OBC क्रीमी लेयर केवल सैलरी से तय नहीं होगी: सुप्रीम कोर्ट और कई हाईकोर्ट के फैसलों में समान संदेश
ग्वालियर,
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रमाणपत्र आवेदन पर पुनर्विचार के निर्देश दिए; माता-पिता के पद, सेवा श्रेणी और लागू नियमों की जाँच जरूरी
ओबीसी आरक्षण की पात्रता निर्धारित करते समय माता-पिता का वेतन ही एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के हालिया आदेश और इससे पहले सुप्रीम कोर्ट तथा विभिन्न हाईकोर्ट के फैसलों में यह सिद्धांत सामने आया है कि क्रीमी लेयर की जाँच संबंधित सरकारी नियमों, माता-पिता की सेवा श्रेणी और पद की स्थिति के अनुसार होनी चाहिए।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर पीठ में न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के ने 29 सितंबर 2026 को रागिनी राठौर के मामले में प्रमाणपत्र आवेदन खारिज करने वाले दो प्रशासनिक आदेश रद्द किए। अधिकारियों ने उनके पिता की लगभग 16.99 लाख रुपये की वेतन आय को आठ लाख रुपये की सीमा से अधिक मानकर आवेदन अस्वीकार किया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि पिता प्रारंभ में सिविल जज क्लास-II नियुक्त हुए और उन्हें क्लास-I पद पर पदोन्नति 40 वर्ष की आयु के बाद मिली थी। अदालत ने इन सेवा संबंधी तथ्यों की जाँच करके नया निर्णय लेने को कहा।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही स्पष्ट किया था सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन एवं अन्य मामले में केंद्र सरकार की अपीलें खारिज करते हुए संबंधित हाईकोर्ट के फैसलों को बरकरार रखा था। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि 1993 के कार्यालय ज्ञापन में निर्धारित पद की श्रेणी और सामाजिक स्थिति संबंधी मानदंडों को देखे बिना केवल आय के आधार पर क्रीमी लेयर तय करना कानूनसम्मत नहीं है।
इन मामलों में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, बैंकों और निजी संस्थानों में कार्यरत माता-पिता के बच्चों की पात्रता विवादित थी। सरकारी पदों से उनके पदों की समकक्षता निर्धारित नहीं होने पर वेतन को निर्णायक आधार बनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने समान स्थिति वाले सरकारी और सार्वजनिक अथवा निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के बीच भेदभाव को अनुचित माना।
मद्रास, दिल्ली और केरल हाईकोर्ट में भी मिली थी राहत
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में दर्ज विवरण के अनुसार, मद्रास हाईकोर्ट ने 31 अगस्त 2017 को रोहित नाथन और संबंधित अभ्यर्थियों के पक्ष में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण का आदेश बरकरार रखा था। दिल्ली हाईकोर्ट ने 22 मार्च 2018 को केतन और अन्य अभ्यर्थियों के मामलों में 1993 के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार पात्रता की दोबारा जाँच करने को कहा था। केरल हाईकोर्ट ने 25 फरवरी 2022 को डॉ. इब्सन शाह के मामले में राहत कायम रखी; इसमें माता-पिता की प्रारंभिक नियुक्ति लिपिकीय, ग्रुप-C श्रेणी में होने का तथ्य महत्वपूर्ण था।
कर्नाटक में 48 वर्ष की उम्र में पदोन्नति वाला मामला
कर्नाटक हाईकोर्ट ने 30 अगस्त 2024 को एम. अंजनप्पा बनाम डिप्टी कमिश्नर मामले में भी प्रमाणपत्र अस्वीकार करने वाले आदेश रद्द किए। पिता पशु चिकित्सा अधिकारी के रूप में ग्रुप-B में नियुक्त हुए थे और 48 वर्ष की आयु में ग्रुप-A में आए थे। उनके बेटे को पिता का वेतन आठ लाख रुपये से अधिक होने के कारण प्रमाणपत्र देने से इनकार किया गया था। न्यायमूर्ति एम.जी.एस. कमाल ने केंद्रीय कार्यालय ज्ञापन और संबंधित स्पष्टीकरण के अनुसार आवेदन पर पुनर्विचार करने के निर्देश दिए।
पात्रता का फैसला नियमों से होगा
इन निर्णयों का अर्थ यह नहीं है कि अधिक वेतन पाने वाले प्रत्येक कर्मचारी का बच्चा स्वतः गैर-क्रीमी लेयर हो जाएगा। पद के आधार पर लागू बहिष्करण मानदंड और संबंधित आय-संपत्ति परीक्षण की जाँच आवश्यक है। रागिनी राठौर के मामले में भी अदालत ने सीधे प्रमाणपत्र जारी नहीं किया; सक्षम अधिकारी को स्वतंत्र निर्णय लेने तथा प्रमाणित प्रति मिलने से अधिमानतः छह सप्ताह में कारणयुक्त आदेश पारित करने को कहा है।
इस बीच, सितंबर 2026 की पीटीआई रिपोर्ट के अनुसार केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से मार्च के फैसले को भविष्य से लागू करने और क्रियान्वयन के लिए दो वर्ष का समय देने का अनुरोध किया है। सरकार ने पुरानी और जारी भर्तियों, वरिष्ठता तथा सेवा आवंटन पर संभावित प्रभाव का प्रश्न उठाया है। यह सरकार का अनुरोध है; इसे अदालत द्वारा दो वर्ष की छूट दिए जाने का आदेश नहीं माना जा सकता।
