वीर विक्रमादित्य का लोकधर्म: निर्भीकता का उद्देश्य भय से मुक्ति
निर्भीकता का उद्देश्य भय से मुक्ति
अग्निवेताल के प्रसंग से साहस और लोकहित का संदेश
वीरता का सबसे कठिन क्षण वह होता है जब आदमी खतरे को पहचानता है और फिर भी अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटता। केवल आवेश में आगे बढ़ना साहस का पूरा अर्थ नहीं। निर्भीकता को विवेक और उद्देश्य चाहिए, अन्यथा वही ऊर्जा स्वयं और दूसरों को संकट में डाल सकती है।
मेरुतुंगाचार्य के ‘प्रबंधचिंतामणि’ के विक्रमार्कप्रबंध में अग्निवेताल का प्रसंग आता है। कथा में वह राजाओं के लिए भय का कारण है। विक्रम उसके सामने निर्भय रहते हैं। आगे संघर्ष में राजा की असाधारण हिम्मत से प्रभावित अग्निवेताल उनके आदेश का पालन करने को तैयार हो जाता है। कथा के क्रम में राजा का शासन निष्कंटक होने का वर्णन मिलता है।
इस साहित्यिक प्रसंग का महत्त्व राजा की निर्भीक उपस्थिति में है। जो सत्ता भय से अपना कर्तव्य छोड़ दे, उसका आश्रय लेने वाला व्यक्ति कहां जाएगा? कथा उस शासक की अपेक्षा व्यक्त करती है जो संकट के सामने स्वयं खड़ा हो। उसका साहस दूसरों के लिए सुरक्षा का कारण बने।
आज की वीरता के क्षेत्र अलग हैं। भ्रष्ट मांग को अस्वीकार करना, कमजोर पर हो रहे अन्याय के विरुद्ध विधिसम्मत आवाज उठाना, अपनी गलती स्वीकारना और गलत लाभ छोड़ना भी साहस मांगता है। यहां वीरता का अर्थ निजी हिंसा नहीं, संयमित तथा जिम्मेदार कार्रवाई है। पुलिस, न्यायालय और सक्षम संस्थाओं का सहारा लेकर अन्याय रोकना आधुनिक नागरिक धर्म है।
ऐशो-आराम का मोह भी मनुष्य की निर्भीकता को कमजोर कर सकता है। जब सुविधा बचाने के लिए व्यक्ति बार-बार अपने विवेक से समझौता करता है, तो बाहर की व्यवस्था से पहले भीतर की शक्ति हारती है। विक्रम की कथा इस हार से बचने का आह्वान बन सकती है।
पराक्रम की सबसे उपयोगी पहचान यही है कि उसके रहते किसका भय कम हुआ। किसी को आतंकित करके अपना प्रभाव बढ़ाना आसान है। दूसरों को भय से मुक्त करने के लिए आगे आना कहीं अधिक ऊंचा कर्म है।
कविता 3 भय के आगे कर्तव्य खड़ा
जब संकट की काली छाया,
नगर-द्वार पर छा जाती;
राजधर्म की सच्ची परीक्षा,
तभी सामने आ जाती।
विक्रम की निर्भीक कथा में,
साहस का वह स्वर सुन लो;
अपने मन की दुर्बलता से,
आज एक छोटा रण चुन लो।
झूठे लाभ तुम्हें ललचाएं,
कहो कि श्रम का मान बड़ा;
भय सच को चुप करना चाहे,
उसके आगे रहो खड़ा।
न्याय मांगने वाला जन जब,
अपनी बात अकेला लाए;
उसके साथ तुम्हारी वाणी,
विधि की राह पकड़कर जाए।
क्रोध तुम्हारा पथ न लिख दे,
विवेक तुम्हारा सारथी हो;
वीर भुजाओं के भीतर भी,
करुणा जागी साथी हो।
पराक्रम की ज्योति यही है,
दुख का अंधकार घटे;
जिससे कोई निर्बल कांपे,
उस अभिमान का भार घटे।

