बाबा रामदेवजी : रूणीचा धाम विशेष (अंक – 3)
तीसरा अंक
पर्चाधारी बाबा: सारथिया खाती, सेठ बोहित और करुणा के चमत्कार
बाबा रामदेवजी की भक्ति में ‘पर्चा’ शब्द बार-बार सुनाई देता है। कोई कहता है बाबा ने संकट में पर्चा दिया, कोई रोग से राहत को पर्चा मानता है और कोई बिगड़े काम के अचानक बन जाने को। लोकभजनों में भी बाबा को ‘पर्चाधारी’ और ‘पर्चा देने वाला’ कहा जाता है।
पर्चे की कथा चमत्कार से शुरू होती है, लेकिन उसका उद्देश्य केवल आश्चर्य पैदा करना नहीं होता। प्रत्येक कथा में करुणा, न्याय, विश्वास अथवा मनुष्य की परीक्षा का संदेश छिपा होता है।
लोकसाहित्य में बाबा के पर्चों की संख्या और क्रम को लेकर अलग-अलग परंपराएँ हैं। कहीं चौबीस पर्चों की बात आती है, कहीं अधिक प्रसंग जोड़ दिए जाते हैं। इसलिए किसी एक संख्या को अंतिम मानना कठिन है। सरकारी बाबा रामदेवजी पैनोरमा में सारथिया खाती, पाँच पीर, डालीबाई और अन्य अनेक प्रसंगों को दृश्य रूप में प्रस्तुत किया गया है।
सारथिया खाती को जीवनदान
सबसे करुण कथा बाबा के बालसखा सारथिया खाती से जुड़ी है। लोककथा के अनुसार सारथिया बालक रामदेव के साथ खेलता था। एक दिन उसकी मृत्यु हो गई। उसकी माँ रोती-बिलखती रामदेवजी के पास पहुँची और अपने पुत्र को पुकारने लगी।
माता का दुःख देखकर रामदेवजी ने सारथिया को आवाज दी। जनश्रुति कहती है कि बाबा की पुकार सुनते ही सारथिया उठ बैठा। राजस्थान सरकार के सांस्कृतिक पैनोरमा में भी ‘सारथिया खाती को पुनर्जीवित करना’ शीर्षक से यह प्रसंग सम्मिलित है।
आस्था की दृष्टि में यह जीवनदान का चमत्कार है। सामाजिक दृष्टि से देखें तो इसमें दो और महत्त्वपूर्ण बातें दिखाई देती हैं। पहली—एक माँ का दुःख बाबा के लिए राजमहल के किसी विषय से अधिक महत्त्वपूर्ण था। दूसरी—सारथिया खाती समुदाय से था, लेकिन बालक रामदेव की मित्रता में जातिगत दूरी नहीं थी।
कथा कहती है कि सच्चा संत वही है जिसे किसी अनजान अथवा निर्धन माँ के आँसू विचलित कर दें।
सेठ और डूबते जहाज की लोककथा
बाबा से जुड़ी एक अन्य लोकप्रिय कथा समुद्री व्यापार करने वाले सेठ की है। अलग-अलग क्षेत्रों में उसका नाम और कथा का विवरण बदल जाता है। सामान्य लोककथा के अनुसार व्यापारी का जहाज समुद्र में भयंकर संकट में फँस गया। जब बचने का कोई मार्ग दिखाई नहीं दिया, तब उसने बाबा रामदेवजी का स्मरण किया।
कथा कहती है कि बाबा ने उसकी पुकार सुनकर जहाज को संकट से बाहर निकाला। व्यापारी ने सुरक्षित लौटने के बाद बाबा के चरणों में धन्यवाद अर्पित किया। इसे भक्त दूर बैठे व्यक्ति की पुकार सुनने वाले बाबा का पर्चा मानते हैं।
इस प्रसंग का भाव व्यापारियों के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। संपत्ति और साधन होने के बाद भी मनुष्य हर परिस्थिति पर नियंत्रण नहीं रख सकता। विपत्ति उसे विनम्र बनाती है। संकट से बचने के बाद केवल चढ़ावा चढ़ाना पर्याप्त नहीं; व्यापार में ईमानदारी और समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाना भी कृतज्ञता है।

बहन सुगना की पुकार
बाबा की बहन सुगना से संबंधित कई लोकप्रसंग राजस्थान में गाए जाते हैं। कथा के रूप क्षेत्रानुसार बदलते हैं, लेकिन उनमें भाई-बहन का स्नेह और संकट के समय सहायता का भाव समान रहता है। कुछ कथाओं में सुगना के परिवार पर आए संकट और बाबा द्वारा दूर से सहायता पहुँचाने का वर्णन है।
इन कथाओं ने बाबा को केवल मंदिर के देवता के रूप में नहीं, बल्कि परिवार के अपने सदस्य के रूप में स्थापित किया। महिलाएँ बाबा को कभी भाई, कभी पुत्र और कभी परिवार के रक्षक के रूप में स्मरण करती हैं।
लोकभाव में कहा जाता है—
“सुगना रो बीर, दुखियां री पीर हरे।”
यह पंक्ति किसी प्रमाणित प्राचीन रचना के रूप में नहीं, बल्कि कथा के भाव को प्रकट करने वाली लोक-अभिव्यक्ति के रूप में समझी जानी चाहिए।
चमत्कार की कसौटी
क्या प्रत्येक पर्चे को शब्दशः इतिहास मान लेना चाहिए? आस्था और इतिहास के उत्तर अलग हो सकते हैं। इतिहास प्रमाण माँगता है, जबकि लोकविश्वास पीढ़ियों से चली आ रही अनुभूति और स्मृति पर आधारित होता है।
इन कथाओं का सम्मान करते हुए यह स्पष्ट रखना आवश्यक है कि वे जनश्रुतियाँ हैं। लेकिन जनश्रुति होने से उनका सामाजिक मूल्य समाप्त नहीं होता। सारथिया की कथा करुणा सिखाती है, सेठ की कथा विनम्रता और सुगना की कथा पारिवारिक उत्तरदायित्व।
आज भी सुनाई देते हैं पर्चे
रामदेवरा की यात्रा में भक्त अपने अनुभव सुनाते हैं। कोई कहता है कि डॉक्टरों की कोशिशों के बाद रोगी स्वस्थ हुआ तो उसने बाबा को धन्यवाद दिया। किसी का खोया बच्चा मेले में सुरक्षित मिल गया। किसी यात्री को आधी रात में अनजान वाहन चालक ने सहायता दी। भक्त इन घटनाओं को बाबा का पर्चा कहते हैं।
ऐसे दावों की चिकित्सा अथवा ऐतिहासिक पुष्टि किए बिना उन्हें चमत्कार घोषित करना उचित नहीं होगा। किंतु श्रद्धालु के मन में उनका स्थान वास्तविक है। पर्चा उसके लिए यह विश्वास है कि कठिन समय में आशा का द्वार बंद नहीं होता।
भजन में पर्चे का स्मरण
लोकजागरणों में भाव सुनाई देता है—
“पर्चे ही पर्चे बाबा, थारे नाम रा।”
भक्त के लिए बाबा का सबसे बड़ा पर्चा उसका टूटा हुआ विश्वास जोड़ देना है। जब निराश व्यक्ति फिर खड़ा होता है, जब कठोर मन में करुणा जागती है और जब किसी निर्धन की सहायता के लिए समाज एकत्र होता है—तब चमत्कार लोककथा से निकलकर वास्तविक जीवन में उतर आता है।
भक्ति-संदेश: पर्चा माँगने से पहले हमें विचार करना चाहिए कि क्या हम स्वयं किसी दूसरे के जीवन में सहायता का पर्चा बन सकते हैं। किसी भूखे को भोजन, बीमार को उपचार और निराश को भरोसा देना भी बाबा की परंपरा को आगे बढ़ाना है।
अगले अंक में :- (मक्का के पाँच पीर: कटोरों का पर्चा और ‘रामसा पीर’ की अमर पहचान)

