जब छात्रों का भविष्य राजनीति तय करती है, तो छात्र राजनीति क्यों न करें?”

विचार केवल एक नारा नहीं, बल्कि किसी भी जीवंत लोकतंत्र की मूल आत्मा को रेखांकित करता है। विश्वविद्यालय और महाविद्यालय केवल उच्च शिक्षा और डिग्री बांटने के केंद्र नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतना और नेतृत्व कौशल को सींचने वाली प्राथमिक नर्सरी हैं। राजस्थान में पिछले कुछ वर्षों से छात्र संघ चुनावों पर लगी लगातार रोक ने युवाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों और छात्र आंदोलनों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP), नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI), RLP और SFI सहित विभिन्न छात्र संगठनों द्वारा जयपुर के राजस्थान विश्वविद्यालय से लेकर प्रदेश भर के महाविद्यालयों में किए जा रहे विरोध-प्रदर्शन, धरने, रैलियां और ज्ञापन यह स्पष्ट करते हैं कि चुनाव बंद रहने से युवा वर्ग में गहरा असंतोष व्याप्त है।छात्र संघ चुनावों पर रोक लगाने का सीधा और प्रतिकूल प्रभाव प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों और युवाओं के भविष्य पर पड़ रहा है। जब विश्वविद्यालयों में चुनाव बंद होते हैं, तो सबसे पहले विद्यार्थियों की रोजमर्रा की शैक्षणिक, हॉस्टल, लाइब्रेरी और फीस वृद्धि जैसी समस्याओं को उठाने वाला कोई प्राधिकृत प्रतिनिधि नहीं होता, जिससे प्रशासन की निरंकुशता बढ़ती है। इसके अलावा, चुनाव न होने से युवाओं में नेतृत्व क्षमता, संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को समझने का अवसर छिन जाता है।

इसका एक बड़ा नुकसान यह भी है कि मुख्यधारा की राजनीति में आम और मध्यमवर्गीय परिवारों के प्रतिभाशाली युवाओं के प्रवेश के रास्ते बंद हो जाते हैं, जिससे राजनीति में केवल वंशवाद और धनबल का वर्चस्व बढ़ने का जोखिम रहता है।राजस्थान का राजनीतिक इतिहास इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि प्रदेश को दिशा देने वाले कई शीर्ष नेता इसी छात्र राजनीति की देन रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एनएसयूआई (NSUI) के माध्यम से अपनी छात्र राजनीति की शुरुआत कर प्रदेश के शीर्ष पद तक का सफर तय किया। वहीं, हनुमान बेनीवाल ने राजस्थान विश्वविद्यालय का छात्र संघ अध्यक्ष रहकर अपनी मजबूत राजनीतिक नींव रखी और बाद में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) की स्थापना की। इसी प्रकार, रवींद्र सिंह भाटी ने जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर से निर्दलीय छात्र संघ अध्यक्ष बनकर अपनी जनप्रिय पहचान बनाई और बेहद कम उम्र में विधानसभा पहुंचे। इसके अलावा, पूर्व भाजपा प्रदेशाध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और वरिष्ठ नेता प्रताप सिंह खाचरियावास जैसे कद्दावर नेताओं ने भी विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति के गुर सीखकर ही राज्य और देश की मुख्यधारा की राजनीति में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।

छात्र संघ चुनाव केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक और भावी नेतृत्व तैयार करने वाली अनिवार्य व्यवस्था हैं। यदि प्रशासन को अनुशासनहीनता, धनबल या शैक्षणिक कैलेंडर प्रभावित होने की चिंता है, तो उसका समाधान चुनावों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि सख्त आचार संहिता और नियमों का पालन कराना है। राज्य सरकार को युवाओं की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं और छात्र संगठनों की मांगों का सम्मान करते हुए छात्र संघ चुनावों को पुनः बहाल करने की दिशा में सकारात्मक कदम उठाने चाहिए, ताकि लोकतंत्र की यह नर्सरी पुनः पल्लवित हो सके|
