पेट्रोल सस्ता नहीं हुआ, चीनी महंगी हो गई—आखिर आयात की नौबत क्यों आई?
मारवाड़ पत्रिका | मुद्दे और बहस
लेखक: धर्मेंद्र सुंदेशा
संस्थापक, मारवाड़ पत्रिका
देश में चीनी की बढ़ती कीमत अब सीधे आम परिवार की रसोई पर असर डाल रही है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के आँकड़ों के अनुसार जुलाई 2026 के अंत में चीनी का अखिल भारतीय औसत खुदरा मूल्य करीब 49 रुपये प्रति किलो था, जो एक महीने पहले लगभग 46.50 रुपये और पिछले वर्ष करीब 46 रुपये था। 18 अगस्त तक राष्ट्रीय औसत लगभग 52.30 रुपये प्रति किलो पहुँच गया। कुछ शहरों में बढ़ोतरी इससे कहीं अधिक है। मुंबई में 10 अगस्त के आसपास 50 रुपये किलो बिक रही चीनी एक सप्ताह में करीब 58 रुपये तक पहुँच गई, जबकि पंजाब और कोलकाता के कुछ बाजारों में भाव 65–70 रुपये तक बताए गए हैं। स्थानीय बाजार और गुणवत्ता के अनुसार कीमतें अलग हो सकती हैं, लेकिन बढ़ोतरी का रुझान स्पष्ट है।
इसका प्रभाव केवल घर में इस्तेमाल होने वाली चीनी तक सीमित नहीं रहेगा। मिठाई, चाय, शीतल पेय, बिस्कुट, बेकरी और डेयरी उत्पादों सहित अनेक प्रसंस्कृत खाद्य सामग्री भी महंगी हो सकती हैं। निम्न और मध्यम आय वाले परिवारों के लिए यह बढ़ोतरी विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है।
सरकार ने कीमत नियंत्रित करने के लिए करीब 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। सामान्यतः चीनी आयात पर 100 प्रतिशत शुल्क लगता है। आयात की अनुमति 31 अक्टूबर 2026 तक दी गई है, ताकि त्योहारों के समय बाजार में उपलब्धता बढ़ाई जा सके। लगभग दस वर्षों में घरेलू उपयोग के लिए यह पहला बड़ा आयात कदम बताया गया है।
आयात की आवश्यकता उत्पादन और नीति—दोनों स्तरों पर हुए असंतुलन से पैदा हुई। चालू चीनी वर्ष के प्रारंभ में उत्पादन लगभग 343 लाख टन रहने का अनुमान लगाया गया था, लेकिन नवीनतम सरकारी आकलन करीब 306 लाख टन का है—अर्थात अनुमान में लगभग 11 प्रतिशत की कमी। कमजोर गन्ना उपज, प्रतिकूल मौसम तथा महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में अपेक्षा से कम उत्पादन इसके प्रमुख कारण बताए गए हैं।
देश की वार्षिक घरेलू खपत करीब 283–285 लाख टन है। उत्पादन खपत से थोड़ा अधिक दिखाई देता है, लेकिन निर्यात, एथेनॉल निर्माण और न्यूनतम सुरक्षित भंडार जोड़ने पर बाजार के लिए उपलब्ध चीनी बहुत कम रह जाती है।
भारत चालू सीजन में लगभग सात से आठ लाख टन चीनी निर्यात भी कर चुका था। बाद में घरेलू बाजार में उपलब्धता घटने पर निर्यात रोकना पड़ा। इसके अतिरिक्त करीब 30–31 लाख टन चीनी के बराबर गन्ना उत्पाद एथेनॉल निर्माण की ओर मोड़े जाने का अनुमान है। एथेनॉल को ही वर्तमान महंगाई का अकेला कारण कहना तथ्यात्मक नहीं होगा, लेकिन सीमित उत्पादन वाले वर्ष में इतना बड़ा डायवर्जन घरेलू उपलब्धता को अवश्य प्रभावित करता है।
विडंबना यह है कि एथेनॉल मिश्रण बढ़ने के बावजूद उपभोक्ता को पेट्रोल की कीमत में प्रत्यक्ष कमी दिखाई नहीं दी, जबकि अब चीनी महंगी होने का आर्थिक भार उसे उठाना पड़ रहा है। पहले निर्यात की अनुमति देना, गन्ने का हिस्सा एथेनॉल की ओर मोड़ना और फिर विदेशी मुद्रा खर्च करके चीनी आयात करना बेहतर नीतिगत समन्वय का संकेत नहीं माना जा सकता।
चीनी आयात फिलहाल कीमतों को नियंत्रित करने का आवश्यक अल्पकालीन उपाय हो सकता है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। सरकार को उत्पादन, घरेलू खपत, निर्यात, एथेनॉल डायवर्जन और सुरक्षित भंडार से जुड़े आँकड़े पारदर्शी बनाने चाहिए। खाद्य वस्तु की पर्याप्त घरेलू उपलब्धता सुनिश्चित किए बिना ईंधन लक्ष्य आगे बढ़ाना आम उपभोक्ता के हित में नहीं होगा।
