जालौर सभापति चुनाव: गणित वंशीलाल माली के पक्ष में, उलटफेर हुआ तो उठेंगे गंभीर सवाल
जालौर नगर परिषद के सभापति का चुनाव 21 सितंबर को होना है। चालीस सदस्यीय परिषद में बहुमत के लिए 21 मत जरूरी हैं। कांग्रेस के 19, भाजपा के 14 और सात निर्दलीय पार्षद निर्वाचित हुए हैं। कांग्रेस बहुमत से केवल दो मत दूर है, जबकि भाजपा को सात अतिरिक्त मतों की आवश्यकता है।
कांग्रेस ने वंशीलाल माली को सभापति पद का उम्मीदवार बनाया है। स्थानीय स्तर पर चल रही चर्चाओं के अनुसार चार निर्दलीय पार्षद कांग्रेस उम्मीदवार के समर्थन में मतदान करने का निर्णय कर चुके हैं। यदि कांग्रेस के 19 और इन चार निर्दलीयों के मत साथ रहते हैं तो वंशीलाल माली को 23 मत मिलने चाहिए। सामान्य राजनीतिक और सामाजिक गणित में उनकी जीत स्पष्ट दिखाई देती है।
माली समाज के प्रतिनिधियों के अनुसार परिषद में समाज से जुड़े 14 पार्षद निर्वाचित हुए हैं, जिनमें चार निर्दलीय हैं। जाति के आधार पर पार्षदों का कोई आधिकारिक चुनावी विवरण जारी नहीं होता, लेकिन समाज में यह स्पष्ट भावना बनी हुई है कि जब कांग्रेस ने माली समाज के चेहरे को सभापति पद का अवसर दिया है तो समाज से जुड़े तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के पार्षद वंशीलाल के समर्थन में मतदान करेंगे।
पार्षद केवल संख्या या मशीन नहीं हैं। वे सामाजिक परिस्थितियों, सार्वजनिक अपेक्षाओं और अपने समर्थकों की भावनाओं को समझते हैं। जब किसी उम्मीदवार के पक्ष में दलगत संख्या, निर्दलीयों का बताया जा रहा समर्थन और सामाजिक सहमति—तीनों मौजूद हों, तब अंतिम समय में इसके विपरीत मतदान को सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम कहकर नहीं छोड़ा जा सकता।
ऐसा उलटफेर हुआ तो यह गंभीर प्रश्न उठना स्वाभाविक होगा कि कहीं किसी पार्षद को सत्ता की धौंस, प्रशासनिक दबाव, लोभ, लालच अथवा अन्य प्रलोभन से तो प्रभावित नहीं किया गया। यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि पार्षद ने गुप्त मतदान में स्वतंत्र निर्णय लिया, क्योंकि वास्तविक स्वतंत्रता तभी मानी जाएगी जब निर्णय भय, दबाव और प्रलोभन से पूरी तरह मुक्त हो।
पूर्व मंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पुखराज पाराशर भी पत्रकार वार्ता कर ऐसी आशंकाएँ जता चुके हैं। उन्होंने कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन देकर आरोप लगाया है कि कुछ निर्दलीय पार्षदों पर भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में मतदान का दबाव बनाया जा सकता है। ऐसे आरोपों के बाद प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
उपलब्ध गणित के अनुसार वंशीलाल माली की जीत लगभग तय मानी जा रही है। यदि परिणाम इसके विपरीत आता है तो उसे सामान्य उलटफेर मानने के बजाय पूरे घटनाक्रम की पारदर्शी जाँच आवश्यक होगी। लोकतंत्र केवल मत डालने का नाम नहीं है; मतदान की स्वतंत्रता की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है। दबाव या प्रलोभन से प्राप्त बहुमत लोकतांत्रिक जनादेश नहीं कहा जा सकता।
