वीर विक्रमादित्य का लोकधर्म : विद्या के सामने विनम्र राजत्व
कड़ी 6 विद्या के सामने विनम्र राजत्व
कल्हण और सुबंधु के उल्लेखों में राजा की सांस्कृतिक प्रतिष्ठा
राज्य की शक्ति सेना और राजकोष से दिखाई देती है। उसकी संवेदना इस बात से भी समझ आती है कि वहां विद्वान, कवि और विचार रखने वाले व्यक्ति को कितना सम्मान मिलता है। ज्ञान के बिना शक्ति अपने निर्णयों की सीमा नहीं पहचान पाती। साहित्य समाज को अपने दुख और आशा कहने की भाषा देता है।
कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ के तीसरे तरंग में उज्जयिनी के विक्रमादित्य का उल्लेख है, जिन्हें हर्ष नाम से भी बताया गया है। कवि मातृगुप्त के प्रति संरक्षण और उन्हें कश्मीर का शासन सौंपने का प्रसंग इस कथा का महत्त्वपूर्ण भाग है। यहां वर्णन कल्हण के हर्ष-विक्रमादित्य का है। इसे उसी नाम-संदर्भ में पढ़ने पर राजकीय उदारता और विद्या के सम्मान का स्वर स्पष्ट होता है।
सुबंधु की ‘वासवदत्ता’ के आरंभिक पद्य में विक्रमादित्य के चले जाने के बाद आनंदपूर्ण समय के समाप्त होने का भाव मिलता है। यह साहित्य में उनकी प्रशंसित स्मृति का संकेत है। इन अलग ग्रंथों के उल्लेख बताते हैं कि विक्रम का नाम सत्ता के साथ सांस्कृतिक अपेक्षा का भी केंद्र बना।
आज ज्ञान का सम्मान केवल मंच पर शाल पहनाने से पूरा नहीं होता। पुस्तकालय चलाना, बच्चों को पढ़ने का समय देना, शिक्षक का काम सहज बनाना और जानकारी रखने वाले व्यक्ति की सलाह ध्यान से सुनना उसके अधिक उपयोगी रूप हैं। सवाल पूछने वाले विद्यार्थी को चुप करा देना ज्ञान का सम्मान नहीं। अच्छे प्रश्न के लिए सुरक्षित वातावरण आवश्यक है।
पढ़ाई से मिली क्षमता का उद्देश्य केवल निजी प्रतिष्ठा हो तो उसका एक बड़ा हिस्सा समाज तक पहुंचने से रह जाता है। किसी को आवेदन समझाना, वैज्ञानिक जानकारी सरल भाषा में देना और अफवाह के स्थान पर सही स्रोत साझा करना भी विद्या का सार्वजनिक उपयोग है।
विक्रमादित्य की सांस्कृतिक स्मृति से हम ऐसी विनम्रता सीख सकते हैं जिसमें धन और पद वाला व्यक्ति ज्ञान के आगे ग्रहणशील हो। अच्छा नेतृत्व सब कुछ जानने का दावा नहीं करता। वह सीखने के योग्य लोगों को पहचानता है और उनकी बात सुनता है।
कविता 6 जहां विद्या का मान रहे
उज्जयिनी की स्मृति में देखो,
कविता का भी स्थान रहा;
राजवैभव के समीप कभी,
विद्या का सम्मान रहा।
विक्रम का वह नाम जगाए,
सीख सकें यह विनय विशाल;
ज्ञान जहां से मिले ग्रहण हो,
खुला रहे मन का हर द्वार।
बच्चा कोई प्रश्न उठाए,
उसको पूरा कहने दो;
अपनी आशंका का उत्तर,
खोज-खोजकर लेने दो।
पुस्तक की झिलमिल पंक्ति में,
पीढ़ी का विश्वास जगे;
शिक्षक के श्रम का सम्मान हो,
नवजीवन का प्रकाश जगे।
सीखा है तो काम आए वह,
किसी उलझन को सुलझाए;
अफवाहों की धुंध बढ़े तो,
सही सूचना राह दिखाए।
हमें ऐसा परिवेश चाहिए,
जहां विचारों का मान रहे;
पद के साथ विनम्रता जागे,
शक्ति के साथ ज्ञान रहे।
