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निवाले का संघर्ष, सामाजिक सुरक्षा और ‘भोजन के अधिकार’ की ज़मीनी हकीकत

प्रकाशित: 16 October 2026, 10:15 am

धर्मेन्द्र सुन्देशा

आज ‘विश्व खाद्य दिवस’ हैं, महज एक कैलेंडर की तारीख नहीं है, बल्कि यह उस वैश्विक संकल्प की याद दिलाता है जिसमें कहा गया था कि दुनिया में कोई भी इंसान भूखा नहीं सोएगा। आज जब भारत अपनी आज़ादी के अमृतकाल से आगे बढ़ रहा है और दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है, तब भी हमारे सामने एक यक्ष प्रश्न खड़ा है— क्या हम केवल पेट भरने (कैलोरी) को ही पर्याप्त मान लें, या अब समय आ गया है कि ‘पोषण’ को देश के हर नागरिक का पूर्ण और वास्तविक अधिकार बनाया जाए?

भोजन को ‘कल्याण’ नहीं, ‘अधिकार’ बनाने की राह

भारत में भोजन को अधिकार बनाने की दिशा में सबसे बड़ा मील का पत्थर साल 2013 में आया ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA)’ था। इसने खाद्य सुरक्षा को एक ‘कल्याणकारी योजना’ से निकालकर कानूनी ‘अधिकार’ में बदल दिया। आज जब हम इस अधिकार को और अधिक सशक्त बनाने की बात करते हैं, तो हमें समझना होगा कि ‘अधिकार’ केवल कागजों या सस्ते गल्ले की दुकानों तक सीमित नहीं रह सकता।

इसे एक समग्र अधिकार बनाने के लिए भोजन की उपलब्धता (Availability), पहुँच (Accessibility), वहनीयता (Affordability) और गुणवत्ता (Quality) को सुनिश्चित करना होगा। आज मांग सिर्फ मुट्ठी भर अनाज की नहीं है, बल्कि एक संतुलित थाली की है जिसमें प्रोटीन, विटामिन और सूक्ष्म पोषक तत्व मौजूद हों।

वर्तमान समय की गंभीर चुनौतियां

भंडार गृहों में अनाज का बंपर स्टॉक होने के बावजूद, भारत के सामने खाद्य सुरक्षा के मोर्चे पर कई जटिल चुनौतियां मुँह बाए खड़ी हैं:

  1. जलवायु परिवर्तन का संकट: बेमौसम बारिश, बढ़ता तापमान और सूखा सीधा हमारी कृषि उपज पर प्रहार कर रहे हैं। मौसम की यह मार न केवल उत्पादन घटाती है, बल्कि किसानों की आजीविका भी छीनती है, जिससे खाद्य संकट गहराता है।
  2. ‘छिपी हुई भुखमरी’ और कुपोषण: भारत की एक बड़ी आबादी, विशेषकर महिलाएं और बच्चे, एनीमिया (खून की कमी) और कुपोषण का शिकार हैं। इसे ‘छिपी हुई भुखमरी’ (Hidden Hunger) कहते हैं, जहाँ पेट तो भर रहा है लेकिन शरीर को जरूरी पोषण नहीं मिल रहा।
  3. महंगाई और थाली का अर्थशास्त्र: दालों, सब्जियों, दूध और खाद्य तेलों की आसमान छूती कीमतों ने गरीब की थाली से पौष्टिक आहार को लगभग गायब कर दिया है। ​
  4. सप्लाई चेन और बर्बादी: खेत से लेकर थाली तक पहुँचने से पहले ही लाखों टन अनाज और फल-सब्जियां भंडारण व परिवहन की उचित व्यवस्था न होने के कारण बर्बाद हो जाती हैं।

खाद्य सुरक्षा से कैसे बुना गया ‘सामाजिक सुरक्षा’ का ताना-बाना?

भारत में खाद्य सुरक्षा आज केवल भूख मिटाने का साधन नहीं है, बल्कि यह देश के सबसे बड़े ‘सामाजिक सुरक्षा’ (Social Security) ढांचे की रीढ़ बन चुकी है।कोरोना महामारी के दौरान जब आजीविका के साधन छिन गए थे, तब ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना’ ने 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त अनाज देकर भुखमरी की महामारी से बचाया। यह दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक सुरक्षा जाल साबित हुआ।

इसके साथ ही, स्कूलों में चलने वाली ‘पीएम पोषण (मिड-डे मील)’ योजना और आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से ‘एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS)’ ने बच्चों और गर्भवती महिलाओं के पोषण को एक संस्थागत स्वरूप दिया है। वहीं, मनरेगा (MGNREGA) जैसी योजनाओं ने ग्रामीण भारत के हाथ में पैसा देकर उनकी ‘क्रय शक्ति’ बढ़ाई है, क्योंकि जब जेब में पैसा होता है, तभी बाजार में उपलब्ध भोजन व्यक्ति की थाली तक पहुँच पाता है।

आगे की राह: क्या हो हमारा संकल्प?

विश्व खाद्य दिवस के अवसर पर भारत को अपनी नीतिगत प्राथमिकताओं को पुनः व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। हमें गेहूं और चावल के दुष्चक्र से बाहर निकलकर ‘श्री अन्न’ (मिलेट्स/मोटे अनाज), दलहन और तिलहन के उत्पादन को बढ़ावा देना होगा, जो जलवायु परिवर्तन के अनुकूल भी हैं और पोषण से भरपूर भी।भोजन को वास्तविक अधिकार बनाने के लिए कृषि उत्पादन, आपूर्ति श्रृंखला, रोजगार सृजन और स्वास्थ्य नीतियों को एक धागे में पिरोना होगा। जिस दिन देश के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की थाली में केवल ‘अनाज’ नहीं, बल्कि ‘पोषण’ भी पर्याप्त मात्रा में होगा, सही मायने में उसी दिन विश्व खाद्य दिवस का उद्देश्य भारत की धरती पर फलीभूत होगा।