करोड़ों की योजनाओं में भ्रष्टाचार के आरोप, जांच के बीच VRS से कैसे तय होगी जवाबदेही?
— जल जीवन मिशन योजना में भ्रष्टाचार: जनहित की बड़ी योजना में अनियमितताओं के आरोपों ने खड़े किए जवाबदेही के सवाल
जयपुर। राजस्थान में जल जीवन मिशन से जुड़े कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की जांच के बीच जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) के दो चीफ इंजीनियरों के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) आवेदन सरकार द्वारा नामंजूर किए जाने का मामला सरकारी योजनाओं में जवाबदेही का महत्वपूर्ण सवाल सामने लाता है। संबंधित अधिकारियों के मामलों में जांच प्रक्रिया लंबित होने के कारण सरकार ने उन्हें समय से पहले सेवा छोड़ने की अनुमति नहीं दी है।
जल जीवन मिशन केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना है, जिसे भारत सरकार ने राज्यों की भागीदारी से वर्ष 2019 में शुरू किया था। इसका उद्देश्य देश के प्रत्येक ग्रामीण परिवार तक नल के माध्यम से सुरक्षित पेयजल पहुंचाना था। मिशन का मूल राष्ट्रीय परिव्यय ₹3.60 लाख करोड़ था, जिसमें केंद्र सरकार का हिस्सा ₹2.08 लाख करोड़ निर्धारित किया गया था। निर्धारित अवधि में देशभर में लक्ष्य पूर्ण नहीं होने के कारण मिशन को आगे बढ़ाया गया है।
राजस्थान में इसी जनहितकारी योजना के क्रियान्वयन में गंभीर अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए। जांच एजेंसियों के अनुसार कुछ फर्मों द्वारा कथित फर्जी कार्य-अनुभव प्रमाणपत्रों के आधार पर टेंडर प्राप्त करने तथा अधिकारियों को रिश्वत दिए जाने जैसे मामलों की जांच हुई है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) भी अलग-अलग स्तर पर प्रकरणों की जांच कर चुके हैं। आरोप अभी जांच एवं न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं।
यह मामला एक बड़े सवाल की ओर ध्यान खींचता है—जनता के लिए बनाई गई हजारों करोड़ रुपये की योजनाओं में यदि भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के कारण सरकारी धन तथा समय का नुकसान होता है और योजना निर्धारित लक्ष्य तक समय पर नहीं पहुंच पाती, तो जवाबदेही कब और कैसे तय होगी?
केवल VRS रोकना पर्याप्त नहीं है। जांच समयबद्ध हो, जिम्मेदारी स्पष्ट हो और जहां सरकारी धन की हानि प्रमाणित हो, वहां दोषियों पर कार्रवाई के साथ उसकी वसूली भी सुनिश्चित हो। जनकल्याणकारी योजनाओं की सफलता केवल बजट आवंटित करने में नहीं, बल्कि उस धन का ईमानदार और प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने में है।
