गिनती में गड़बड़ या हक की अनदेखी? ओबीसी डेटा और सामाजिक न्याय का संघर्ष
धर्मेंद्र सुन्देशा
संस्थापक – मारवाड़ पत्रिका
राजस्थान में हाल ही में राज्य अन्य पिछड़ा वर्ग राजनीति/प्रतिनिधित्व आयोग की रिपोर्ट सामने आने के बाद आंकड़ों की प्रामाणिकता और प्रक्रियागत कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। समाचार पत्रों और जनप्रतिनिधियों के अनुसार, 2019 के सरकारी दावों में जहां राज्य में ओबीसी आबादी 52% दर्शाई गई थी, वहीं हालिया सर्वेक्षण में इसे घटाकर लगभग 43% (~3.59 से 3.63 करोड़) दर्ज किया गया है। छह वर्षों में आबादी में दर्ज यह लगभग 9% की गिरावट केवल एक तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और जमीनी लोकतंत्र की नींव को प्रभावित करने वाला विषय है।
आंकड़ों का विरोधाभास और प्रशासनिक प्रक्रिया
विभागीय स्तर पर जनाधार डेटा के उपयोग और बंद कमरों में किए गए अधूरे सर्वेक्षणों पर किसान नेताओं तथा समाज सेवियों ने सवाल उठाए हैं। दावों के अनुसार, कई क्षेत्रों में जमीनी सर्वे किए बिना ही अनुमानों को डेटा का रूप दे दिया गया। इसका सीधा नुकसान स्थानीय निकायों (पंचायती राज व शहरी निकाय) में मिलने वाले प्रतिनिधित्व को होगा। यदि दस्तावेजों में किसी क्षेत्र की वास्तविक ओबीसी जनसंख्या कम दर्ज होती है, तो ‘रोटेशन प्रणाली’ के तहत ओबीसी समुदाय के लिए आरक्षित होने वाली जिला प्रमुख, प्रधान, सरपंच और मेयर की सीटों का दायरा स्वाभाविक रूप से सिमट जाएगा।
ऐतिहासिक संदर्भ और मंडल आयोग की विरासत
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो 1931 की जनगणना भारत में अंतिम विस्तृत जातिगत गणना थी, जिसके आधार पर मंडल आयोग (1980) ने देश में पिछड़ा वर्ग की आबादी लगभग 52% आंकी थी। इसी ऐतिहासिक मानक के आधार पर विभिन्न राज्यों में ओबीसी वर्गों के कल्याण और प्रतिनिधित्व के लिए नीतियां निर्मित की गईं। स्वतंत्रता के बाद से ही विश्वसनीय और आधुनिक जातिगत डेटा के अभाव ने सामाजिक नीतियों को अक्सर अनुमानों और तदर्थ आंकड़ों पर निर्भर रखा है। ऐसे में वर्तमान रिपोर्ट द्वारा जनसंख्या को ऐतिहासिक औसतों से काफी कम दिखाना जन-आक्रोश और अविश्वास को जन्म दे रहा है।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्थानीय निकाय चुनावों में पिछड़ा वर्ग आरक्षण तय करने के लिए ‘ट्रिपल टेस्ट’ (Triple Test) का कड़ा मापदंड प्रतिपादित किया है, जिसके तहत तीन मुख्य शर्तों का पालन अनिवार्य है। पहली शर्त के रूप में राज्य सरकार को स्थानीय निकायों में पिछड़ेपन की प्रकृति और प्रभाव की गहन जांच करने के लिए एक समर्पित आयोग का गठन करना होता है। दूसरी शर्त के अनुसार, इस समर्पित आयोग द्वारा वैज्ञानिक एवं जमीनी सर्वेक्षण के जरिए सटीक, अद्यतन और ‘अनुभवजन्य डेटा’ एकत्र किया जाना आवश्यक है। तीसरी शर्त यह सुनिश्चित करती है कि अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को मिलाकर कुल आरक्षण की सीमा किसी भी स्थिति में 50 प्रतिशत से अधिक न हो। ऐसे में, यदि आयोग की कार्यप्रणाली में जनाधार डेटा या अपूर्ण सर्वेक्षण के उपयोग के कारण आंकड़े गलत या भ्रामक प्रस्तुत किए जाते हैं, तो यह सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए ‘अनुभवजन्य डेटा’ के संवैधानिक मानक का सीधा उल्लंघन करता है।
राजस्थान OBC आयोग की रिपोर्ट पर गंभीर सवाल
राजस्थान में स्थानीय निकायों और पंचायतीराज संस्थाओं में OBC राजनीतिक प्रतिनिधित्व तय करने के लिए गठित आयोग की रिपोर्ट सामने आने के बाद उसके आंकड़ों और कार्यप्रणाली को लेकर अनेक सवाल उठ रहे हैं।
उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि राजस्थान की OBC सूची समय के साथ विस्तृत हुई है। अलग-अलग अवधियों में अनेक जातियों और उपसमूहों को सूची में शामिल किया गया या उनकी स्थिति में संशोधन हुआ। दूसरी ओर, आयोग की प्रक्रिया के दौरान सरकारी आंकड़ों में त्रुटियां भी सामने आईं। जन आधार से प्राप्त आंकड़ों में कई पंचायतों में OBC आबादी शून्य दिखने जैसी विसंगतियां भी रिपोर्ट हुईं।
अब आयोग ने बड़े सर्वे के आधार पर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है, लेकिन पुराने और वर्तमान OBC आबादी के अनुमानों में महत्वपूर्ण अंतर दिखाई दे रहा है। इसलिए यह स्वाभाविक है कि अलग-अलग सामाजिक समूह रिपोर्ट की पद्धति, आंकड़ों और निष्कर्षों पर सवाल उठा रहे हैं।
मेरे विचार से इस रिपोर्ट को तत्काल अंतिम सत्य मान लेने के बजाय पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए। रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया, सर्वे की पद्धति, आंकड़ों की विश्वसनीयता, संभावित चूक और कमियों तथा अंतिम निष्कर्षों का विस्तृत परीक्षण होना चाहिए।
रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद जिन जातियों, सामाजिक संगठनों या विशेषज्ञों की ओर से आपत्तियां, तथ्य या वैकल्पिक तर्क प्रस्तुत किए जाएं, उन्हें विधिवत सुना जाए और उनके आधार पर रिपोर्ट का पुनः परीक्षण किया जाए। यदि कहीं आंकड़ों, सर्वे या वर्गीकरण में त्रुटि पाई जाती है तो उसे सुधारा जाए।
चूंकि इसी रिपोर्ट के आधार पर OBC का राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण निर्धारित होना है, इसलिए प्रक्रिया केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं हो सकती। आपत्तियों की सुनवाई, तथ्यात्मक परीक्षण और आवश्यक सुधार के बाद ही रिपोर्ट को अंतिम रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए। ऐसा होने पर ही रिपोर्ट की विश्वसनीयता बढ़ेगी और समाज में यह विश्वास बनेगा कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व किसी मनमाने आंकड़े पर नहीं, बल्कि पारदर्शी और परीक्षण योग्य तथ्यों पर निर्धारित किया गया है।
सामाजिक न्याय का पक्ष और भावी राह
सामाजिक न्याय का मूल विचार “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” और वंचित समूहों को सत्ता-नीतियों में यथोचित स्थान देना है। यदि प्रशासनिक लापरवाही या दोषपूर्ण कार्यप्रणाली के कारण सामाजिक संरचना के आंकड़े गलत दर्ज होते हैं, तो यह पिछड़ा वर्ग की राजनीतिक और आर्थिक अवसरों में न्यायसंगत भागीदारी को सीमित करेगा।
पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सरकार को सर्वसमावेशी पुनरीक्षण (Re-verification) करना चाहिए। जब तक आंकड़े जमीनी सच्चाई और प्रामाणिक सत्यापन पर आधारित नहीं होंगे, तब तक न तो न्यायिक मानकों की पूर्ति होगी और ना ही सामाजिक न्याय की वास्तविक स्थापना हो पाएगी।
