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योगिराज श्री जलंधरनाथ जी महाराज (अंक–4)

प्रकाशित: 1 September 2026, 3:33 pm

अंक–4

मारवाड़ के लोकजीवन में जलंधरनाथ जी का प्रभाव

योगिराज श्री जलंधरनाथ जी महाराज का प्रभाव केवल राजपरिवारों और मठों तक सीमित नहीं था। मारवाड़ के किसान, पशुपालक, व्यापारी, योद्धा, कारीगर और सामान्य जन भी नाथ सिद्धों के प्रति गहरी श्रद्धा रखते थे।

मरुस्थलीय जीवन सदैव कठिन रहा है। जल की कमी, अकाल, पशुधन पर निर्भरता, युद्ध, असुरक्षित यात्राएं और सीमित संसाधन यहां के जनजीवन का हिस्सा रहे हैं। ऐसे वातावरण में नाथ योगियों की धैर्य, संयम, निर्भयता और आत्मबल की शिक्षा लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी थी।

नाथ योगियों ने लोगों को यह विश्वास दिया कि कठिन परिस्थितियों में बाहरी साधनों से अधिक महत्वपूर्ण मनुष्य की आंतरिक शक्ति है। जिसने अपने मन, भय और इच्छाओं पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया, उसे विपरीत परिस्थितियां भी आसानी से पराजित नहीं कर सकतीं।

इसी कारण राजस्थान में नाथ योगी केवल मठों में रहने वाले संन्यासी नहीं माने गए। वे लोकजीवन के मार्गदर्शक, औषधि और वनस्पतियों के जानकार, पशु-पक्षियों के संरक्षक, संकट में सहायता करने वाले और गांव-गांव भ्रमण कर जनचेतना जगाने वाले संतों के रूप में भी प्रतिष्ठित हुए।

पश्चिमी राजस्थान की अनेक संत और लोकदेवता परम्पराओं पर नाथ सिद्धों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव दिखाई देता है। मालाणी क्षेत्र के प्रसिद्ध संत रावल मल्लीनाथ को भी कुछ परम्पराएं जलंधरनाथ जी से संबंधित गुरु-परम्परा से जोड़ती हैं।

इन संबंधों के सभी विवरणों के समान ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी वे क्षेत्रीय सांस्कृतिक स्मृति में जलंधरनाथ जी की व्यापक प्रतिष्ठा को दर्शाते हैं।

उनकी आध्यात्मिक धारा जालौर से आगे बाड़मेर, जोधपुर, जैसलमेर और सम्पूर्ण मारवाड़ तक फैली। उनका संदेश था कि कठिन परिस्थितियों से डरने के बजाय मनुष्य को अपने भीतर धैर्य, साहस और विवेक जगाना चाहिए।

क्रमशः… (अगले अंक में : सामाजिक समता, गुरु-पीठ और धूणी का संदेश)