OBC आयोग की रिपोर्ट पर उठे सवाल, आरक्षण की लॉटरी की तैयारी के बीच पारदर्शिता की मांग
राजस्थान में निकाय-पंचायत चुनावों की प्रक्रिया आगे बढ़ी; आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक करने और आबादी के अनुरूप प्रतिनिधित्व देने की मांग ने बहस को किया तेज
राजस्थान में लंबे समय से लंबित नगरीय निकाय और पंचायतीराज चुनावों की प्रक्रिया अब निर्णायक दौर में पहुंच रही है। अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के निर्धारण के लिए गठित आयोग की रिपोर्ट सरकार को सौंपे जाने के बाद आरक्षण तय करने की कार्रवाई आगे बढ़ रही है। यह कवायद सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थानीय निकायों में OBC आरक्षण के लिए निर्धारित “ट्रिपल टेस्ट” की पृष्ठभूमि में की गई है। राजस्थान हाईकोर्ट भी चुनाव कार्यक्रम में आयोग की रिपोर्ट, वार्ड आरक्षण और मतदान की समय-सारणी स्पष्ट करने को कह चुका है।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार आयोग ने राज्य में OBC आबादी करीब 3.80 करोड़ आंकी है और 91 जातियों/वर्गों को अध्ययन में शामिल किया गया है। अब इसी अनुभवजन्य अध्ययन के आधार पर स्थानीय निकायों में OBC राजनीतिक प्रतिनिधित्व तय किए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
दूसरी ओर सरकार ने नगरीय निकाय चुनावों की आरक्षण प्रक्रिया तेज कर दी है। प्रदेश के 309 नगरीय निकायों के 10,245 वार्डों के चुनाव होने हैं। प्रकाशित कार्यक्रम के अनुसार महापौर, सभापति, चेयरमैन तथा वार्डों के आरक्षण की लॉटरी की प्रक्रिया शुरू हो रही है। पहली बार अध्यक्ष पदों में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू होने से 103 निकायों में महिला प्रमुख होने की संभावना है।
आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग क्यों?
रिपोर्ट सामने आने के साथ ही इसकी कार्यप्रणाली और आंकड़ों को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं। विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधियों की ओर से रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग की जा रही है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि जातिवार जनसंख्या और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आकलन किस आधार पर किया गया। नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने भी सरकार से आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है।
कुछ प्रतिनिधिमंडलों की ओर से पंचायत चुनावों में आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा पर भी पुनर्विचार तथा OBC को उसकी आबादी के अनुरूप प्रतिनिधित्व देने की मांग उठाई गई है। हालांकि वर्तमान कानूनी व्यवस्था में आरक्षण तय करते समय सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित संवैधानिक सीमाओं और “ट्रिपल टेस्ट” का पालन महत्वपूर्ण है।
ऐसे में मूल प्रश्न केवल यह नहीं है कि OBC को कितनी सीटें मिलेंगी, बल्कि यह भी है कि जिस आंकड़े के आधार पर हजारों स्थानीय जनप्रतिनिधियों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व तय होगा, वह आंकड़ा कितना विश्वसनीय, पारदर्शी और सार्वजनिक जांच के योग्य है। चुनाव से पहले आयोग की रिपोर्ट और उसकी पद्धति सार्वजनिक होने से विवादों का तथ्यात्मक परीक्षण संभव होगा और आरक्षण प्रक्रिया के प्रति विश्वास भी मजबूत हो सकता है।

