जनादेश ‘बाड़े’ में कैद, विकास ‘पहरे’ पर तैनात!
धर्मेन्द्र सुन्देशा
चुनाव खत्म होते ही इस देश के लोकतंत्र में अचानक करुणा की ऐसी बाढ़ आती है कि बीजेपी और कांग्रेस- दोनों के दिल द्रवित हो उठते हैं। जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि, जो कल तक ‘शेर’ और ‘जनसेवक’ थे, अचानक दुर्लभ और नाजुक जीवों में बदल जाते हैं। फिर शुरू होती है- बाड़ेबंदी।
वैसे, हमारे देहात का अनपढ़ से अनपढ़ आदमी भी जानता है कि बाड़े में गाय, भैंस और बकरियां बांधी जाती हैं ताकि वे दूसरे के खेत में मुंह न मार आएं, या कोई चोर उन्हें चुपके से हांक न ले जाए। लेकिन आधुनिक भारतीय राजनीति शास्त्र ने इस परिभाषा को बहुत समृद्ध किया है। अब बाड़े में केवल दूध देने वाले मवेशी नहीं, देश की किस्मत तय करने वाले पार्षद, विधायक और सांसद रखे जाते हैं।
फर्क सिर्फ इतना है कि गांव का किसान अपनी गाय-भैंस को खूंटे से बांधकर सूखा भूसा डालता है, जबकि इन राजनीतिक ‘मवेशियों’ को पांच सितारा होटलों के वातानुकूलित बाड़ों में रखा जाता है। वहां स्विमिंग पूल है, काजू-बादाम हैं, और मनोरंजन के सारे साधन हैं। बस एक ही हिदायत होती है–“चरना यहीं है, लेकिन रंभाना हुक्म के मुताबिक ही है।”
यह भारतीय लोकतंत्र का ऐसा अजूबा है जहां जनता जिसे चुनकर भेजती है, उसकी पहली योग्यता ही यह मान ली जाती है कि यह बिकने को तैयार खड़ा है। ‘खरीद-फरोख्त’ के इस पवित्र बाजार में अपने-अपने माल को बचाना ही धर्म है। हाईकमान को डर रहता है कि कहीं विरोधी पार्टी का कोई चरवाहा आकर उनके ‘कीमती पशुओं’ को थोड़ी ज्यादा हरी घास दिखाकर हांक न ले जाए।
कितना अद्भुत दृश्य है! जो नेता वोट मांगते समय कह रहा था कि “मैं आपकी सेवा के लिए चौबीसों घंटे उपलब्ध हूं”, वह चुनाव जीतते ही पांच सितारा बाड़े में बंद हो जाता है और बाहर गार्ड तैनात कर दिए जाते हैं। जनता बाहर खड़ी सोचती है कि उसने किसी इंसान को चुना था या किसी ऐसे प्राणी को जिसे केवल एकमुश्त नीलाम होने के लिए सुरक्षित रखा गया है।
हरिशंकर परसाई अगर आज होते, तो शायद मुस्कुराकर बस इतना कहते- “हमारे देश का लोकतंत्र अब उस पांच सितारा बाड़े में बंद है, जिसकी चाबी किसी ठेकेदार की जेब में है और पहरेदार चिल्ला रहा है कि देखो, देश का विकास हो रहा है!”
