्मिक आयोजन सामाजिक प्रतिष्ठा और शक्ति दिखाने का मंच बन जाता है, तब आयोजकों का ध्यान पूजा और समाज-सेवा से हटकर भीड़ की संख्या, वीडियो की लोकप्रियता तथा दूसरे मंडलों से आगे निकलने पर केंद्रित हो जाता है। धार्मिक प्रतीक की आड़ में होने वाली प्रत्येक गतिविधि धार्मिक नहीं हो जाती।

यदि किसी उत्सव के बाद इलाके में कचरा, टूटी सड़कें, प्रदूषित जलस्रोत और तनाव रह जाए, तो आयोजन की सफलता केवल भीड़ के आधार पर नहीं मापी जा सकती।

उत्सव बंद नहीं, उसका चरित्र बदलना चाहिए

समाधान गणेशोत्सव का विरोध करना अथवा उसे केवल निजी घरों तक सीमित कर देना नहीं है। सार्वजनिक उत्सव सामाजिक ऊर्जा और सामुदायिक सहयोग का बड़ा स्रोत हो सकता है। आवश्यकता इस ऊर्जा को सार्थक दिशा देने की है।

पंडालों में प्रतिदिन भगवान गणेश के किसी एक गुण पर संक्षिप्त संवाद आयोजित हो। विद्यार्थियों के लिए प्रश्नोत्तरी, पुस्तक प्रदर्शनी, संस्कार शिविर और प्रतिभा-सम्मान कार्यक्रम किए जाएं। डीजे के स्थान पर भजन, कीर्तन, शास्त्रीय संगीत और पारंपरिक वाद्यों को प्रोत्साहित किया जाए। प्लास्टर ऑफ पेरिस के बजाय मिट्टी की प्रतिमाएं स्थापित हों और सजावट में प्लास्टिक का उपयोग नहीं किया जाए।

प्रत्येक गणेश मंडल अपने बजट का निश्चित हिस्सा किसी स्थायी सार्वजनिक कार्य पर खर्च करे और आय-व्यय का विवरण खुले रूप में प्रदर्शित करे। विसर्जन यात्रा अनुशासित, नशामुक्त और सीमित ध्वनि वाली हो। राजनीतिक नेताओं के बड़े चित्रों और आयोजकों के प्रचार के बजाय भगवान गणेश के आदर्शों तथा सामाजिक संदेशों को प्रमुख स्थान मिले।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि पंडाल कितना बड़ा था, भीड़ कितनी आई अथवा संगीत कितनी दूर तक सुनाई दिया। वास्तविक प्रश्न यह है कि दस दिन के उत्सव के बाद समाज में विवेक, अनुशासन, करुणा, सेवा और सद्बुद्धि कितनी बढ़ी।

यदि ये गुण नहीं बढ़े तो प्रतिमा तो स्थापित हुई, लेकिन भगवान गणेश के आदर्श हमारे भीतर स्थापित नहीं हो सके।