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समय: जीवन की वह पूंजी जो लौटकर नहीं आती

प्रकाशित: 15 August 2026, 12:30 pm

समय जीवन का मूल्य है, नैतिकता और व्यवस्था उसके आभूषण।

मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक यदि उसके पास वास्तव में अपनी कोई निश्चित पूंजी है, तो वह समय है। किसी को कितना समय मिलेगा, यह वह स्वयं तय नहीं कर सकता। लेकिन जो समय मिला है, उसका उपयोग किस प्रकार किया जाए, इस पर काफी हद तक उसका अधिकार है। यही कारण है कि समय का सदुपयोग वास्तव में जीवन का सदुपयोग है।

समय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह किसी के नियंत्रण में नहीं है। धन को बचाया जा सकता है, खोई हुई वस्तु फिर खरीदी जा सकती है और कई अवसर दोबारा भी मिल सकते हैं, लेकिन बीता हुआ एक घंटा भी वापस नहीं लाया जा सकता। अमीर और गरीब, अधिकारी और कर्मचारी, विद्यार्थी और व्यापारी—सभी के लिए एक दिन में चौबीस घंटे ही होते हैं। अंतर इस बात से पड़ता है कि इन घंटों का उपयोग कैसे किया गया।

समय का ज्ञान भी शिक्षा का हिस्सा हो

हमारी शिक्षा व्यवस्था हमें भाषा, गणित, विज्ञान और अनेक विषय पढ़ाती है, लेकिन अपने समय को समझना और व्यवस्थित करना जीवन-कौशल के रूप में बहुत कम सिखाया जाता है। जबकि विद्यार्थी से लेकर कामकाजी व्यक्ति और वृद्धावस्था तक समय का सही उपयोग जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।

समय के सदुपयोग का अर्थ हर समय काम करते रहना भी नहीं है। पर्याप्त नींद, परिवार के साथ समय, व्यायाम, मनोरंजन, अध्ययन, चिंतन और विश्राम भी समय का अच्छा उपयोग हैं। प्रश्न यह है कि हमारा समय हमारी आवश्यकता और प्राथमिकता के अनुसार व्यतीत हो रहा है या अनजाने में नष्ट हो रहा है।

आज मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और डिजिटल मनोरंजन ने जीवन आसान बनाया है, लेकिन इनके अनियंत्रित उपयोग से प्रतिदिन कितना समय चला जाता है, इसका हमें कई बार अहसास भी नहीं होता। दूसरी तरफ अव्यवस्थित यातायात, लंबी कतारें, सरकारी प्रक्रियाओं में देरी, अस्पतालों में प्रतीक्षा और वर्षों चलने वाले मुकदमे भी नागरिक के जीवन का बहुमूल्य समय लेते हैं।

यहीं समय व्यक्तिगत विषय से आगे बढ़कर सामाजिक और सार्वजनिक मुद्दा बन जाता है। नागरिक से समय की कीमत समझने की अपेक्षा है तो व्यवस्था को भी नागरिक के समय का सम्मान करना होगा।

समय की शिक्षा की शुरुआत बहुत सरल हो सकती है—दिन की प्राथमिकताएं तय करना, अनावश्यक कार्य पहचानना, डिजिटल समय को नियंत्रित करना और काम, परिवार, स्वास्थ्य तथा विश्राम के बीच संतुलन बनाना।

अंततः जीवन की लंबाई हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन उपलब्ध समय को कितना सार्थक बनाया जाए, इस पर विचार अवश्य किया जा सकता है। समय बचाना केवल कुछ घंटे बचाना नहीं है; वास्तव में वह अपने जीवन के एक हिस्से को बचाना है।