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प्रतीक, राजनीति और वैचारिक क्षरण: क्या बाबासाहेब के मूल संकल्प से दूर हो रहा है समाज?

प्रकाशित: 23 September 2026, 5:09 am

आलेख- धर्मेन्द्र सुन्देशा

संकल्प दिवस विशेष

23 सितंबर का दिन भारतीय सामाजिक चेतना के इतिहास में एक साधारण तिथि नहीं, बल्कि नव-जागरण की अग्नि-परीक्षा का दिन है। सन 1917 में इसी दिन वडोदरा के कामाठी बाग में एक वट वृक्ष के नीचे बैठकर डॉ. भीमराव आंबेडकर ने छुआछूत और जातीय उत्पीड़न से बिलखते हुए एक ऐतिहासिक प्रतिज्ञा ली थी।

कोलंबिया विश्वविद्यालय से शिक्षित और बड़ौदा रियासत के सैन्य सचिव जैसे शीर्ष पद पर तैनात होने के बावजूद, जातिगत विद्वेष के कारण उन्हें न केवल पारसी धर्मशाला से बेदखल होना पड़ा, बल्कि रहने के लिए एक छत तक नसीब नहीं हुई। उस दिन अश्रुपूरित आंखों से बाबासाहेब ने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को त्यागकर शोषितों के उद्धार का जो मार्ग चुना, वह आगे चलकर भारत के सामाजिक धरातल को बदलने वाला ‘भीम संकल्प’ बना।

किंतु, एक सदी से अधिक समय बीत जाने के बाद आज जब ‘संकल्प दिवस’ आता है, तो एक असहज करने वाला प्रश्न पूरे बहुजन-दलित विमर्श के सामने खड़ा होता है- क्या आज का दलित समाज बाबासाहेब के उस मूल वैचारिक आधार को भूलकर मात्र प्रतीकों और नारेबाजी तक सीमित होता जा रहा है?

विचारधारा पर हावी होता प्रतीकवाद

वर्तमान दौर में आंबेडकरवादी आंदोलन का स्वरूप बदला है। बाबासाहेब की प्रतिमाओं की स्थापना, नीले झंडों के प्रदर्शन और रैलियों में तो अभूतपूर्व वृद्धि देखी जा रही है, लेकिन जिस “शिक्षित बनो, संगठित बनो, संघर्ष करो” के त्रिसूत्रीय दर्शन पर इस चेतना की नींव रखी गई थी, उसका आंतरिक ढांचा कमजोर होता दिख रहा है। वैचारिक पठन-पाठन, शोध और बौद्धिक संवाद का स्थान केवल प्रदर्शनकारी राजनीति ने ले लिया है। ‘आंबेडकरवाद’ को एक जीवन दर्शन और संवैधानिक नैतिकता की जगह केवल एक सांस्कृतिक पहचान में बदला जा रहा है।

उप-जातीय विभाजन और राजनीतिक इस्तेमाल

बाबासाहेब ने जिस एकीकृत और संगठित शोषित वर्ग की कल्पना की थी, वह आज आंतरिक उप-जातिगत (Sub-caste) प्रतिद्वंद्विता में बंटा हुआ नजर आता है। राजनीतिक दलों ने इस दरार को भांपकर दलित समाज के भीतर ही विभिन्न उप-जातियों को एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। वोट-बैंक की इस होड़ में बाबासाहेब का नाम तो हर मंच से लिया जाता है, लेकिन उनके संवैधानिक सिद्धांतों को दैनिक राजनीतिक आचरण में जगह नहीं मिलती।

मध्यम वर्ग का दायित्व से पलायन

आरक्षण और संवैधानिक अधिकारों के बूते दलित समाज का एक बड़ा हिस्सा आर्थिक और सामाजिक रूप से सक्षम होकर मध्यम व उच्च वर्ग में शामिल हुआ। बाबासाहेब की अपेक्षा थी कि यह प्रबुद्ध वर्ग अपने समाज के अंतिम व्यक्ति के लिए मार्गदर्शक बनेगा। हालांकि, आज इस नए वर्ग और ग्रामीण या बेहद पिछड़े दलितों के बीच एक स्पष्ट ‘वर्ग-विभाजन’ (Class Divide) दिखाई देता है। संपन्न वर्ग का अपनी जड़ों से कटना और सामाजिक आंदोलनों से उदासीन होना इस विचार प्रक्रिया को गंभीर क्षति पहुंचा रहा है।

पुनर्जागरण की आवश्यकता

यह निष्कर्ष निकालना पूरी तरह न्यायसंगत नहीं होगा कि दलित समुदाय बाबासाहेब को भूल चुका है; सच यह है कि समाज बाबासाहेब की ‘चेतना’ के बजाय उनके ‘नाम’ के इस्तेमाल का शिकार हो रहा है। 23 सितंबर का भीम संकल्प दिवस इस बात की चेतावनी देता है कि केवल मूर्तियां पूजने से सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं है।

यदि इस ऐतिहासिक विरासत को बचाना है, तो दलित समाज को प्रतीकों की दुनिया से बाहर निकलकर बाबासाहेब के मूल साहित्य, वैज्ञानिक सोच और संवैधानिक मूल्यों की ओर लौटना होगा। जातिगत संकीर्णताओं से ऊपर उठकर जब तक शिक्षा और सामाजिक न्याय के उस संकल्प को व्यक्तिगत जीवन में नहीं उतारा जाएगा, तब तक बड़ौदा के उस वट वृक्ष के नीचे लिया गया महासंकल्प अधूरा ही रहेगा।