रसोई गैस पर सब्सिडी नहीं, तो गरीब परिवार खाना कैसे पकाए?
घरेलू रसोई गैस कोई विलासिता नहीं, बल्कि भोजन पकाने की बुनियादी आवश्यकता है। लगभग 2013-14 में दिल्ली में सब्सिडी वाला 14.2 किलो का सिलेंडर करीब ₹410 में मिलता था। जून 2026 में इसकी कीमत ₹942 हो गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार, डॉलर की कीमत, आयात और परिवहन लागत बढ़ने का प्रभाव अवश्य पड़ा है, लेकिन वास्तविकता यह भी है कि सामान्य परिवार को मिलने वाली सब्सिडी लगभग समाप्त कर दी गई है।
पहले सिलेंडर की बाजार लागत और उपभोक्ता से ली जाने वाली कीमत के बीच का बड़ा अंतर सरकार वहन करती थी। अब उज्ज्वला योजना के चुनिंदा लाभार्थियों को सहायता मिलती है, जबकि निम्न-मध्यमवर्ग सहित करोड़ों सामान्य परिवारों को लगभग पूरी कीमत चुकानी पड़ती है। सरकार ने कोई बड़ा नया प्रत्यक्ष कर भले नहीं लगाया हो, लेकिन सब्सिडी घटाकर अपने बजटीय खर्च की बचत अवश्य की है। यही भार अब जनता की जेब पर आ गया है।
सरकार को विचार करना चाहिए कि सांसदों, विधायकों, मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के लिए वेतन, भत्ते, आवास, यात्रा तथा चिकित्सा जैसी अनेक सुविधाओं की व्यवस्था हो सकती है, तो आम नागरिक को भोजन पकाने के लिए न्यूनतम सहायता क्यों नहीं मिल सकती? जिस व्यक्ति को दवा और उपचार के लिए भी निजी अस्पताल में अपनी जमा पूँजी खर्च करनी पड़ती है, उससे रसोई गैस पर भी पूरा बाजार मूल्य लेना कहाँ तक उचित है?
सरकार चाहे तो प्रत्येक पात्र परिवार को सीमित संख्या में निःशुल्क अथवा अत्यधिक रियायती सिलेंडर दे सकती है। इसकी सीमा एक सिलेंडर प्रति 30 या 40 दिन रखी जा सकती है, ताकि घरेलू आवश्यकता पूरी हो और व्यावसायिक दुरुपयोग भी न हो। संपन्न परिवारों को इस व्यवस्था से बाहर रखा जा सकता है। गरीब और निम्न-मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए कम से कम वर्ष में 9 से 12 सिलेंडर रियायती दर पर उपलब्ध होने चाहिए।
तेल कंपनियों की लागत का भी पारदर्शी हिसाब होना चाहिए। प्रशासनिक, संचालन तथा अन्य अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण करके लागत घटाई जा सकती है। कंपनियों से प्रति सिलेंडर वास्तविक खरीद, बॉटलिंग, परिवहन और वितरण खर्च सार्वजनिक कराया जाना चाहिए, ताकि अक्षमता का बोझ जनता पर न डाला जाए।
गरीब परिवार लकड़ी, उपला या कोयला जलाकर भी खाना पका सकता है, लेकिन फिर स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराने की सरकारी नीति का क्या अर्थ रह जाएगा? धुएँ से महिलाओं और बच्चों का स्वास्थ्य बिगड़ता है तथा पर्यावरण को भी नुकसान होता है।
किसी परिवार के पास सिलेंडर भरवाने के पैसे न हों तो उसे धुएँ में खाना पकाने या भूखा रहने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। मानवता और कल्याणकारी शासन—दोनों की दृष्टि से सीमित घरेलू खपत पर रसोई गैस की सब्सिडी कायम रखना सरकार का दायित्व है।
