जीत से कठिन होगी जालोर नगर परिषद में सुशासन की परीक्षा
अपेक्षाओं का दबाव, बिखरे शहर की समस्याएँ, सीमित संसाधन और अलग राजनीतिक सत्ता—नए बोर्ड के सामने चुनौतियों का पहाड़
जालोर नगर परिषद के चुनाव संपन्न हो गए हैं। कांग्रेस के बंशीलाल माली सभापति निर्वाचित हुए हैं और कांग्रेस ने निर्दलीय पार्षदों के सहयोग से बोर्ड बना लिया है। चुनावी जीत के साथ उत्सव का चरण पूरा हो गया, लेकिन अब वास्तविक परीक्षा शुरू होगी। नगर परिषद के नए नेतृत्व को ऐसे शहर की जिम्मेदारी मिली है, जहाँ जन-अपेक्षाएँ बहुत अधिक और प्रशासनिक तथा आर्थिक संसाधन सीमित हैं।
सभापति माली समाज से हैं और जालोर शहर में माली समाज की उल्लेखनीय आबादी है। स्वाभाविक रूप से समाज के लोगों को नए नेतृत्व से विशेष अपेक्षाएँ रहेंगी। कांग्रेस कार्यकर्ता, समर्थक निर्दलीय पार्षद, अलग-अलग वार्डों के नागरिक और शहर के प्रत्येक सामाजिक एवं व्यावसायिक वर्ग को भी लगेगा कि उसकी समस्या पहले सुनी जाए। इन परस्पर अपेक्षाओं के बीच निष्पक्षता बनाए रखना नए सभापति के लिए पहली बड़ी चुनौती होगी।
सभापति किसी एक समाज, दल अथवा समर्थक समूह के प्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि पूरे शहर के प्रथम नागरिक के रूप में काम करें—यही उनके नेतृत्व की असली कसौटी होगी। माली समाज की अपेक्षाओं का सम्मान करते हुए भी उन्हें यह स्पष्ट संदेश देना होगा कि नगर परिषद के संसाधनों पर शहर के प्रत्येक नागरिक का समान अधिकार है। काम की प्राथमिकता जाति, दल अथवा व्यक्तिगत निकटता के आधार पर नहीं, बल्कि आवश्यकता और जनहित के आधार पर तय होनी चाहिए।
बिखरे शहर में बुनियादी सुविधाएँ सबसे बड़ी चुनौती
जालोर का शहरी क्षेत्र काफी बिखरा हुआ है। अनेक मोहल्लों और बाहरी बस्तियों में सड़क, नाली, स्ट्रीट लाइट, सफाई, कचरा उठाने और बरसाती पानी की निकासी जैसी बुनियादी समस्याएँ बनी हुई हैं। कहीं नालियाँ अधूरी या अवरुद्ध हैं, कहीं क्षतिग्रस्त सड़कों से परेशानी है तो कहीं नियमित सफाई और रोशनी का अभाव है।
इन समस्याओं का समाधान केवल कुछ निर्माण कार्य स्वीकृत करने से नहीं होगा। इसके लिए पूरे शहर का वार्डवार सर्वेक्षण, समस्याओं का वर्गीकरण और समयबद्ध कार्ययोजना आवश्यक है। परिषद को पहले गंभीर समस्याओं वाले क्षेत्रों की पहचान करनी होगी। नालियों और जल निकासी को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए सड़क, रोशनी और सफाई के लिए अलग-अलग कार्ययोजनाएँ बनानी होंगी।
यदि उपलब्ध बजट को बिना प्राथमिकता छोटे-छोटे कार्यों में बाँट दिया गया तो धन खर्च होने के बावजूद शहर में बदलाव दिखाई नहीं देगा। बेहतर होगा कि परिषद पहले सौ दिनों की स्पष्ट कार्ययोजना जारी करे और नागरिकों को बताए कि किस वार्ड में कौन-सा काम कब तक किया जाएगा।
कर्मचारियों पर नियंत्रण और कमी का संकट
नगर परिषद में निर्वाचित बोर्ड योजनाएँ बनाता है, लेकिन उनका क्रियान्वयन अधिकारियों और कर्मचारियों के माध्यम से होता है। यदि प्रशासनिक अमला समय पर काम नहीं करे, सफाई कर्मचारी निर्धारित क्षेत्रों में नहीं पहुँचें और तकनीकी शाखा फाइलों को लंबित रखे तो राजनीतिक नेतृत्व की घोषणाएँ जमीन पर नहीं उतर सकतीं।
परिषद में कर्मचारियों की कमी भी बड़ी समस्या है। सीमित कर्मचारियों के सहारे विस्तृत शहर की सफाई, निर्माण कार्यों की निगरानी, राजस्व वसूली, पट्टे, भवन अनुमति, शिकायत निवारण और अन्य सेवाओं को समय पर पूरा करना कठिन है। फिर भी कर्मचारियों की कमी को स्थायी बहाना नहीं बनाया जा सकता। उपलब्ध कर्मचारियों का उचित कार्य-विभाजन, उपस्थिति की निगरानी, क्षेत्रवार जिम्मेदारी और काम की साप्ताहिक समीक्षा जरूरी होगी।
सभापति को अधिकारियों से टकराव के बजाय नियमबद्ध जवाबदेही की व्यवस्था बनानी होगी। कौन-सा आवेदन किस अधिकारी के पास है और कितने समय से लंबित है, इसकी नियमित समीक्षा हो। सफाई कर्मचारियों के लिए वार्डवार जिम्मेदारी तय हो तथा लापरवाही पर कार्रवाई और अच्छा कार्य करने वालों को प्रोत्साहन मिले।
राज्य सरकार और स्थानीय बोर्ड के अलग राजनीतिक दल
राजस्थान में भाजपा की सरकार है और जालोर के विधायक जोगेश्वर गर्ग भी भाजपा से हैं, जबकि नगर परिषद में कांग्रेस के नेतृत्व वाला बोर्ड बना है। यह राजनीतिक अंतर विकास कार्यों में चुनौती बन सकता है, लेकिन इसे स्थायी टकराव का कारण बनने देना शहर के हित में नहीं होगा।
नगर परिषद को राज्य सरकार से बजट, स्वीकृतियाँ, कर्मचारी, योजनाएँ और प्रशासनिक सहयोग चाहिए। इसलिए सभापति को विधायक, जिला प्रशासन और राज्य सरकार के संबंधित विभागों के साथ निरंतर संवाद बनाए रखना होगा। इसी प्रकार विधायक और विपक्षी पार्षदों की भी जिम्मेदारी होगी कि राजनीतिक मतभेदों के कारण शहर के विकास कार्य प्रभावित नहीं हों।
कांग्रेस बोर्ड को यह समझना होगा कि केवल राजनीतिक आरोप लगाकर प्रशासनिक कठिनाइयों का समाधान नहीं होगा। वहीं भाजपा और स्थानीय विधायक को भी परिषद की विफलता की प्रतीक्षा करने के बजाय जालोर के विकास के लिए सकारात्मक सहयोग देना चाहिए। श्रेय किसी को भी मिले, लेकिन नुकसान शहर का नहीं होना चाहिए।
वित्तीय संसाधन जुटाना भी बड़ी परीक्षा
सड़क, नाली, रोशनी, कचरा प्रबंधन और सफाई व्यवस्था के लिए पर्याप्त धन चाहिए। नगर परिषद की आमदनी सीमित हो और कर तथा अन्य शुल्कों की वसूली कमजोर हो तो विकास कार्य प्रभावित होना स्वाभाविक है। नए बोर्ड को राज्य और केंद्र की योजनाओं से अधिकतम धन लाने के साथ परिषद के अपने राजस्व स्रोत भी मजबूत करने होंगे।
राजस्व बढ़ाने का अर्थ केवल जनता पर नया बोझ डालना नहीं है। परिषद की दुकानों और संपत्तियों का सही प्रबंधन, बकाया राशि की वसूली, नक्शा स्वीकृति की पारदर्शी प्रक्रिया, विज्ञापन शुल्क और अन्य वैधानिक आय स्रोतों को व्यवस्थित किया जा सकता है। खर्च में पारदर्शिता और अनावश्यक व्यय पर नियंत्रण भी उतना ही आवश्यक है।
सभी पार्षदों को साथ लेकर चलना होगा
कांग्रेस के पास अपने बल पर पूर्ण बहुमत नहीं है। बोर्ड निर्दलीय पार्षदों के सहयोग से बना है। इसलिए सभापति को कांग्रेस, समर्थक निर्दलीयों, भाजपा पार्षदों और अन्य सभी सदस्यों के साथ संवाद बनाए रखना होगा। यदि वार्डों के विकास में राजनीतिक भेदभाव हुआ तो परिषद की बैठकों में टकराव बढ़ेगा और शहर के काम रुकेंगे।
हर पार्षद को अपने वार्ड की समस्या रखने का समान अवसर मिलना चाहिए। परिषद की नियमित बैठकें हों, निर्णय लिखित रूप से लिए जाएँ और कार्यों की प्रगति सार्वजनिक की जाए। विपक्ष को बाधा नहीं, बल्कि निगरानी और सुधार की लोकतांत्रिक शक्ति माना जाना चाहिए।
जनता को भी तय करनी होगी अपनी भूमिका
शहर को साफ रखने की पूरी जिम्मेदारी केवल नगर परिषद की नहीं हो सकती। नागरिकों, व्यापारियों, दुकानदारों और सामाजिक संस्थाओं को भी कचरा निर्धारित स्थान पर देने, नालियों में प्लास्टिक नहीं डालने, सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण से बचने और परिषद को समय पर शुल्क चुकाने की जिम्मेदारी निभानी होगी।
नए बोर्ड की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि कितने उद्घाटन हुए या कितने कार्य स्वीकृत किए गए। असली कसौटी यह होगी कि शहर कितना साफ हुआ, नालियों और सड़कों की स्थिति कितनी सुधरी, स्ट्रीट लाइट कितनी नियमित हुई और सामान्य नागरिक का काम बिना सिफारिश तथा अनावश्यक चक्कर के कितने समय में पूरा हुआ।
बंशीलाल माली और कांग्रेस के नेतृत्व वाले बोर्ड के सामने अवसर भी बड़ा है और चुनौती भी। यदि वे जातीय तथा राजनीतिक अपेक्षाओं से ऊपर उठकर निष्पक्षता, पारदर्शिता, कठोर प्रबंधन और सभी पक्षों से संवाद के साथ काम करते हैं तो जालोर में नई कार्यसंस्कृति स्थापित हो सकती है। लेकिन यदि बोर्ड समर्थकों को संतुष्ट करने, अधिकारियों से टकराव और राजनीतिक खींचतान में उलझ गया तो जनता की बढ़ी हुई अपेक्षाएँ शीघ्र ही असंतोष में बदल सकती हैं। चुनाव जीत लिया गया है; अब शहर का विश्वास जीतना शेष है।
