विद्यालयों की बदहाली उजागर करना अपराध नहीं—सरकार संवाद करेगी या दरवाजे बंद?
मारवाड़ पत्रिका | मुद्दे और बहस
लेखक: धर्मेंद्र सुंदेशा
संस्थापक, मारवाड़ पत्रिका
राजस्थान में सरकारी विद्यालयों की स्थिति को लेकर शुरू हुआ सीजेपी का “स्कूल ठीक करो” अभियान अब शिक्षा व्यवस्था से आगे बढ़कर लोकतांत्रिक जवाबदेही, नागरिक अधिकार और प्रशासनिक पारदर्शिता का प्रश्न बन गया है। अभियान के तहत सरकारी विद्यालयों की जर्जर इमारतों और अपर्याप्त सुविधाओं को सामने लाने की कोशिश की जा रही है। इसी बीच माध्यमिक शिक्षा निदेशालय, बीकानेर ने 16 अगस्त 2026 को आदेश जारी कर विद्यालयों में बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश तथा बिना अनुमति फोटो, वीडियो, साक्षात्कार, ऑडियो रिकॉर्डिंग और लाइव प्रसारण पर रोक लगा दी।
विभाग ने विद्यार्थियों की निजता, गरिमा और सुरक्षा को इस आदेश का आधार बनाया है। यह उद्देश्य अपने आप में अनुचित नहीं है। विद्यालय प्रशासन पर बच्चों की सुरक्षा का दायित्व होता है और किसी भी बाहरी व्यक्ति को बिना पहचान या बिना जवाबदेही के कक्षाओं, प्रयोगशालाओं, छात्रावासों और बच्चों से जुड़े क्षेत्रों में प्रवेश की खुली छूट नहीं दी जा सकती। लेकिन आदेश का समय, उसका व्यापक दायरा और सीजेपी के प्रस्तावित निरीक्षण अभियान के साथ उसका संयोग यह प्रश्न अवश्य पैदा करता है कि कहीं बच्चों की निजता की आड़ में सार्वजनिक विद्यालयों की वास्तविक स्थिति को कैमरे और समाज की निगाह से दूर रखने का प्रयास तो नहीं हो रहा।
राजस्थान आर्थिक समीक्षा 2025-26 के अनुसार राज्य में लगभग 44,934 सरकारी प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालय और 19,950 सरकारी उच्च माध्यमिक विद्यालय संचालित हैं। इनमें करीब 72.93 लाख विद्यार्थी पढ़ते हैं। इतने व्यापक विद्यालय तंत्र की सुरक्षा और गुणवत्ता केवल विभागीय फाइलों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती।
राज्य विधानसभा में शिक्षा मंत्री मदन दिलावर द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार 3,768 सरकारी विद्यालय भवन जर्जर पाए गए। इनमें 2,558 भवन आधिकारिक रूप से जर्जर घोषित किए जा चुके थे, जबकि 1,210 को औपचारिक रूप से घोषित किया जाना शेष था। सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि राज्य के 45 हजार से अधिक सरकारी विद्यालयों में से 41 हजार से ज्यादा को किसी न किसी स्तर पर बड़ी मरम्मत की आवश्यकता थी। वर्ष 2025 में झालावाड़ जिले के पिपलोदी स्थित सरकारी विद्यालय की छत गिरने से सात बच्चों की मृत्यु और कम से कम 21 बच्चों के घायल होने की घटना ने इस संकट की भयावहता उजागर कर दी थी।
सरकार ने 300 जर्जर विद्यालयों के नए भवनों के लिए लगभग 410 करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं। यह स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन हजारों असुरक्षित भवनों और मरम्मत की आवश्यकता वाले विद्यालयों की तुलना में अभी इसे शुरुआत ही माना जाएगा। सरकार को यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि कौन-सा विद्यालय किस श्रेणी में असुरक्षित है, तकनीकी निरीक्षण कब हुआ, मरम्मत या पुनर्निर्माण की समय-सीमा क्या है और तब तक बच्चों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था कहाँ की गई है।
21 अगस्त को जयपुर जिले के रामपुरा–कंवरपुरा गांव में सीजेपी की टीम के विद्यालय भ्रमण के दौरान गंभीर टकराव हुआ। टीम का दावा है कि उसके सदस्यों से मारपीट की गई, वाहनों के शीशे और मोबाइल तोड़े गए तथा पत्थर फेंके गए। दूसरी ओर, कुछ ग्रामीणों ने कहा कि वे विद्यालय के मुद्दे का राजनीतिकरण नहीं चाहते थे और भवन निर्माण के लिए धन स्वीकृत हो चुका है। दोनों पक्षों ने पुलिस में शिकायत दी है और जाँच जारी है। इसलिए हिंसा के लिए किसी संगठन या राजनीतिक दल की जिम्मेदारी पुलिस जाँच से पहले अंतिम रूप से निर्धारित नहीं की जा सकती। लेकिन किसी नागरिक समूह को रोकने के लिए मारपीट, धमकी या तोड़फोड़ हुई है तो वह किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकती।
भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(ख) के अंतर्गत शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है। इन अधिकारों पर कानूनसम्मत और युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। साथ ही, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी व्यक्ति को विद्यालय परिसर में जब चाहे प्रवेश करने या बच्चों की अनुमति के बिना रिकॉर्डिंग करने का स्वतः अधिकार नहीं देती। इसलिए समाधान न तो अनियंत्रित प्रवेश है और न पूर्ण प्रशासनिक बंदिश।
सरकार को पारदर्शी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिसमें अभिभावक, विद्यालय प्रबंधन समिति, स्थानीय जनप्रतिनिधि, पत्रकार और नागरिक संगठन पूर्व सूचना देकर भवन एवं सुविधाओं का निरीक्षण कर सकें। बच्चों के चेहरे और पहचान सार्वजनिक न किए जाएँ, कक्षाओं में व्यवधान न हो और निरीक्षण जिम्मेदार अधिकारी की उपस्थिति में हो। अनुमति देने अथवा अस्वीकार करने के लिए लिखित कारण और निश्चित समय-सीमा होनी चाहिए। यदि अनुमति केवल आलोचना रोकने के उद्देश्य से रोकी जाती है तो यह व्यवस्था सुरक्षा नहीं, अपारदर्शिता का माध्यम बन जाएगी।
राजस्थान की वर्तमान भाजपा सरकार को विद्यालयों की पूरी बदहाली के लिए अकेले दोषी नहीं ठहराया जा सकता। वर्ष 1998 के बाद प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा लगभग बारी-बारी से तीन-तीन बार सत्ता में रही हैं। जर्जर विद्यालय भवन दशकों की उपेक्षा का परिणाम हैं। लेकिन इतिहास की जिम्मेदारी गिनाकर वर्तमान सरकार अपने संवैधानिक और प्रशासनिक दायित्व से मुक्त नहीं हो सकती। सत्ता में बैठी सरकार की जिम्मेदारी केवल यह बताना नहीं है कि समस्या किससे विरासत में मिली, बल्कि यह बताना है कि वह उसे कब और कैसे समाप्त करेगी।
शिक्षा मंत्री की ओर से यदि सीजेपी के संदर्भ में “तुम लोगों ने स्कूल को बचा लिया” जैसा व्यंग्यात्मक कथन वास्तव में किया गया है, तो उसका अधिकृत संदर्भ सार्वजनिक किया जाना चाहिए। शिक्षा-सुविधाओं की मांग करने वाले नागरिकों को आतंकवादी, नक्सली या विद्यालय-विरोधी मानसिकता से देखना लोकतांत्रिक संवाद को नुकसान पहुँचाएगा। आलोचना का उत्तर व्यंग्य, अवमानना अथवा शक्ति-प्रदर्शन नहीं, बल्कि तथ्य और समयबद्ध कार्रवाई होनी चाहिए।
सीजेपी या किसी अन्य संगठन की कार्यप्रणाली से असहमति हो सकती है। उससे नियमों का पालन, पूर्व सूचना और बच्चों की निजता की सुरक्षा की अपेक्षा भी की जा सकती है। लेकिन “स्कूल ठीक करो” की मांग अपने मूल में न तो सरकार-विरोधी है और न राष्ट्र-विरोधी। यह बच्चों के सुरक्षित जीवन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से जुड़ी मांग है।
विद्यालय सरकार की निजी संपत्ति नहीं, सार्वजनिक संस्थान हैं। उनकी सुरक्षा आवश्यक है, पर उनकी बदहाली को सार्वजनिक होने से रोकना सुरक्षा नहीं कहलाएगा। एक संवेदनशील सरकार को नागरिक निरीक्षण को चुनौती नहीं, सुधार के सहयोगी अवसर के रूप में स्वीकार करना चाहिए। लोकतंत्र में सवाल पूछने वालों से दरवाजे बंद करना आसान है; कठिन लेकिन सही रास्ता उन दरवाजों के भीतर की व्यवस्था को ठीक करना है।
