योगिराज श्री जलंधरनाथ जी महाराज (अंक–8)

अंक–8
कानिफनाथ, राजा गोपीचंद और गुरु-शिष्य परम्परा
नाथ परम्परा में कानिफनाथ को योगिराज श्री जलंधरनाथ जी महाराज का प्रमुख शिष्य माना जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों की कथाओं में कानिफनाथ की दीक्षा, परीक्षा और सिद्धि का वर्णन मिलता है।
इन कथाओं का मुख्य संदेश यह है कि योग-सिद्धि प्राप्त होने के बाद भी साधक को अहंकार से सावधान रहना चाहिए। यदि साधक अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करने लगे, तो वही सिद्धियां उसके पतन का कारण बन सकती हैं।
जलंधरनाथ जी और कानिफनाथ की कथाएं गुरु के अनुशासन का महत्व समझाती हैं। गुरु केवल ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि शिष्य के अहंकार को नियंत्रित करने, उसकी कमजोरियों को पहचानने और उसे सही दिशा में रखने वाला भी होता है।
राजा गोपीचंद और उनकी माता रानी मैनावती की कथा भी जलंधरनाथ जी से जुड़ी प्रसिद्ध लोकपरम्पराओं में शामिल है। बंगाल, असम, नेपाल, राजस्थान और उत्तर भारत में इस कथा के अलग-अलग रूप मिलते हैं।
कहीं जलंधरनाथ जी को रानी मैनावती का गुरु कहा गया है, तो कहीं स्वयं राजा गोपीचंद का गुरु बताया गया है। कुछ कथाओं में कानिफनाथ और गोरखनाथ की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
अधिकांश कथाओं में राजा गोपीचंद को सांसारिक वैभव त्यागकर योगमार्ग अपनाने वाला राजा बताया गया है। इन आख्यानों का ऐतिहासिक विवरण समान नहीं है, लेकिन उनका संदेश स्पष्ट है—राजपाट, धन, यौवन और शरीर स्थायी नहीं हैं।
गोपीचंद की कथा के माध्यम से जलंधरनाथ जी राजसत्ता के सामने वैराग्य और आत्मज्ञान की शक्ति के प्रतिनिधि बनकर सामने आते हैं।
इन कथाओं में संसार छोड़ना ही अंतिम संदेश नहीं है। वास्तविक शिक्षा मोह, अहंकार और सत्ता के दुरुपयोग का त्याग करना है।

