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मराठी सीखिए, परीक्षा दीजिए, तभी टैक्सी चलाइए—क्या मुंबई को भाषाई सीमाओं में बाँधना उचित है?

प्रकाशित: 23 August 2026, 3:42 am

शहर विशेष—मुंबई

धर्मेन्द्र सुंदेशा,संस्थापक, मारवाड़ पत्रिका

महाराष्ट्र में ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा का कामकाजी ज्ञान अनिवार्य किए जाने से एक गंभीर बहस खड़ी हो गई है। परिवहन विभाग ने चालकों की मराठी समझ जाँचने के लिए 16 प्रश्नों वाली परीक्षा शुरू की है। संतोषजनक उत्तर नहीं देने वाले चालक को एक महीने का नोटिस दिया जा रहा है। इसके बाद भी आवश्यक ज्ञान प्रदर्शित नहीं करने पर उसका ड्राइवर-बैज अथवा प्राधिकार अधिकतम तीन महीने तक निलंबित किया जा सकता है। बार-बार उल्लंघन की स्थिति में लाइसेंस या बैज निरस्त करने की कार्रवाई भी संभव बताई गई है।

सरकार का तर्क है कि स्थानीय भाषा का सामान्य ज्ञान होने से यात्रियों और चालकों के बीच संवाद सुविधाजनक होगा तथा सार्वजनिक परिवहन की सेवा बेहतर बनेगी। चालकों के लिए चार घंटे का निःशुल्क “मराठी भाषा संवाद पाठ्यक्रम” भी चलाया गया और मुंबई महानगरीय क्षेत्र में प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए गए। स्थानीय भाषा सीखने के लिए सुविधाएँ देना स्वागत योग्य है; लेकिन सीखने को प्रोत्साहित करने और किसी व्यक्ति की आजीविका को दंड की धमकी से जोड़ने में मूलभूत अंतर है।

मुंबई केवल महाराष्ट्र की राजधानी नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक और व्यावसायिक धुरी तथा विश्व से जुड़ा बहुभाषी महानगर है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और देश के दूसरे हिस्सों से आए लाखों लोगों ने इसके निर्माण, परिवहन, व्यापार और सेवा क्षेत्र में योगदान दिया है। मारवाड़ी समुदाय सहित अनेक प्रवासी समूह पीढ़ियों से मुंबई की आर्थिक व्यवस्था का अभिन्न अंग हैं।

ऐसे शहर में प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि चालक शुद्ध मराठी बोल पाता है या नहीं। वास्तविक कसौटी यह होनी चाहिए कि क्या वह यात्री का गंतव्य समझता है, रास्तों की जानकारी रखता है, उचित किराया लेता है, सुरक्षित वाहन चलाता है और यात्रियों के साथ सभ्य व्यवहार करता है। किसी चालक की टूटी-फूटी मराठी, हिंदी, अंग्रेजी या संकेतों के माध्यम से संवाद करने की क्षमता से दैनिक काम सुचारु रूप से हो रहा है, तो भाषाई परीक्षा उसकी व्यावसायिक योग्यता की निर्णायक कसौटी क्यों बने?

सरकार ने यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया है कि कितनी यात्री शिकायतें केवल मराठी नहीं बोल पाने के कारण प्राप्त हुईं और उन शिकायतों के आधार पर इतने कठोर दंड की आवश्यकता कैसे सिद्ध हुई। यदि सरकार के पास ठोस आँकड़े हैं, तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। नीति का आधार अनुमान या भावनात्मक आग्रह नहीं, बल्कि प्रमाणित समस्या और उसके अनुपात में समाधान होना चाहिए।

सबसे बड़ी चिंता इसकी आगे बढ़ने वाली प्रवृत्ति को लेकर है। आज टैक्सी और ऑटो चालक इसके दायरे में हैं। कल रेहड़ी-पटरी वालों, छोटे दुकानदारों, डिलीवरी कर्मचारियों, निर्माण श्रमिकों, घरेलू कामगारों या दूसरे सेवा प्रदाताओं पर भी ऐसी शर्त लगाई जा सकती है। तब रोजगार की योग्यता कौशल, ईमानदारी और सेवा की गुणवत्ता से नहीं, भाषा की परीक्षा से तय होने लगेगी। यह रास्ता बहुभाषी भारत में अनावश्यक भाषावाद और क्षेत्रवाद को बढ़ा सकता है।भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को देश में आवागमन, निवास और वैध व्यवसाय या रोजगार करने की स्वतंत्रता देता है। इन अधिकारों पर जनहित में उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन ऐसे प्रतिबंधों को तर्कसंगत, समान और आनुपातिक होना चाहिए। यात्रियों की सुविधा के लिए चालक को स्थानीय भाषा के सामान्य वाक्य सिखाना उपयोगी हो सकता है; लेकिन भाषा में कमजोरी को रोजी-रोटी निलंबित या समाप्त करने का आधार बनाना मानवीय और संवैधानिक दोनों दृष्टियों से गंभीर परीक्षण की माँग करता है।

टैक्सी और ऑटो चालक प्रायः निम्न या सीमित आय वर्ग से आते हैं। उनका वाहन ही परिवार की आजीविका, बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा खर्च और ऋण की किस्तों का साधन होता है। तीन महीने के लिए बैज निलंबित होना प्रशासनिक कार्रवाई भर नहीं है—उस परिवार की आय बंद हो सकती है। इसलिए दंड लगाने से पहले प्रशिक्षण, पुनर्परीक्षा, भाषाई सहायता और पर्याप्त समय देना आवश्यक है।

मराठी महाराष्ट्र की गौरवशाली भाषा है और उसका सम्मान प्रत्येक नागरिक को करना चाहिए। प्रवासी नागरिक भी स्थानीय भाषा सीखें, इससे सामाजिक आत्मीयता बढ़ती है। लेकिन भाषा प्रेम को रोजगार खोने के भय में बदल देना भाषा के सम्मान को मजबूत नहीं करता; इससे दूरी, आशंका और विरोध पैदा हो सकता है।

सरकार को कठोर दंड के स्थान पर स्वैच्छिक और निःशुल्क प्रशिक्षण, मोबाइल आधारित पाठ्यक्रम, यात्री-उपयोगी मराठी वाक्यों की पुस्तिका तथा बहुभाषी डिजिटल अनुवाद की व्यवस्था करनी चाहिए। भाषा को जोड़ने का माध्यम बनाया जाए, विभाजन और आजीविका पर नियंत्रण का साधन नहीं।

मुंबई की असली शक्ति उसकी विविधता है। यह शहर सपने देखने वाले से उसकी मातृभाषा नहीं पूछता; वह उसके परिश्रम, कौशल और योगदान को स्वीकार करता है। सरकार की नीतियों को भी मुंबई के इसी समावेशी चरित्र की रक्षा करनी चाहिए।