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सार्वजनिक धन की जवाबदेही

प्रकाशित: 11 August 2026, 12:39 pm अपडेट: 12 August 2026, 6:00 am

नया सोफा ₹40 हजार में, पुराने की मरम्मत ₹64,850 में; जनता के धन का सदुपयोग कब?

राजस्थान में सरकारी योजनाओं, भवन निर्माण और खरीद से जुड़े हालिया मामले सार्वजनिक धन की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। सरकार अब योजनाओं में घपले और फर्जीवाड़े की जांच के लिए SOG में विशेष सेल बनाने की तैयारी कर रही है, लेकिन प्रश्न यह है कि गड़बड़ी होने के बाद जांच के बजाय खर्च के समय ही उसे रोकने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है?

जयपुर स्थित वन विभाग के अरण्य भवन से जुड़ी खरीद में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार एक 5-सीटर पुराने सोफे की मरम्मत पर ₹64,850 का भुगतान किया गया, जबकि एक नया सोफा ₹40,000 में खरीदा गया। जब नया सामान कम कीमत में खरीदा जा चुका हो, तब पुराने सामान की मरम्मत पर उससे कहीं अधिक राशि खर्च करने का वित्तीय औचित्य क्या था, यह स्वाभाविक प्रश्न है। रिपोर्ट में कुर्सियों व अन्य सामग्री के बिल, बिना आपूर्ति भुगतान और ऐसी सामग्री पर खर्च के भी सवाल हैं जो कुछ महीनों में खराब होने लगी।

इसी प्रकार जोधपुर स्थित राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य भवन के लगभग 21 मीटर ऊंचे सेंट्रल डोम की स्थिति इतनी गंभीर बताई गई कि हाईकोर्ट को स्वयं संज्ञान लेना पड़ा। कुछ ही वर्ष पुराने महत्वपूर्ण सार्वजनिक भवन में ऐसी संरचनात्मक स्थिति निर्माण गुणवत्ता और तकनीकी निगरानी की गंभीरता पर सवाल उठाती है।

सरकारी व्यवस्था में आंतरिक ऑडिट, फिजिकल वेरिफिकेशन, तकनीकी ऑडिट और CAG जैसी अनेक जांच व्यवस्थाएँ हैं। लेकिन यदि रिपोर्ट बनने के बाद भी जिम्मेदार व्यक्ति की पहचान, आर्थिक नुकसान की वसूली और समयबद्ध दंड नहीं हो, तो ऑडिट रिकॉर्ड भर बनकर रह जाता है।

सार्वजनिक धन की रक्षा के लिए आवश्यकता है—खरीद से पहले बाजार मूल्य की तुलना, भुगतान से पहले भौतिक सत्यापन, स्वतंत्र गुणवत्ता परीक्षण और गड़बड़ी पर अधिकारी व ठेकेदार दोनों की व्यक्तिगत जवाबदेही। असली सुधार जांच बढ़ाने में नहीं, गड़बड़ी को समय रहते रोकने और नुकसान की वसूली सुनिश्चित करने में है।