समाज के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ : नशाखोरी
प्रस्तावना : नशा केवल व्यक्ति की आदत नहीं, समाज का संकट है
इतिहास, कारण, दुष्परिणाम, व्यवस्था की विफलताएँ और समाधान
आलेख :- महिपाल सिंह
नशाखोरी वर्तमान समाज के सामने खड़ी सबसे घातक समस्याओं में से एक है। यह केवल शराब, अफीम, गांजा, स्मैक या किसी अन्य मादक पदार्थ के सेवन तक सीमित विषय नहीं है। नशा धीरे-धीरे मनुष्य की बुद्धि, निर्णय-क्षमता, स्वास्थ्य, चरित्र, परिवार, आर्थिक स्थिति और सामाजिक संबंधों पर अधिकार कर लेता है। जब यह प्रवृत्ति बड़ी संख्या में लोगों, विशेषकर युवाओं में फैलती है, तो यह व्यक्तिगत बीमारी से आगे बढ़कर पारिवारिक विघटन, अपराध, दुर्घटना, बेरोजगारी, गरीबी और सामाजिक असुरक्षा का कारण बन जाती है।
नशे की शुरुआत प्रायः उत्सुकता, मित्रों के दबाव, उत्सव, दिखावे, तनाव कम करने या क्षणिक आनंद प्राप्त करने के नाम पर होती है। प्रारम्भ में व्यक्ति कहता है कि वह केवल कभी-कभी सेवन करता है और जब चाहे इसे छोड़ सकता है। धीरे-धीरे शरीर और मस्तिष्क उस पदार्थ के अभ्यस्त हो जाते हैं। पहले जितना प्रभाव पाने के लिए अधिक मात्रा की आवश्यकता पड़ने लगती है। नशा न मिलने पर बेचैनी, चिड़चिड़ापन, घबराहट, दर्द, नींद की समस्या और मानसिक तनाव होने लगता है। अंततः व्यक्ति नशा आनंद के लिए नहीं, बल्कि सामान्य बने रहने और पीड़ा से बचने के लिए करने लगता है।
इसके बाद उसकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। माता-पिता, पत्नी, बच्चे, व्यवसाय, नौकरी, प्रतिष्ठा और स्वास्थ्य पीछे छूट जाते हैं तथा नशीला पदार्थ सबसे बड़ी आवश्यकता बन जाता है। इसी अवस्था में व्यक्ति घर का सामान, पत्नी के आभूषण, खेती की जमीन और व्यापारिक सम्पत्ति तक बेच सकता है। नशा प्राप्त करने के लिए चोरी, हिंसा और अन्य अपराध करने की आशंका भी बढ़ जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार शराब एक विषैला, मनो-सक्रिय और निर्भरता उत्पन्न करने वाला पदार्थ है। वर्ष 2019 के वैश्विक आकलन में शराब से लगभग 26 लाख मौतें जुड़ी थीं। शराब और अन्य मनो-सक्रिय पदार्थों से होने वाली हानि केवल बीमारी तक सीमित नहीं रहती; दुर्घटना, हिंसा, आत्महानि और पारिवारिक विघटन भी इससे जुड़े हैं।
भारत सरकार और एम्स के वर्ष 2019 में प्रकाशित राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार देश में लगभग 16 करोड़ लोग शराब का सेवन करते थे। लगभग 3.1 करोड़ लोग भांग या गांजा श्रेणी के पदार्थों तथा करीब 2.26 करोड़ लोग ओपिऑइड पदार्थों का उपयोग करते थे। करीब 5.7 करोड़ लोगों को हानिकारक अथवा निर्भर शराब-सेवन के कारण उपचार और सहायता की आवश्यकता आंकी गई थी। ओपिऑइड उपयोग से प्रभावित लगभग 77 लाख लोगों को भी सहायता की आवश्यकता बताई गई। ये आंकड़े कई वर्ष पुराने हैं; इसलिए वर्तमान वास्तविक संख्या भिन्न हो सकती है। फिर भी संकट के व्यापक आकार को समझने के लिए ये देश का सबसे महत्वपूर्ण आधिकारिक आधार हैं।
नशा और नशाखोरी में अंतर
किसी मनो-सक्रिय पदार्थ का एक बार सेवन और उस पदार्थ की लत एक ही बात नहीं है। लेकिन यह अंतर नशे को सुरक्षित नहीं बनाता। एक बार का प्रयोग भी दुर्घटना, विषाक्तता, हिंसा या गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा कर सकता है।
नशाखोरी या पदार्थ-निर्भरता की स्थिति में सामान्यतः निम्न लक्षण दिखाई देते हैं—
- पदार्थ प्राप्त करने और सेवन करने की तीव्र इच्छा।
- मात्रा तथा आवृत्ति पर नियंत्रण न रहना।
- पहले जितना प्रभाव पाने के लिए अधिक मात्रा लेना।
- नशा न मिलने पर शारीरिक या मानसिक परेशानी होना।
- स्वास्थ्य, परिवार और रोजगार को नुकसान होने के बाद भी सेवन जारी रखना।
- पढ़ाई, काम, परिवार और सामाजिक जिम्मेदारियों की उपेक्षा।
- बार-बार छोड़ने का प्रयास करना, पर सफल न होना।
- नशे के लिए झूठ बोलना, उधार लेना, चोरी करना या सम्पत्ति बेचना।
व्यक्ति की इच्छा-शक्ति महत्वपूर्ण है, लेकिन गंभीर लत को केवल चरित्र की कमजोरी कहना वैज्ञानिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से अनुचित है। नशे की लत में मस्तिष्क की पुरस्कार-प्रणाली, तनाव-प्रणाली और निर्णय लेने से जुड़े क्षेत्र प्रभावित होते हैं। बार-बार सेवन से पदार्थ और उससे जुड़ी जगहों, मित्रों तथा परिस्थितियों के प्रति तीव्र आकर्षण बनने लगता है। व्यक्ति परिणाम समझते हुए भी स्वयं को रोक नहीं पाता।
इसलिए नशे से ग्रस्त व्यक्ति को अपराधी, निकम्मा या परिवार का कलंक कहकर छोड़ देना समाधान नहीं है। उसे उसकी जिम्मेदारी समझाते हुए चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक परामर्श, पारिवारिक सहयोग और सामाजिक पुनर्वास उपलब्ध कराना आवश्यक है।
नशे का इतिहास : मानव सभ्यता के साथ चलती चुनौती
मादक पेय और चेतना को प्रभावित करने वाले पौधों का उपयोग मानव सभ्यता में बहुत प्राचीन रहा है। अलग-अलग क्षेत्रों में अनाज, फल, शहद और वनस्पतियों से किण्वित पेय बनाए जाते थे। कुछ पदार्थ धार्मिक अनुष्ठान, औषधि, दर्द नियंत्रण या सामाजिक अवसरों में उपयोग होते थे। लेकिन औषधीय या अनुष्ठानिक उपयोग और अनियंत्रित सेवन के बीच हमेशा अंतर रहा।
भारतीय प्राचीन साहित्य में ‘सुरा’ जैसे मादक पेयों के उल्लेख मिलते हैं। आधुनिक विद्वानों ने वैदिक और उत्तरवैदिक सामग्री के आधार पर सुरा को सामान्यतः किण्वित मादक पेय के रूप में पहचाना है। साथ ही यह सावधानी भी आवश्यक है कि वैदिक ‘सोम’ को बिना विवाद के आधुनिक शराब मान लेना उचित नहीं है। सोम की वास्तविक प्रकृति पर लंबे समय से विद्वानों में मतभेद है। अतः शास्त्रीय सामग्री का उपयोग करते समय आधुनिक अर्थों को प्राचीन शब्दों पर जबरन आरोपित नहीं किया जाना चाहिए।
प्राचीन भारतीय ग्रंथों में केवल पदार्थों का उल्लेख ही नहीं, बल्कि असंयम, प्रमाद और इन्द्रिय-वशता के दुष्परिणामों की चेतावनी भी मिलती है। धर्मशास्त्रों में मद्यपान को लेकर विभिन्न वर्गों और परिस्थितियों के लिए अलग-अलग नियम तथा प्रायश्चित्त वर्णित हैं। आयुर्वेदिक परम्परा में कुछ किण्वित औषधीय तैयारियों और चिकित्सा-प्रयोगों का वर्णन है, परन्तु चिकित्सा में नियंत्रित मात्रा और मनोरंजन के लिए अनियंत्रित सेवन एक समान नहीं हैं।
इतिहास से यह स्पष्ट होता है कि मादक पदार्थों की उपस्थिति नई नहीं है, लेकिन आधुनिक युग में इनके उत्पादन, परिष्करण, विपणन और वितरण की गति अत्यधिक बढ़ गई है। पहले स्थानीय स्तर पर उपलब्ध अपेक्षाकृत सीमित पदार्थों के स्थान पर अब अत्यधिक शक्तिशाली और शीघ्र निर्भरता उत्पन्न करने वाले पदार्थ उपलब्ध हैं। हेरोइन, कोकीन, एमडीएमए, एलएसडी, मेथाम्फेटामिन, अवैध औषधीय गोलियां तथा नए मनो-सक्रिय पदार्थों ने खतरे को कई गुना बढ़ा दिया है।
संयुक्त राष्ट्र की विश्व औषधि रिपोर्ट 2025 के अनुसार विश्व में भांग-गांजा श्रेणी के पदार्थ सबसे अधिक उपयोग किए जाने वाले अवैध ड्रग हैं; इसके बाद ओपिऑइड, एम्फेटामिन, कोकीन और अन्य पदार्थ आते हैं। रिपोर्ट संगठित अपराध, अवैध बाजार और उपचार की अपर्याप्त उपलब्धता को भी महत्वपूर्ण चुनौती मानती है।
भारतीय शास्त्रीय और आध्यात्मिक दृष्टि
भारतीय दर्शन का मूल उद्देश्य मनुष्य को विवेक, आत्मसंयम और जागरूकता की ओर ले जाना है। विभिन्न परम्पराओं की भाषा अलग हो सकती है, पर अधिकांश में चेतना को ढकने वाले प्रमाद, असंयम और इन्द्रिय-गुलामी से सावधान किया गया है।
वेद और वैदिक साहित्य
वेदों में सोम, सुरा और अन्य पेयों के उल्लेख अलग-अलग संदर्भों में मिलते हैं। इनमें से हर उल्लेख को आधुनिक शराब या नशाखोरी के समर्थन के रूप में प्रस्तुत करना गलत होगा। वैदिक समाज एकरूप नहीं था और अलग कालों तथा अनुष्ठानों के संदर्भ भी भिन्न थे।
शोध से यह पता चलता है कि ‘सुरा’ एक मादक पेय था और उसके निर्माण तथा प्रभाव के संकेत वैदिक साहित्य में मिलते हैं। लेकिन साथ ही असंयम और विवेक के विनाश को आदर्श जीवन नहीं माना गया। भारतीय धार्मिक परम्परा का व्यापक संदेश इन्द्रिय-निग्रह और चेतना की शुद्धि है।
उपनिषदों की दृष्टि
उपनिषदों का मुख्य विषय आत्मज्ञान है। वे मनुष्य को बाहरी भोगों की क्षणभंगुरता समझाकर विवेक, संयम और सत्य की ओर ले जाते हैं। नशा मन की स्पष्टता कम करता है, जबकि उपनिषद मन, बुद्धि और चेतना को जागृत करने पर बल देते हैं। इस दृष्टि से नशाखोरी उपनिषदों के आत्मनियंत्रण और आत्मबोध के मार्ग के विपरीत पड़ती है।
भगवद्गीता और तीन गुण
भगवद्गीता में नशे की आधुनिक सूची नहीं दी गई, लेकिन सात्त्विकता, राजसिकता और तामसिकता के माध्यम से मानव व्यवहार का विश्लेषण मिलता है। प्रमाद, आलस्य, मोह और विवेकहीनता को तामसिक स्थिति से जोड़ा गया है। नशा व्यक्ति को मानसिक अस्पष्टता, प्रमाद और नियंत्रणहीनता की ओर ले जाता है। इसलिए गीता की आत्मसंयम, योग और संतुलन की शिक्षा नशामुक्त जीवन के पक्ष में महत्वपूर्ण नैतिक आधार प्रदान करती है।
रामायण और महाभारत
रामायण और महाभारत में असंयम, अहंकार, वासना, जुआ और विवेकहीन व्यवहार से परिवारों तथा राज्यों के विनाश की कथाएं हैं। इन महाकाव्यों का व्यापक संदेश है कि शक्तिशाली व्यक्ति भी यदि अपनी इन्द्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण खो दे, तो उसका पतन संभव है।
ऋग्वेद के प्रसिद्ध अक्षसूक्त में जुए की लत से परिवार और जीवन के विनाश का अत्यंत मार्मिक वर्णन मिलता है। यद्यपि यह पदार्थ-नशे के बजाय जुए की लत का प्रसंग है, फिर भी इसकी मनोवैज्ञानिक संरचना आधुनिक व्यसन से बहुत मिलती है—बार-बार हानि होने के बाद भी व्यक्ति स्वयं को रोक नहीं पाता और परिवार उससे दूर होने लगता है।
धर्मशास्त्रों की दृष्टि
मनुस्मृति सहित धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में मद्यपान के संबंध में निषेध, दंड और प्रायश्चित्त के विवरण मिलते हैं। हालांकि इन ग्रंथों को उनके ऐतिहासिक, सामाजिक और वर्ण-आधारित संदर्भ में समझना चाहिए। इनकी प्रत्येक व्यवस्था को आधुनिक कानून की तरह लागू नहीं किया जा सकता। फिर भी यह स्पष्ट है कि प्राचीन समाज भी मादक पेयों से उत्पन्न नैतिक और सामाजिक नुकसान को पहचानता था।
आयुर्वेद : औषधि और व्यसन का अंतर
आयुर्वेद में मद्य और किण्वित औषधीय तैयारियों का वर्णन मिलता है। कुछ संदर्भों में उनका नियंत्रित चिकित्सा-उपयोग बताया गया है। इससे यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि आयुर्वेद अनियंत्रित मद्यपान को उचित मानता है।
औषधि किसी प्रशिक्षित चिकित्सक की सलाह, निश्चित मात्रा, निश्चित उद्देश्य और निश्चित अवधि के लिए दी जाती है। व्यसन में व्यक्ति मात्रा, समय और उद्देश्य पर नियंत्रण खो देता है। औषधीय उपयोग को सामाजिक नशाखोरी का धार्मिक या चिकित्सकीय समर्थन नहीं बनाया जा सकता।
बौद्ध और जैन दृष्टि
बौद्ध धर्म के पंचशील में मादक पदार्थों से बचना महत्वपूर्ण व्रत माना गया है, क्योंकि वे प्रमाद और असावधानी उत्पन्न करते हैं। बौद्ध दृष्टि में नशे की समस्या केवल पदार्थ तक सीमित नहीं; नशे से जागरूकता घटती है और व्यक्ति हिंसा, झूठ, चोरी तथा अन्य अनैतिक कर्मों की ओर जा सकता है।
जैन दर्शन में संयम, अहिंसा, सावधानी और इन्द्रिय-निग्रह का अत्यधिक महत्व है। नशा व्यक्ति की सावधानी और आत्मनियंत्रण को प्रभावित करता है। नशे में स्वयं को, परिवार को या किसी अन्य जीव को नुकसान पहुंचाना अहिंसा और संयम की भावना के विपरीत है।
धार्मिक परम्पराओं का साझा संदेश
शास्त्रों से मिलने वाला उपयोगी निष्कर्ष यह नहीं है कि केवल किसी एक श्लोक के आधार पर नशे का विरोध किया जाए। व्यापक निष्कर्ष यह है कि भारतीय आध्यात्मिक परम्पराएं—
- जागरूकता को प्रमाद से ऊपर रखती हैं।
- संयम को अनियंत्रित भोग से श्रेष्ठ मानती हैं।
- विवेक को मानसिक धुंध से बचाने की शिक्षा देती हैं।
- शरीर को साधना और कर्तव्य का माध्यम मानती हैं।
- परिवार तथा समाज के प्रति जिम्मेदारी पर बल देती हैं।
इसलिए धर्म का उपयोग केवल डराने के लिए नहीं, बल्कि व्यक्ति में आत्मसम्मान, आत्मसंयम और जीवन के उद्देश्य को पुनर्जीवित करने के लिए किया जाना चाहिए।
आधुनिक नशों के प्रमुख प्रकार
नशे की चर्चा केवल शराब तक सीमित नहीं रह सकती। आज कई प्रकार के पदार्थ युवाओं तक पहुंच रहे हैं।
शराब
शराब सबसे व्यापक रूप से उपलब्ध मनो-सक्रिय पदार्थों में से एक है। देशी शराब, बीयर, वाइन और विभिन्न प्रकार की स्पिरिट अलग नामों से बेची जाती हैं, पर सभी में एथेनॉल मुख्य नशीला तत्व होता है।
शराब निर्णय-क्षमता, प्रतिक्रिया की गति और शारीरिक समन्वय को प्रभावित करती है। अधिक मात्रा बेहोशी, उल्टी में दम घुटने, दुर्घटना, हिंसा, स्मृति लोप और मृत्यु तक का कारण बन सकती है। लंबे समय तक अत्यधिक सेवन मस्तिष्क, यकृत, हृदय, अग्न्याशय, पाचन-तंत्र और प्रतिरक्षा-प्रणाली को नुकसान पहुंचा सकता है। शराब कम से कम सात प्रकार के कैंसर से जुड़ी हुई है।
तंबाकू और निकोटिन
बीड़ी, सिगरेट, हुक्का, चिलम, जर्दा, खैनी, गुटखा, पान-मसाला तथा वेपिंग उत्पाद निकोटिन-निर्भरता उत्पन्न कर सकते हैं। सामाजिक चर्चा में अक्सर तंबाकू को शराब या ड्रग से अलग रखा जाता है, जबकि यह अत्यंत शक्तिशाली लत और गंभीर बीमारी का कारण है।
तंबाकू का सेवन कैंसर, हृदय रोग, फेफड़ों की बीमारी और समयपूर्व मृत्यु का प्रमुख जोखिम है। परिवार के अन्य सदस्य भी परोक्ष धूम्रपान से प्रभावित होते हैं।
अफीम, डोडा और ओपिऑइड
अफीम, डोडा-पोस्त, हेरोइन या स्मैक, मॉर्फिन तथा कुछ चिकित्सकीय दर्दनिवारक दवाएं ओपिऑइड श्रेणी में आती हैं। ये पदार्थ दर्द कम कर सकते हैं और सुखद अनुभूति दे सकते हैं, लेकिन इनके प्रति निर्भरता और अधिक मात्रा से मृत्यु का खतरा बहुत अधिक है।
हेरोइन या अन्य ओपिऑइड श्वसन को धीमा कर सकते हैं। इंजेक्शन से सेवन करने पर एचआईवी, हेपेटाइटिस और गंभीर संक्रमणों का खतरा बढ़ता है।
भांग, गांजा और चरस
भांग, गांजा और चरस को कई लोग प्राकृतिक या धार्मिक नाम देकर पूरी तरह सुरक्षित मान लेते हैं। यह धारणा भ्रामक है। इनसे स्मृति, ध्यान, प्रतिक्रिया, निर्णय-क्षमता और मानसिक स्थिति प्रभावित हो सकती है। कम आयु में लगातार उपयोग विशेष रूप से चिंता का विषय है।
सभी उपयोगकर्ताओं में समान दुष्प्रभाव नहीं होते, लेकिन उच्च मात्रा और संवेदनशील व्यक्तियों में घबराहट, भ्रम, मानसिक विक्षिप्तता जैसे लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं।
सिंथेटिक ड्रग
एमडीएमए, मेथाम्फेटामिन, एलएसडी और नए मनो-सक्रिय पदार्थ अक्सर पार्टी ड्रग या ऊर्जा बढ़ाने वाले पदार्थ के रूप में बेचे जाते हैं। इनके वास्तविक घटक उपयोगकर्ता को पता नहीं होते। मिलावट, गलत मात्रा और कई पदार्थों का मिश्रण जानलेवा हो सकता है।
भारत की नारकोटिक्स व्यवस्था ने हेरोइन, एलएसडी, एमडीएमए, गांजा, चरस और कोकीन सहित विभिन्न पदार्थों के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूकता सामग्री जारी की है।
चिकित्सकीय दवाओं का दुरुपयोग
नींद की गोलियां, चिंता कम करने वाली दवाएं, दर्दनिवारक, खांसी की कुछ दवाएं और उत्तेजक औषधियां चिकित्सकीय उपयोग में आवश्यक हो सकती हैं। लेकिन बिना चिकित्सकीय सलाह, अधिक मात्रा में या नशे के उद्देश्य से लेने पर निर्भरता उत्पन्न हो सकती है।
दवा दुकान से बिना उचित पर्चे के बिक्री, एक से अधिक चिकित्सकों से पर्चे लेना तथा इंटरनेट से दवाएं मंगाना इस समस्या को बढ़ा सकता है।
इनहेलेंट
गोंद, पेट्रोल, थिनर, पेंट, सफाई के रसायन और अन्य वाष्पशील पदार्थों को सूंघकर नशा करना विशेष रूप से बच्चों और आर्थिक रूप से कमजोर किशोरों में देखा जाता है। ये सस्ते और आसानी से उपलब्ध होते हैं, लेकिन मस्तिष्क, यकृत, गुर्दे और हृदय को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
नशा मस्तिष्क पर अधिकार कैसे करता है?
मानव मस्तिष्क आनंददायक और जीवनोपयोगी क्रियाओं को दोहराने के लिए पुरस्कार-प्रणाली का उपयोग करता है। भोजन, सामाजिक संबंध, उपलब्धि और प्रेम जैसी अनुभूतियां इस प्रणाली को सक्रिय करती हैं। नशीले पदार्थ इस प्राकृतिक प्रणाली को असामान्य रूप से प्रभावित करते हैं।
बार-बार नशा करने पर मस्तिष्क पदार्थ को अत्यधिक महत्वपूर्ण मानने लगता है। धीरे-धीरे साधारण आनंद—परिवार से मिलना, काम पूरा करना, संगीत सुनना या मित्र से बात करना—कम प्रभावशाली लगने लगते हैं। व्यक्ति को सामान्य महसूस करने के लिए भी नशे की आवश्यकता होने लगती है।
लत का चक्र तीन अवस्थाओं में समझा जा सकता है—
- नशा और पुरस्कार: पदार्थ से आनंद, तनाव में अस्थायी कमी या सामाजिक संकोच में कमी महसूस होती है।
- अभाव और नकारात्मक स्थिति: प्रभाव समाप्त होने पर बेचैनी, दुख, चिड़चिड़ापन, चिंता या शारीरिक तकलीफ होती है।
- तीव्र इच्छा और पुनः सेवन: व्यक्ति पदार्थ के बारे में सोचता रहता है और दोबारा सेवन करता है।
समय के साथ निर्णय, योजना और आत्मनियंत्रण से जुड़ा मस्तिष्क का भाग भी प्रभावित हो सकता है। यही कारण है कि व्यक्ति नुकसान समझते हुए भी नशे की तलाश करता है।
इस प्रक्रिया से यह समझना आवश्यक है कि केवल डांट, अपमान या शपथ दिलाना पर्याप्त नहीं है। इलाज में मस्तिष्क और शरीर की निर्भरता, मानसिक तनाव, सामाजिक वातावरण और व्यवहार—सभी को संबोधित करना पड़ता है।
युवा नशे की ओर क्यों बढ़ते हैं?
नशे की लत का कोई एक कारण नहीं होता। सामान्यतः कई कारण मिलकर व्यक्ति को जोखिम में डालते हैं।
उत्सुकता और मित्रों का दबाव
किशोर और युवा नई चीजों का अनुभव करना चाहते हैं। मित्र-मंडली में नशे को साहस, आधुनिकता या पुरुषत्व से जोड़कर प्रस्तुत किया जाए तो युवा प्रयोग कर सकता है।
परिवार का वातावरण
घर में नियमित शराब या तंबाकू का सेवन, हिंसा, उपेक्षा, अत्यधिक तनाव या माता-पिता के बीच लगातार विवाद बच्चे को जोखिम में डाल सकते हैं। वह नशे को सामान्य व्यवहार मान सकता है या भावनात्मक पीड़ा से बचने के लिए उसका उपयोग कर सकता है।
अकेलापन और संवाद की कमी
जब बच्चे को अपनी समस्या रखने, असफलता बताने या भावनाएं व्यक्त करने का सुरक्षित स्थान नहीं मिलता, तो वह मित्रों या ऑनलाइन समूहों की ओर जाता है। गलत संगति में नशा भावनात्मक सहारे के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य की समस्या
अवसाद, चिंता, आघात, ध्यान की समस्या और व्यक्तित्व संबंधी कठिनाइयां नशे के जोखिम को बढ़ा सकती हैं। कुछ लोग मानसिक पीड़ा कम करने के लिए स्वयं ही शराब या दवाएं लेना शुरू करते हैं। इससे थोड़े समय की राहत मिल सकती है, पर दीर्घकाल में मूल बीमारी और नशा दोनों गंभीर हो जाते हैं।
बेरोजगारी और भविष्य की निराशा
रोजगार न मिलना, परीक्षा में असफलता, आर्थिक असमानता और जीवन में उद्देश्य का अभाव युवा को निराश कर सकता है। नशे का व्यापार ऐसे युवाओं को उपभोक्ता के साथ वाहक और छोटे विक्रेता के रूप में भी इस्तेमाल कर सकता है।
सहज उपलब्धता
जिस क्षेत्र में शराब, तंबाकू, अफीम, डोडा, स्मैक या गोलियां आसानी से मिलती हैं, वहां प्रयोग की संभावना बढ़ती है। विद्यालय, छात्रावास और श्रमिक क्षेत्रों के आसपास अवैध बिक्री विशेष चिंता का विषय है।
विज्ञापन और सांस्कृतिक महिमामंडन
प्रत्यक्ष विज्ञापन पर रोक होने के बावजूद सरोगेट विज्ञापन, फिल्मों, गीतों, सोशल मीडिया और प्रभावशाली व्यक्तियों के माध्यम से नशे को आकर्षक जीवनशैली से जोड़ा जा सकता है।
जब शराब की बोतल, धूम्रपान या पार्टी ड्रग को सफलता, मित्रता, प्रेम और स्वतंत्रता का प्रतीक बनाया जाता है, तो हानि की वास्तविक तस्वीर छिप जाती है।
व्यक्ति के स्वास्थ्य पर प्रभाव
नशे का प्रभाव पदार्थ, मात्रा, अवधि, आयु, स्वास्थ्य और सेवन के तरीके पर निर्भर करता है। फिर भी कुछ सामान्य नुकसान स्पष्ट हैं।
मस्तिष्क और मानसिक स्वास्थ्य
लगातार नशा स्मृति, एकाग्रता, निर्णय, प्रतिक्रिया और भावनात्मक नियंत्रण को प्रभावित कर सकता है। चिंता, अवसाद, भ्रम, आक्रामकता और आत्मघाती विचारों का जोखिम बढ़ सकता है। कुछ पदार्थ मानसिक विक्षिप्तता को जन्म दे सकते हैं या पहले से मौजूद मानसिक बीमारी को गंभीर बना सकते हैं।
यकृत और पाचन-तंत्र
अत्यधिक शराब सेवन से फैटी लिवर, हेपेटाइटिस, सिरोसिस, अग्न्याशय की सूजन तथा पाचन-तंत्र में रक्तस्राव जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
हृदय और रक्तचाप
शराब तथा उत्तेजक ड्रग हृदयगति और रक्तचाप को प्रभावित कर सकते हैं। लंबे समय का अत्यधिक सेवन हृदय की मांसपेशी को कमजोर कर सकता है और अनियमित धड़कन, उच्च रक्तचाप तथा हृदयाघात का जोखिम बढ़ा सकता है।
कैंसर
शराब और तंबाकू दोनों कैंसर के महत्वपूर्ण जोखिम-कारक हैं। शराब को अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी ने समूह–1 कार्सिनोजेन के रूप में वर्गीकृत किया है। शराब मुख, गला, अन्ननली, यकृत, बड़ी आंत और स्तन सहित कई कैंसरों से जुड़ी है।
पोषण और मस्तिष्क क्षति
लंबे समय तक अत्यधिक शराब पीने वाले लोगों में पोषण की कमी हो सकती है। विटामिन बी–1 की गंभीर कमी से वर्निके-कोर्साकॉफ सिंड्रोम जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिसमें भ्रम, चलने में कठिनाई और स्थायी स्मृति-हानि तक हो सकती है।
अधिक मात्रा और मृत्यु
अधिक शराब से व्यक्ति बेहोश हो सकता है और उल्टी में दम घुट सकता है। ओपिऑइड अधिक मात्रा में श्वसन रोक सकते हैं। सिंथेटिक पदार्थों की वास्तविक मात्रा और मिलावट पता न होने से खतरा और बढ़ जाता है।
बेहोश व्यक्ति को केवल सुला देना खतरनाक है। धीमी या अनियमित सांस, नीली या अत्यधिक पीली त्वचा, दौरा, बार-बार उल्टी, भ्रम या होश न आना आपात स्थिति के संकेत हैं।
परिवार पर नशाखोरी का प्रभाव
नशे की सबसे बड़ी कीमत केवल सेवन करने वाला व्यक्ति नहीं चुकाता। पूरा परिवार उसके साथ पीड़ित होता है।
आर्थिक विनाश
नशे पर नियमित खर्च परिवार की आय का बड़ा हिस्सा समाप्त कर देता है। पहले बचत बंद होती है, फिर उधार लिया जाता है, उसके बाद आभूषण, वाहन, पशु, जमीन और व्यापारिक सामान बेचा जा सकता है।
घरेलू हिंसा और भय
नशे में निर्णय और आत्मनियंत्रण कमजोर होने से गाली-गलौज, मारपीट, यौन हिंसा और बच्चों को प्रताड़ित करने की घटनाएं हो सकती हैं। परिवार लगातार भय में जीता है।
पत्नी और बच्चों पर बोझ
पत्नी को आर्थिक जिम्मेदारी, सामाजिक अपमान और शारीरिक खतरे का सामना करना पड़ सकता है। बच्चे पढ़ाई छोड़कर कमाने लग सकते हैं। उनमें भय, हीनभावना, क्रोध और अवसाद विकसित हो सकता है।
विश्वास का समाप्त होना
नशे की लत में व्यक्ति बार-बार झूठ बोल सकता है, वादा तोड़ सकता है और पैसे छिपा सकता है। परिवार सहायता करना चाहता है, लेकिन लगातार धोखे से विश्वास समाप्त होने लगता है।
अगली पीढ़ी पर प्रभाव
नशे वाले घर में पलने वाला बच्चा या तो नशे को सामान्य मान सकता है या उससे गहरी घृणा और मानसिक आघात लेकर बड़ा हो सकता है। दोनों स्थितियां उसके भविष्य के संबंधों और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं।
परिवार को यह समझना चाहिए कि सहायता और सक्षम बनाना अलग बातें हैं। हर बार कर्ज चुकाना, अपराध छिपाना या नशे के लिए पैसा देना समस्या को बढ़ा सकता है। परिवार को प्रेम के साथ स्पष्ट सीमाएं तय करनी चाहिए और उपचार से जोड़ना चाहिए।
नशा, दुर्घटनाएं और अपराध
नशा निर्णय, प्रतिक्रिया और समन्वय को प्रभावित करता है। इसलिए सड़क दुर्घटना, कार्यस्थल दुर्घटना, डूबना, गिरना, आग लगना और हिंसक घटनाओं का जोखिम बढ़ता है।
भारत में वर्ष 2023 में लगभग 4.81 लाख सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं। प्रत्येक दुर्घटना को नशे से नहीं जोड़ा जा सकता, लेकिन शराब पीकर वाहन चलाना सड़क सुरक्षा का गंभीर और रोके जा सकने वाला खतरा है।
नशे और अपराध का संबंध कई रूपों में दिखाई देता है—
- नशे की अवस्था में हिंसा या हत्या।
- नशा खरीदने के लिए चोरी और लूट।
- परिवार की सम्पत्ति पर जबरन कब्जा या बिक्री।
- अवैध व्यापार से जुड़े गिरोह, हथियार और धनशोधन।
- महिलाओं तथा बच्चों के विरुद्ध अपराध।
- नशीले पदार्थों की तस्करी में युवाओं का उपयोग।
- इंजेक्शन नशे से जुड़े स्वास्थ्य और सार्वजनिक सुरक्षा संकट।
यह कहना गलत होगा कि हर नशाग्रस्त व्यक्ति अपराधी बन जाता है। अधिकांश को उपचार और सहायता की आवश्यकता होती है। लेकिन गंभीर निर्भरता, अभाव की स्थिति, हिंसक वातावरण और अवैध बाजार मिलकर अपराध का जोखिम बढ़ा सकते हैं।
क्या प्रशासन और राजनीति दोषी हैं?
इस प्रश्न का उत्तर केवल “हाँ” या “नहीं” में देना उचित नहीं होगा। नशाखोरी के विस्तार के लिए कई स्तरों की जिम्मेदारी है—उपभोक्ता, परिवार, समाज, अवैध व्यापारी, औषधि विक्रेता, शराब उद्योग, प्रशासन, पुलिस, सीमा सुरक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था और राजनीतिक नेतृत्व।
प्रशासन की जिम्मेदारी
- अवैध उत्पादन और बिक्री रोके।
- विद्यालयों के आसपास नशीले पदार्थों की उपलब्धता समाप्त करे।
- तस्करी और संगठित गिरोहों पर कार्रवाई करे।
- दवा दुकानों में नियंत्रित औषधियों की बिक्री की निगरानी करे।
- शराब पीकर वाहन चलाने पर कठोर कार्रवाई करे।
- उपचार और पुनर्वास केन्द्र उपलब्ध कराए।
- जब्त पदार्थों और मुकदमों की पारदर्शी निगरानी करे।
- जनता को शिकायत के सुरक्षित साधन दे।
कार्रवाई क्यों कमजोर दिखाई देती है?
इसके कई कारण हो सकते हैं—
- तस्करी के नेटवर्क का अनेक राज्यों और देशों तक फैला होना।
- सीमित कर्मचारी, प्रयोगशालाएं और जांच संसाधन।
- स्थानीय स्तर पर सूचना और गवाहों की कमी।
- छोटे विक्रेताओं पर कार्रवाई, लेकिन बड़े नेटवर्क तक न पहुंच पाना।
- भ्रष्टाचार या मिलीभगत के व्यक्तिगत मामले।
- धीमी न्यायिक प्रक्रिया।
- पदार्थ की पहचान, नमूना, तलाशी और जब्ती में कानूनी प्रक्रिया की त्रुटियां।
- उपचार की कमी के कारण मांग लगातार बने रहना।
- वैध शराब से मिलने वाले राजस्व और स्वास्थ्य-हानि के बीच नीतिगत विरोधाभास।
क्या नेता और अधिकारी कमाई के कारण कार्रवाई नहीं करते?
बिना प्रमाण सभी नेताओं या अधिकारियों पर ऐसा आरोप लगाना उचित नहीं है। अनेक अधिकारी ईमानदारी से कार्रवाई करते हैं और कभी-कभी अपने जीवन को भी जोखिम में डालते हैं। दूसरी ओर अवैध व्यापार में भ्रष्टाचार, संरक्षण या मिलीभगत की संभावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता।
इस विषय पर जिम्मेदार लेखन का तरीका यह है कि किसी व्यक्ति या संस्था पर आरोप लगाने से पहले प्राथमिकी, आरोपपत्र, न्यायालय का आदेश, सरकारी जांच, संसदीय रिपोर्ट या अन्य प्रमाणित सामग्री प्रस्तुत की जाए।
समस्या का वास्तविक स्वरूप यह है कि नशे का अवैध बाजार अत्यधिक लाभ देता है। जहां लाभ बहुत अधिक होता है, वहां अपराधी राजनीतिक, पुलिस, सीमा, परिवहन और स्थानीय तंत्र को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। इसलिए केवल छोटे उपभोक्ता को पकड़ना पर्याप्त नहीं; वित्तीय नेटवर्क, बड़े आपूर्तिकर्ता और संरक्षण देने वाले लोगों तक जांच पहुंचनी चाहिए।
वैध शराब का प्रश्न
राज्यों को शराब से राजस्व प्राप्त होता है, जबकि शराब से स्वास्थ्य, दुर्घटना, हिंसा और उत्पादकता की सामाजिक लागत भी उत्पन्न होती है। सरकार के सामने यह नीतिगत विरोधाभास है कि एक ओर शराब की बिक्री से आय होती है और दूसरी ओर उसी पदार्थ की हानि रोकने पर सार्वजनिक धन खर्च करना पड़ता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन शराब की उपलब्धता सीमित करने, नशे में वाहन चलाने पर नियंत्रण, उपचार बढ़ाने, विज्ञापन पर रोक और मूल्य तथा कर-नीति जैसे उपायों को प्रभावी मानता है। उद्योग के आर्थिक हितों और जनस्वास्थ्य नीति के बीच संभावित हित-संघर्ष का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन भी आवश्यक बताया गया है।
भारत का कानून और नशामुक्ति व्यवस्था
भारत में नारकोटिक ड्रग्स और साइकोट्रॉपिक पदार्थों के उत्पादन, कब्जे, बिक्री, खरीद, परिवहन और सेवन को मुख्यतः नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेज अधिनियम, 1985 नियंत्रित करता है। अपराध और दंड पदार्थ तथा मात्रा के अनुसार अलग हो सकते हैं।
संविधान के अनुच्छेद 47 में राज्य से अपेक्षा की गई है कि औषधीय प्रयोजनों को छोड़कर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पेयों और औषधियों के सेवन को रोकने की दिशा में प्रयास करे। भारत की राष्ट्रीय नारकोटिक्स नीति भी इस संवैधानिक सिद्धान्त का उल्लेख करती है।
कानून आवश्यक है, लेकिन कानून अकेले लत समाप्त नहीं कर सकता। आपूर्ति रोकने के साथ मांग कम करना, उपचार, पुनर्वास और सामाजिक पुनर्स्थापन भी आवश्यक हैं।
भारत सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय नशा मांग न्यूनीकरण कार्ययोजना और नशामुक्त भारत अभियान जैसे कार्यक्रम चलाए गए हैं। इनका उद्देश्य जागरूकता, उपचार, पुनर्वास और सामुदायिक भागीदारी बढ़ाना है।
नशामुक्ति का सही उपचार
नशे से मुक्ति केवल शपथ, डांट, मारपीट, बंधक बनाकर रखने या किसी अप्रमाणित चूर्ण से संभव नहीं होती। गंभीर निर्भरता में वैज्ञानिक उपचार आवश्यक है।
चिकित्सकीय मूल्यांकन
सबसे पहले यह पता लगाना चाहिए कि व्यक्ति कौन-सा पदार्थ, कितनी मात्रा में और कब से ले रहा है। उसके यकृत, हृदय, मानसिक स्वास्थ्य, पोषण, संक्रमण और अन्य बीमारियों की जांच आवश्यक हो सकती है।
सुरक्षित विषहरण
लंबे समय से अत्यधिक शराब पीने वाला व्यक्ति अचानक सेवन बंद करे तो गंभीर अभाव-लक्षण हो सकते हैं। कंपकंपी, पसीना, घबराहट, रक्तचाप बढ़ना, उल्टी, भ्रम और दौरे पड़ सकते हैं। गंभीर शराब-निर्भरता में अचानक बंद करना जानलेवा भी हो सकता है; इसलिए चिकित्सकीय निगरानी आवश्यक है।
औषधीय उपचार
कुछ पदार्थ-निर्भरता में चिकित्सक प्रमाणित दवाओं का उपयोग कर सकते हैं। ओपिऑइड निर्भरता में भी दीर्घकालीन औषधीय उपचार उपलब्ध है। दवा का चयन केवल प्रशिक्षित चिकित्सक करे।
मनोवैज्ञानिक परामर्श
व्यक्ति को अपने ट्रिगर पहचानना, इच्छा पर नियंत्रण करना, तनाव से निपटना, गलत संगति से दूरी बनाना और जीवन की नई दिनचर्या विकसित करना सीखना होता है।
परिवार की भूमिका
परिवार को उपचार प्रक्रिया में शामिल करना चाहिए। उन्हें लत की प्रकृति, पुनः सेवन के जोखिम और सीमाएं निर्धारित करने की जानकारी दी जानी चाहिए।
पुनर्वास और रोजगार
व्यक्ति नशा छोड़ने के बाद यदि बेरोजगार, अपमानित और अकेला छोड़ दिया जाए तो वह पुनः नशे की ओर लौट सकता है। कौशल, रोजगार, सामाजिक स्वीकृति और नियमित समर्थन आवश्यक हैं।
आध्यात्मिक सहयोग
प्रार्थना, ध्यान, सत्संग, योग और सेवा व्यक्ति को उद्देश्य और आत्मबल दे सकते हैं। लेकिन इन्हें चिकित्सा का विकल्प नहीं, उपचार के सहयोगी साधन के रूप में अपनाना चाहिए।
परिवार क्या करे?
परिवार को समस्या छिपानी नहीं चाहिए। आरम्भिक संकेत दिखने पर शीघ्र हस्तक्षेप करना चाहिए।
- शांत समय में व्यक्ति से बात करें।
- नशे की अवस्था में विवाद न करें।
- प्रमाण और व्यवहार के आधार पर बात करें।
- नशे के लिए पैसा न दें।
- हिंसा की स्थिति में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा पहले सुनिश्चित करें।
- चिकित्सक या नशामुक्ति विशेषज्ञ से संपर्क करें।
- अप्रमाणित या हिंसक केन्द्र में व्यक्ति को न भेजें।
- उपचार के बाद भी नियमित निगरानी रखें।
- पुनः सेवन होने पर इसे पूर्ण विफलता न मानें, पर गंभीरता से उपचार में वापस लाएं।
“हमारे परिवार की बदनामी होगी” सोचकर समस्या छिपाने से बीमारी बढ़ती है। नशा कोई प्रतिष्ठा बचाने का विषय नहीं, जीवन बचाने का विषय है।
समाज और सामाजिक संस्थाओं की भूमिका
सामाजिक संस्थाएं केवल नशामुक्ति रैली निकालकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकतीं। उन्हें स्थायी व्यवस्था बनानी होगी।
ग्राम और मोहल्ला स्तर पर
- नशे की अवैध बिक्री की गोपनीय सूचना व्यवस्था।
- उपचार केन्द्रों और चिकित्सकों की सत्यापित सूची।
- परिवारों के लिए सहायता समूह।
- विद्यालयों और युवाओं के लिए नियमित संवाद।
- खेल, पुस्तकालय, कौशल और रोजगार गतिविधियां।
- नशा छोड़ चुके व्यक्तियों को पुनः सम्मानपूर्वक जोड़ना।
समाज के आयोजनों में
- शराब और तंबाकू से मुक्त समारोह।
- नशे को प्रतिष्ठा का प्रतीक न बनाना।
- धार्मिक उत्सवों में नशीले पदार्थों के उपयोग को परम्परा कहकर प्रोत्साहित न करना।
- विवाह और सामाजिक कार्यक्रमों में नशामुक्त आयोजन को सम्मान देना।
धार्मिक संस्थाओं की भूमिका
धार्मिक मंच भय या अपमान के बजाय करुणा, संयम और उपचार का संदेश दें। मंदिर, मठ, धर्मशाला और समाज भवन परामर्श शिविर, परिवार बैठक और पुनर्वास सहयोग के केन्द्र बन सकते हैं।
व्यापारी समाज की भूमिका
व्यापारी नशीले पदार्थों के अवैध व्यापार, बिना पर्चे नियंत्रित दवाओं की बिक्री और नशे को बढ़ावा देने वाले आयोजनों से दूरी रखें। उद्योग और प्रतिष्ठान कर्मचारियों के लिए नशामुक्ति नीति तथा गोपनीय सहायता व्यवस्था बना सकते हैं।
सरकार के लिए आवश्यक कार्ययोजना
नशाखोरी को नियंत्रित करने के लिए केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। एक समन्वित नीति आवश्यक है।
मांग घटाना
विद्यालयों में डराने वाले भाषण के बजाय जीवन-कौशल, मानसिक स्वास्थ्य, मित्र-दबाव से निपटने और सहायता मांगने की शिक्षा दी जाए।
उपलब्धता नियंत्रित करना
विद्यालयों, छात्रावासों, श्रमिक बस्तियों और संवेदनशील क्षेत्रों के आसपास शराब, तंबाकू और अवैध पदार्थों की बिक्री पर विशेष निगरानी हो।
विज्ञापन और महिमामंडन रोकना
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विज्ञापन, सरोगेट ब्रांडिंग, ऑनलाइन प्रचार और नशे को आकर्षक दिखाने वाली प्रायोजित सामग्री पर कठोर नियंत्रण हो।
उपचार का विस्तार
हर जिले में प्रशिक्षित चिकित्सक, परामर्शदाता और प्रमाणित नशामुक्ति सेवा उपलब्ध हो। उपचार को दंड के डर से अलग रखा जाए, ताकि परिवार सहायता लेने से न डरें।
पुनर्वास केन्द्रों का नियमन
कई निजी केन्द्रों में अमानवीय व्यवहार, मारपीट, बंदीकरण और अप्रमाणित उपचार की शिकायतें सामने आती हैं। सभी केन्द्रों का पंजीकरण, निरीक्षण और शिकायत तंत्र आवश्यक है।
बड़े नेटवर्क पर आर्थिक प्रहार
तस्करी के बड़े गिरोह, वित्तीय लाभार्थी, बेनामी सम्पत्ति, परिवहन नेटवर्क और डिजिटल भुगतान की जांच की जाए। केवल अंतिम स्तर के छोटे विक्रेता को पकड़ने से बाजार समाप्त नहीं होगा।
पारदर्शी आंकड़े
जिलेवार नशा-उपयोग, उपचार, मृत्यु, अधिक मात्रा, जब्ती, मुकदमे और दोषसिद्धि के आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं। देश का व्यापक सर्वेक्षण नियमित अंतराल पर दोहराया जाना चाहिए।
- समाज के लिए दस सूत्रीय नशामुक्ति संकल्प
- नशे को प्रतिष्ठा, आधुनिकता या पुरुषत्व का प्रतीक नहीं बनाएंगे।
- विवाह और सामाजिक आयोजनों को नशामुक्त रखेंगे।
- बच्चों के सामने शराब और तंबाकू का सामान्यीकरण नहीं करेंगे।
- नशाग्रस्त व्यक्ति को अपमानित करने के बजाय उपचार से जोड़ेंगे।
- हिंसा और अपराध को बीमारी के नाम पर छिपाएंगे नहीं।
- अवैध बिक्री की प्रमाणित सूचना प्रशासन को देंगे।
- विद्यालयों में नियमित जीवन-कौशल और मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा का समर्थन करेंगे।
- नशा छोड़ चुके लोगों को समाज में पुनः सम्मान देंगे।
- अप्रमाणित नशामुक्ति केन्द्रों और चमत्कारी इलाज से सावधान रहेंगे।
- परिवार में संवाद, साथ बैठना, खेल, सेवा और सामुदायिक जीवन को पुनर्जीवित करेंगे।
निष्कर्ष : नशे के विरुद्ध युद्ध व्यक्ति से नहीं, प्रवृत्ति से है
नशाखोरी का संकट केवल पुलिस, सरकार या चिकित्सक के भरोसे समाप्त नहीं होगा। कानून आपूर्ति रोक सकता है, चिकित्सक शरीर और मस्तिष्क का उपचार कर सकता है, पर परिवार और समाज को व्यक्ति के जीवन में संबंध, उद्देश्य और सम्मान वापस देना होगा।
नशे के विरुद्ध संघर्ष में दो अतियों से बचना चाहिए। पहली यह कि नशाग्रस्त व्यक्ति को केवल अपराधी मानकर समाज से बाहर कर दिया जाए। दूसरी यह कि बीमारी के नाम पर उसके हिंसक, धोखाधड़ीपूर्ण या गैर-जिम्मेदार व्यवहार को अनदेखा कर दिया जाए।
सही मार्ग करुणा और जिम्मेदारी का है। व्यक्ति को उपचार मिले, लेकिन उसे अपने व्यवहार की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी होगी। परिवार सहयोग करे, लेकिन नशे को पैसे या संरक्षण देकर बढ़ावा न दे। प्रशासन छोटे उपभोक्ता पर ही नहीं, बड़े आपूर्तिकर्ताओं और संरक्षण देने वाले तंत्र पर भी कार्रवाई करे। धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं केवल उपदेश न दें, बल्कि परामर्श, उपचार और पुनर्वास की व्यवस्था खड़ी करें।
नशामुक्ति का अर्थ केवल बोतल, पुड़िया या सिगरेट छोड़ना नहीं है। इसका अर्थ है व्यक्ति को भय, अकेलेपन, निराशा, गलत संगति और उद्देश्यहीनता से बाहर निकालना। उसके जीवन में फिर से परिवार, श्रम, सम्मान, स्वास्थ्य और आशा को स्थापित करना।
जिस समाज में युवा नशे में अपना भविष्य खो रहे हों, वहां केवल आर्थिक विकास पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। सड़कें, मशीनें, भवन और तकनीक तभी सार्थक हैं, जब मनुष्य स्वस्थ, विवेकशील और संवेदनशील रहे।
नशाखोरी के विरुद्ध वास्तविक संघर्ष प्रत्येक घर से प्रारम्भ होगा—जहां माता-पिता बच्चों को सुनेंगे, परिवार साथ बैठेगा, समाज दिखावे के बजाय संयम को सम्मान देगा और संकट में पड़े व्यक्ति से यह कहेगा—
तुम्हारा जीवन नशे से बड़ा है।
तुम्हारी गलती गंभीर हो सकती है, लेकिन तुम्हारे लिए सुधार का मार्ग बंद नहीं हुआ है।
हम नशे का समर्थन नहीं करेंगे, पर तुम्हें उपचार और सम्मानपूर्ण जीवन की ओर लौटने में अकेला भी नहीं छोड़ेंगे।

