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दिमागी नक्सल’ की भाषा और युवाओं की बेचैनी: शीर्ष नेतृत्व को संयम क्यों रखना चाहिए?

प्रकाशित: 18 August 2026, 12:09 pm

आलेख-धर्मेंद्र सुन्देशा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2026 को लाल किले से संबोधन में कहा कि जंगलों में सक्रिय सशस्त्र नक्सलवाद अंतिम सांसें गिन रहा है, लेकिन “दिमागी नक्सल” अब भी मौजूद हैं। उन्होंने ऐसे लोगों को पहचानने और अलग-थलग करने की आवश्यकता बताई। इसके बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया हुई और “दिमागी नक्सल पार्टी” नाम से एक Instagram पेज सामने आया, जिसके लगभग 1.7 लाख फॉलोअर्स होने की खबर प्रकाशित हुई।

यह स्पष्ट है कि “दिमागी नक्सल पार्टी” निर्वाचन आयोग में पंजीकृत राजनीतिक दल नहीं, बल्कि राजनीतिक-व्यंग्यात्मक सोशल मीडिया प्रतिक्रिया है। फिर भी उसकी तेज लोकप्रियता यह संकेत देती है कि आज का युवा अपने लिए अपमानजनक या संदिग्ध मान लिए गए राजनीतिक विशेषणों को चुपचाप स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

इससे पहले 15 मई को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की मौखिक टिप्पणी में कुछ बेरोजगार युवाओं के लिए “कॉक्रोच” और व्यवस्था पर हमला करने वालों के लिए “परजीवी” जैसे शब्द सामने आए थे। मुख्य न्यायाधीश ने अगले दिन स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी देश के बेरोजगार युवाओं के लिए नहीं, बल्कि फर्जी डिग्री के सहारे पेशों में प्रवेश करने वाले लोगों के संदर्भ में थी। इसके बावजूद, इस शब्दावली की प्रतिक्रिया में अभिजीत दीपके द्वारा शुरू किया गया व्यंग्यात्मक “कॉक्रोच जनता पार्टी” अभियान कुछ ही समय में व्यापक युवा आंदोलन बन गया। इसने बेरोजगारी, परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन किए।

इस पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री की “दिमागी नक्सल” टिप्पणी को केवल सुरक्षा संबंधी चेतावनी मानकर छोड़ना कठिन है। राजनीतिक संदर्भ में इसे कांग्रेस और सरकार-विरोधी विचारधाराओं पर तंज के रूप में भी पढ़ा गया। हालांकि यह conclusively नहीं कहा जा सकता कि टिप्पणी का एकमात्र उद्देश्य कांग्रेस पर निशाना साधना था, लेकिन इसकी अस्पष्टता के कारण आलोचना और हिंसक माओवादी विचारधारा के बीच की रेखा धुंधली होने का खतरा अवश्य पैदा हुआ।

आज युवा वर्ग बेरोजगारी, भर्ती में देरी, पेपर लीक, महंगी शिक्षा और अवसरों की कमी से पहले ही बेचैन है। ऐसे समय शीर्ष नेतृत्व की कठोर और अस्पष्ट भाषा सत्ता के प्रति आक्रोश को बढ़ा सकती है। इससे सामाजिक शांति कमजोर होती है और विकास के लिए आवश्यक विश्वास तथा सहयोग का वातावरण प्रभावित होता है। सरकार से असहमति व्यक्त करने वाले प्रत्येक नागरिक को किसी उग्र विचारधारा से जोड़ने का आभास भी लोकतांत्रिक संवाद को संकुचित करता है।

सशस्त्र नक्सलवाद और हिंसा के विरुद्ध कठोर कार्रवाई आवश्यक है, लेकिन लोकतांत्रिक आलोचना, आंदोलन और वैचारिक असहमति को उससे अलग रखना भी उतना ही जरूरी है। लाल किले जैसे राष्ट्रीय मंच से निकला प्रत्येक शब्द पूरे देश को संबोधित करता है, केवल राजनीतिक विरोधियों को नहीं। इसलिए प्रधानमंत्री सहित सभी संवैधानिक पदाधिकारियों को ऐसे विशेषणों से बचना चाहिए जिन्हें युवा सीधे अपने ऊपर लेकर आक्रोशित हो सकते हैं।

राष्ट्र को विकास की ओर ले जाने का रास्ता युवाओं को अलग-थलग करने से नहीं, उनकी शिकायतें सुनने, संवाद कायम करने और रोजगार तथा शिक्षा व्यवस्था में ठोस सुधार करने से निकलेगा। नेतृत्व की भाषा बेचैनी नहीं, विश्वास पैदा करने वाली होनी चाहिए.