सड़क सुरक्षा में विभागीय लापरवाही उजागर: ₹373 करोड़ से अधिक राशि अनुपयोगी, मौतें घटने के बजाय बढ़ीं
CAG रिपोर्ट में परिवहन, पुलिस और सड़क निर्माण एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल; बिना टेस्टिंग ट्रैक वाले कार्यालयों से जारी हुए 2.36 लाख लाइसेंस
जयपुर। राजस्थान में सड़क दुर्घटनाओं और उनसे होने वाली मौतों को कम करने के लिए नीतियाँ, योजनाएँ और करोड़ों रुपये उपलब्ध होने के बावजूद संबंधित सरकारी विभाग उनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं कर पाए। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक—CAG की विधानसभा में प्रस्तुत रिपोर्ट संख्या 1/2026 में परिवहन विभाग, पुलिस, लोक निर्माण विभाग तथा सड़क प्रबंधन से जुड़ी एजेंसियों की गंभीर संस्थागत कमियाँ सामने आई हैं।
रिपोर्ट के अनुसार राज्य सरकार ने सड़क सुरक्षा कार्ययोजना 2018–2020 में वर्ष 2015 में हुई 10,510 सड़क दुर्घटना मौतों को 50 प्रतिशत घटाने का लक्ष्य रखा था। इसके विपरीत वर्ष 2024 में मौतों की संख्या बढ़कर 11,790 हो गई। अगली सड़क सुरक्षा कार्ययोजना 2024–2033 लागू करने में भी चार वर्ष का विलंब हुआ।
सड़क सुरक्षा कोष का आधे से अधिक पैसा खर्च नहीं
CAG के अनुसार अप्रैल 2017 में स्थापित राजस्थान सड़क सुरक्षा कोष में वर्ष 2024-25 तक ₹716.37 करोड़ उपलब्ध थे, लेकिन केवल ₹343.36 करोड़ खर्च किए गए। इस तरह लगभग ₹373.01 करोड़ यानी उपलब्ध राशि का करीब 52 प्रतिशत उपयोग नहीं हो सका।
राशि का पर्याप्त उपयोग नहीं होने से एकीकृत यातायात प्रबंधन प्रणाली, ट्रॉमा केयर और दूसरी आवश्यक सड़क सुरक्षा परियोजनाओं के क्रियान्वयन में देरी हुई।
146 बड़ी सड़कों का किसी भी चरण में सुरक्षा ऑडिट नहीं
लोक निर्माण विभाग की ₹10 करोड़ से अधिक लागत वाली सड़कों में से 146 सड़कों—34.35 प्रतिशत—का किसी भी चरण में रोड सेफ्टी ऑडिट नहीं हुआ। पांच किलोमीटर या इससे अधिक लंबाई वाली 1,175 सड़कों में केवल 636 का डिजाइन स्तर पर सुरक्षा ऑडिट किया गया।
संयुक्त भौतिक निरीक्षण में कई राष्ट्रीय एवं राज्य राजमार्गों और शहरी सड़कों पर जरूरी संकेतक, रोड मार्किंग तथा सुरक्षा बैरियर अनुपस्थित अथवा मानकों के अनुरूप नहीं मिले। दुर्घटना संभावित ब्लैक स्पॉट के सुधार और सुधार के बाद परिणामों की समीक्षा की व्यवस्था भी संतोषजनक नहीं पाई गई।
बिना टेस्टिंग ट्रैक 2.36 लाख ड्राइविंग लाइसेंस
ऑटोमेटेड ड्राइविंग टेस्ट ट्रैक बनाने के लिए ₹39 करोड़ आवंटित किए गए, लेकिन प्रगति अपर्याप्त रही। बिना टेस्टिंग ट्रैक वाले 44 परिवहन कार्यालयों से कुल 6.84 लाख में से 2.36 लाख ड्राइविंग लाइसेंस जारी किए गए।
रिपोर्ट में चालक की गलतियों को सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली लगभग 79 प्रतिशत मौतों से संबंधित बताया गया है। ऐसे में पर्याप्त परीक्षण व्यवस्था के अभाव में लाइसेंस जारी होना गंभीर चिंता का विषय है।
हजारों मामलों में समय पर नहीं पहुँची एम्बुलेंस
CAG ने बताया कि 46,892 मामलों में बुलाए जाने के बावजूद एम्बुलेंस दुर्घटनास्थल पर नहीं पहुँची। 24,457 मामलों में एम्बुलेंस निर्धारित समय के बाद पहुँची, जबकि 82,843 मामलों में दुर्घटना पीड़ितों को गोल्डन ऑवर के बाद अस्पताल पहुँचाया गया।
राज्य की ट्रॉमा केयर नीति अंतिम रूप नहीं ले सकी। मॉडल ट्रॉमा सेंटर और ट्रॉमा स्टेबलाइजेशन यूनिट स्थापित करने की प्रगति भी धीमी रही।
ट्रैफिक पुलिस में 95 प्रतिशत तक पदों की कमी
परिवहन विभाग में मोटर वाहन निरीक्षक और उपनिरीक्षक स्तर पर अलग-अलग स्थानों में कर्मचारियों की कमी 3.29 से 92.62 प्रतिशत तक मिली। शहरों में ट्रैफिक पुलिसकर्मियों की कमी 57.89 से 94.89 प्रतिशत तक पाई गई।
इसके कारण गलत दिशा में वाहन चलाने, तेज गति, अवैध पार्किंग, स्कूल बसों तथा वाहनों की फिटनेस पर प्रभावी निगरानी प्रभावित हुई। वर्ष 2018 में स्वीकृत Automatic Number Plate Recognition—ANPR कैमरा परियोजना भी सितंबर 2025 तक अपेक्षित रूप से आगे नहीं बढ़ी।
तीन बड़ी दुर्घटनाओं ने खोली व्यवस्था की पोल
CAG ने वर्ष 2025 की तीन घातक दुर्घटनाओं को केस स्टडी के रूप में शामिल किया है। जैसलमेर में 14 अक्टूबर को बिना टक्कर के एक नई पंजीकृत यात्री बस में आग लगने से 28 लोगों की मृत्यु हुई। रिपोर्ट में इसके पीछे गंभीर विद्युत खराबी, सुरक्षा मानकों का पालन नहीं होना और परिवहन विभाग की निगरानी में विफलता बताई गई।
जयपुर में 3 नवंबर को हुई बहुवाहन दुर्घटना में 15 लोगों की मौत के संदर्भ में तेज गति, शराब पीकर वाहन चलाने पर अपर्याप्त नियंत्रण और आवश्यक सड़क सुरक्षा इंजीनियरिंग की कमी सामने आई। वहीं फलोदी में 2 नवंबर को 15 लोगों की मौत वाली दुर्घटना में हाईवे पर अवैध रूप से खड़ा ट्रेलर और Right of Way में संचालित अनधिकृत ढाबे को नहीं हटाया जाना प्रमुख कारणों में शामिल पाया गया।
CAG ने निष्कर्ष निकाला कि नीतियाँ और संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद विलंबित क्रियान्वयन, कमजोर विभागीय समन्वय, धनराशि का कम उपयोग और ढीले प्रवर्तन ने राज्य की सड़क सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावहीन बनाया। यह रिपोर्ट 24 फरवरी 2026 को राजस्थान सरकार को भेजी गई और 21 अगस्त 2026 को विधानसभा में प्रस्तुत की गई।

