सबके अपने और सबको अपना मानने वाले संत थे शांतिनाथजी महाराज
पुण्यतिथि पर लाखों श्रद्धालुओं की भावपूर्ण श्रद्धांजलि
जालोर। कनकाचल पर्वत पर स्थित सिरे मंदिर धाम की गौरवशाली नाथ परम्परा में योगीराज श्री केसरनाथजी महाराज के शिष्य ब्रह्मलीन श्री श्री 1008 पीर शांतिनाथजी महाराज ऐसे सिद्ध संत हुए, जो आज भी लाखों श्रद्धालुओं के हृदय में जीवित हैं।
उनका जन्म 19 जनवरी 1940 को भागली गाँव में हुआ। बाल्यकाल से ही शांत, सौम्य और साधु-स्वभाव के शांतिनाथजी ने गुरु केसरनाथजी के चरणों में स्वयं को समर्पित कर दिया। 28 अक्टूबर 1968 को जलंधरपीठ के पीठाधीश्वर बनने के बाद उन्होंने सिरे मंदिर के विकास, साधु-संतों की सेवा, चातुर्मास, धार्मिक आयोजनों और जनकल्याण के अनेक कार्यों को गति दी।
उनके लाखों श्रद्धालु हैं और प्रत्येक श्रद्धालु उन्हें अपना मानता है; लेकिन इससे भी बड़ी बात यह थी कि पूज्य शांतिनाथजी महाराज स्वयं प्रत्येक व्यक्ति को अपना मानते थे। उनके सान्निध्य में किसी को परायेपन का अनुभव नहीं होता था। उनका अपनत्व जाति, धर्म, वर्ग, ऊँच-नीच और अमीर-गरीब के समस्त भेदों से ऊपर था।
हिंदू हो या मुस्लिम, हर व्यक्ति उनके दरबार में समान आत्मीयता और सम्मान पाता था। आज भी उनके नाम का प्रकाश समाज में समानता, एकात्मता, प्रेम और सौहार्द का वातावरण निर्मित करता है। उनकी स्मृति लोगों को जोड़ती है, दूरियाँ मिटाती है और सेवा का मार्ग दिखाती है।
1 अक्टूबर 2012 को उन्होंने देह त्याग दी, पर उनकी करुणा और आत्मीयता की ज्योति आज भी उतनी ही प्रकाशमान है। पुण्यतिथि पर जालोर सहित देश-विदेश में बसे नाथजी के भक्त अपने प्रिय गुरुवर को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए उनके चरणों में भावपूर्ण श्रद्धांजलि और कोटि-कोटि प्रणाम अर्पित कर रहे हैं।
