दो करोड़ में पार्षद- खरीददार कठघरे में, मगर लोकतंत्र बेच कौन रहा है?
धर्मेन्द्र सुन्देशा
यदि कांग्रेस के टिकट पर जीता पार्षद भाजपा के पक्ष में जा रहा है तो केवल भाजपा से नहीं, कांग्रेस से भी पूछा जाना चाहिए कि उसके प्रतिनिधि इतनी आसानी से क्यों टूट रहे हैं। खरीद-फरोख्त की निष्पक्ष जांच दल देखकर नहीं, प्रत्येक निकाय में दोनों पक्षों की भूमिका देखकर होनी चाहिए।
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भारतीय जनता पार्टी पर आरोप लगाया है कि नगर निकायों में अपने महापौर और अध्यक्ष बनाने के लिए पार्षदों को डेढ़ से दो करोड़ रुपये तक का प्रलोभन दिया जा रहा है। यह आरोप ऐसे समय सामने आया है जब प्रदेश के अनेक नगर निकायों में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और निर्दलीय अथवा दूसरे दलों के पार्षद सत्ता की चाबी बन गए हैं।
निकाय चुनावों में भाजपा 4,166 और कांग्रेस 3,595 वार्डों में जीती है, जबकि बड़ी संख्या में निर्दलीय भी निर्वाचित हुए हैं। भाजपा 85 निकायों में स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने और 60 अन्य निकायों में सबसे बड़ा दल बनने में सफल रही। कांग्रेस को 46 निकायों में बहुमत मिला और 54 अन्य निकायों में वह सबसे बड़ा दल रही। कई निकायों में अंतर इतना कम है कि कुछ पार्षदों का समर्थन ही बोर्ड और उसके अध्यक्ष का भविष्य निर्धारित कर सकता है। यही राजनीतिक अंकगणित खरीद-फरोख्त, दबाव और प्रलोभन की आशंकाओं को जन्म दे रहा है। (Financial Express, The Indian Express)
अशोक गहलोत तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और देश के वरिष्ठ राजनेताओं में गिने जाते हैं। इसलिए उनके आरोप को सामान्य राजनीतिक बयान मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन राजनीतिक अनुभव और सार्वजनिक प्रतिष्ठा किसी आरोप का प्रमाण भी नहीं होते। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आरोप लगाने वाले व्यक्ति के पद से अधिक महत्त्व उसके पास उपलब्ध प्रमाण का होता है।
गहलोत के आरोप से केवल यह प्रश्न नहीं उठता कि कथित रूप से पार्षदों को कौन खरीद रहा है। इससे कहीं बड़ा प्रश्न यह है कि निर्वाचित प्रतिनिधि बिकने को तैयार क्यों हैं और उन्हें चुनाव जिताने वाली पार्टी अपने ही पार्षदों को अपने साथ बनाए रखने में असमर्थ क्यों दिखाई दे रही है।
कांग्रेस के पार्षद भाजपा की ओर क्यों जा रहे हैं?
यदि कांग्रेस के टिकट और चुनाव चिह्न पर जीता हुआ पार्षद कुछ ही दिनों में भाजपा के महापौर या अध्यक्ष प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करने को तैयार हो जाता है तो उसके व्यवहार पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। लेकिन इसके साथ कांग्रेस से भी पूछा जाना चाहिए कि उसने टिकट देते समय उम्मीदवार की वैचारिक प्रतिबद्धता, सार्वजनिक चरित्र और राजनीतिक निष्ठा की कितनी जांच की थी।
क्या कुछ लोगों को केवल धनबल, जातिगत समीकरण अथवा चुनाव जीतने की क्षमता देखकर टिकट दे दिया गया? क्या संबंधित पार्षदों का पार्टी की विचारधारा और कार्यक्रमों से कोई वास्तविक संबंध था? क्या कांग्रेस संगठन अपने निर्वाचित पार्षदों से नियमित संवाद और समन्वय बनाए रखने में विफल रहा? अथवा चुनाव जीतते ही पार्षदों ने अपने व्यक्तिगत हितों का मोलभाव प्रारम्भ कर दिया?
किसी दल का पार्षद यदि केवल कथित आर्थिक प्रस्ताव मिलने के कारण दूसरी ओर चला जाता है तो खरीदने वाले के साथ उसे टिकट देने वाले राजनीतिक नेतृत्व की जवाबदेही पर भी चर्चा होनी चाहिए। टिकट बांटते समय विचारधारा और ईमानदारी को पीछे रखकर केवल जिताऊ उम्मीदवार खोजे जाएंगे तो चुनाव के बाद ऐसे प्रतिनिधि सत्ता और धन की तरफ जाने का रास्ता भी खोज सकते हैं।
क्या दोनों दलों का राजनीतिक खेल है?
राजस्थान की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस प्रमुख प्रतिद्वंद्वी हैं, लेकिन स्थानीय निकायों में सत्ता प्राप्त करने की उनकी रणनीतियों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। केवल यह मान लेना उचित नहीं होगा कि प्रलोभन देने की संभावना एक ही दल तक सीमित है। जिन निकायों में कांग्रेस बहुमत से कुछ सीटें दूर है, वहां भाजपा, निर्दलीय या अन्य दलों के पार्षदों को अपने पक्ष में लाने के लिए कौन से तरीके अपनाए जा रहे हैं–यह भी उतना ही प्रासंगिक प्रश्न है।यह कहना बिना प्रमाण के उचित नहीं होगा कि कांग्रेस ने भी भाजपा के पार्षदों को खरीदा है। लेकिन राजनीतिक नैतिकता की कसौटी दोनों पक्षों के लिए एक समान होनी चाहिए। यदि भाजपा पर लगे आरोपों की जांच जरूरी है तो उन सभी निकायों की भी जांच होनी चाहिए जहां कांग्रेस अथवा किसी अन्य दल ने अपनी निर्वाचित संख्या से अधिक पार्षदों का समर्थन जुटाकर बोर्ड बनाने का दावा किया है।
इस प्रक्रिया में धन ही एकमात्र सौदा नहीं होता। पद, समिति की अध्यक्षता, ठेके, राजनीतिक नियुक्ति, आगामी चुनाव का टिकट, कारोबारी हितों की सुरक्षा अथवा प्रशासनिक मामलों में सहायता भी सौदे का हिस्सा हो सकती है। इसलिए पार्षदों के पाला बदलने को केवल राजनीतिक सहमति कहकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है।
कई बार दोनों प्रमुख दल सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे पर खरीद-फरोख्त का आरोप लगाते हैं, लेकिन अपने पक्ष में आने वाले दूसरे दल के पार्षद का स्वागत करते हैं। विरोधी दल का प्रतिनिधि जाए तो उसे बिकाऊ कहा जाता है और वही प्रतिनिधि अपने पक्ष में आए तो उसे अंतःकरण की आवाज अथवा विकास के समर्थन का नाम दे दिया जाता है। यह दोहरा मापदंड ही राजनीतिक मिलीभगत की आशंका को बल देता है।
प्रत्यक्ष मिलीभगत तभी कही जा सकती है जब उसके प्रमाण सामने आएं, लेकिन सत्ता प्राप्त करने के लिए समान अनैतिक तरीकों को स्वीकार करना भी एक प्रकार की व्यवस्थागत मिलीभगत है। इसमें दल अलग-अलग दिखाई देते हैं, परंतु जनादेश को सत्ता के अंकगणित में बदलने की प्रवृत्ति समान रहती है।मतदाता ने प्रतिनिधि चुना है, कोई व्यापारिक वस्तु नहींकिसी पार्षद को जनता अपने शहर की सफाई, सड़क, पानी, रोशनी, स्वास्थ्य और नियोजित विकास के लिए चुनती है। मतदाता का वोट पार्षद की निजी संपत्ति नहीं है, जिसे वह चुनाव जीतने के बाद सर्वोच्च बोली लगाने वाले को सौंप दे। पार्षद को मिला जनादेश जनता द्वारा सीमित अवधि के लिए दिया गया सार्वजनिक विश्वास है।
यदि कोई राजनीतिक दल धन, पद, ठेके अथवा दबाव के माध्यम से निर्वाचित प्रतिनिधि को अपने पक्ष में करता है तो वह मतदाताओं की इच्छा को बदलने की कोशिश करता है। लेकिन यदि कोई पार्षद व्यक्तिगत लाभ के लिए अपना पक्ष बदलता है तो वह भी केवल अपनी पार्टी को नहीं, अपने वार्ड के प्रत्येक मतदाता को धोखा देता है।
खरीददार का अपराध अपनी जगह है, मगर स्वेच्छा से बिकने वाला निर्दोष कैसे हो सकता है? लोकतंत्र की मंडी खरीददार और विक्रेता—दोनों से बनती है।
दो करोड़ का प्रस्ताव है तो नाम और प्रमाण सामने आएंग
हलोत जैसे वरिष्ठ नेता के पास यदि किसी पार्षद को की गई पेशकश की रिकॉर्डिंग, संदेश, बैंकिंग विवरण, मध्यस्थ का नाम अथवा संबंधित पार्षद का बयान है तो उसे जांच एजेंसी और सार्वजनिक मंच के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
किस पार्षद को प्रस्ताव मिला? प्रस्ताव देने वाला कौन था? रकम नकद देने की बात हुई अथवा किसी दूसरे माध्यम से? बदले में महापौर या अध्यक्ष पद के लिए वोट मांगा गया या दल बदलने और भविष्य में राजनीतिक संरक्षण का आश्वासन भी दिया गया? क्या इसकी शिकायत भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, पुलिस अथवा राज्य निर्वाचन आयोग से की गई?
इन प्रश्नों के उत्तर के बिना दो करोड़ रुपये का आंकड़ा राजनीतिक सनसनी पैदा कर सकता है, लेकिन कानूनी सत्य स्थापित नहीं करता। आरोप की गंभीरता ही इस बात की मांग करती है कि वह प्रमाण और जांच तक पहुंचे।इसी प्रकार, यदि कांग्रेस भाजपा अथवा निर्दलीय पार्षदों का समर्थन जुटाती है तो उसे भी सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि यह समर्थन किन शर्तों पर मिला। जो पारदर्शिता भाजपा से मांगी जा रही है, वही कांग्रेस और दूसरे दलों पर भी लागू होनी चाहिए।
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राजनीतिक खरीद हमेशा नकद रकम के रूप में नहीं होती। किसी को महापौर, उपमहापौर या समिति अध्यक्ष बनाने का आश्वासन दिया जा सकता है। किसी पार्षद या उसके परिजन को आगामी चुनाव का टिकट, राजनीतिक नियुक्ति अथवा कारोबारी संरक्षण देने की पेशकश हो सकती है। कहीं पुलिस, प्रशासन या लंबित जांच का भय भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसलिए जांच केवल बैंक खातों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। मध्यस्थों, फोन कॉल, संदेश, होटल अथवा रिसॉर्ट में पार्षदों को रखे जाने, अचानक बदली राजनीतिक निष्ठाओं और संदिग्ध आर्थिक लेन-देन की भी पड़ताल होनी चाहिए।
पार्षदों को होटल या बाड़ेबंदी में रखना भी स्वस्थ लोकतंत्र का प्रमाण नहीं है। इससे यह संदेश जाता है कि दलों को अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों की निष्ठा पर विश्वास नहीं है। यदि किसी पार्षद की राजनीतिक निष्ठा केवल निगरानी में रखे जाने तक कायम रहती है तो संकट खरीददार से अधिक व्यापक है।
भाजपा को जवाब, कांग्रेस को प्रमाण—और दोनों को पारदर्शिता देनी होगी
भाजपा के लिए यह पर्याप्त नहीं होगा कि वह आरोप को विपक्ष की हताशा बताकर समाप्त कर दे। सत्तारूढ़ दल होने के कारण उस पर पारदर्शिता की जिम्मेदारी अधिक है। उसे स्पष्ट करना चाहिए कि उसके प्रत्याशी और पदाधिकारी बहुमत जुटाने के लिए किन राजनीतिक माध्यमों का उपयोग कर रहे हैं।कांग्रेस की जिम्मेदारी भी केवल आरोप लगाने तक समाप्त नहीं होती। यदि उसके पास ठोस जानकारी है तो नाम, घटनाक्रम और उपलब्ध प्रमाण जांच एजेंसियों को देने चाहिए। साथ ही उसे यह भी बताना चाहिए कि उसके टिकट पर निर्वाचित पार्षदों के भाजपा के पक्ष में जाने की नौबत क्यों आई।दोनों दलों को यह सिद्ध करना होगा कि वे जनादेश की रक्षा करना चाहते हैं, केवल अपने बोर्ड की नहीं। यदि दूसरे दल से आया पार्षद अपने पक्ष में हो तो उसका स्वागत और अपना पार्षद जाए तो खरीद-फरोख्त का आरोप—यह नीति लोकतांत्रिक नैतिकता नहीं कही जा सकती।
असली मालिक मतदाता है
लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह होगा कि जनता पांच वर्ष तक अपनी समस्याओं के समाधान की प्रतीक्षा करे और उसका प्रतिनिधि चुनाव जीतने के कुछ दिनों बाद ही अपने मत की कीमत तय करने लगे। दो करोड़ रुपये पाने वाला पार्षद भले व्यक्तिगत रूप से समृद्ध हो जाए, लेकिन उसका शहर राजनीतिक रूप से गरीब हो जाता है।
इसलिए जांच केवल भाजपा पर लगे आरोप तक सीमित नहीं होनी चाहिए। प्रत्येक ऐसे निकाय में समर्थन जुटाने की प्रक्रिया की पड़ताल होनी चाहिए जहां किसी दल ने अपनी निर्वाचित संख्या से अधिक मत प्राप्त करके बोर्ड बनाया हो। इससे स्पष्ट हो सकेगा कि समर्थन राजनीतिक सहमति से मिला, विकास संबंधी समझौते से या धन, पद और दबाव के माध्यम से।
सवाल केवल यह नहीं कि कौन किस पार्षद को खरीद रहा है। मूल प्रश्न यह है कि जनता का प्रतिनिधि स्वयं को बेचने के लिए उपलब्ध क्यों है, उसकी पार्टी ने उसे टिकट क्यों दिया और सत्ता पाने वाला दल उसकी बदली हुई निष्ठा को स्वीकार क्यों कर रहा है। लोकतंत्र तभी सुरक्षित होगा जब खरीददार, बिकने वाला प्रतिनिधि और अवसरवादी राजनीति को संरक्षण देने वाला दल—तीनों समान रूप से जनता के सामने जवाबदेह हों।

