श्रावण: संस्कारों के संचयन का पवित्र मास
लेखक: स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरि

सनातन संस्कृति, अध्यात्म का विज्ञान और श्रावण का महत्व :
शिवपुराण सहित उपलब्ध संपूर्ण “शिव साहित्य” में भगवान शंकर की दिव्य महिमा और शिवलिंग पूजन के ऐतिहासिक व आध्यात्मिक संदर्भ स्पष्ट रूप से विद्यमान हैं। वर्तमान समय में साधकों तथा शिवोपासकों के लिए इन शाश्वत तथ्यों को जानना, समझना और आचरण में ढालना अत्यंत आवश्यक है। यद्यपि आज का युग भौतिक विज्ञान के नित नए आविष्कारों और चकाचौंध से भरा हुआ है, जहाँ अक्सर तर्क का स्थान कुतर्क ने, विश्वास का स्थान अविश्वास ने और आस्था का स्थान अनास्था ने ले लिया है; फिर भी हमारी सनातन संस्कृति के मूलभूत सिद्धांत, श्रुति, युक्ति, परंपराएँ और जीवनमूल्य अंगद के पांव की भांति अडिग हैं। भारतीय संस्कृति मूलतः अध्यात्ममूलक है, जिसका निर्माण हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने गहन अन्वेषण के पश्चात किया है। इसके लिए उन्होंने दो प्रमुख सूत्र दिए हैं— पहला “अथातो धर्म जिज्ञासा” और दूसरा “अथातो ब्रह्म जिज्ञासा”। वास्तव में धर्म और अध्यात्म विज्ञान के विरोधी नहीं, बल्कि उसके पूरक हैं; जहाँ धर्म सिद्धांतों का संग्रह (Theory) है, वहीं अध्यात्म उसका व्यावहारिक अनुभव और परिणाम (Practical) है। इसी आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने और अंतःकरण की शुद्धि के लिए श्रावण मास को सर्वोत्तम माना गया है, जहाँ पूजन, भजन, जाप और ध्यान के माध्यम से मन निर्मल होता है और ज्ञान की दिव्य रश्मियां हमारे गंतव्य का मार्ग प्रशस्त करती हैं।
शिवलिंग पूजन विधान और ‘महादेव’ नाम की अनंत महिमा:
श्रावण के पवित्र मास में भगवान शंकर के सहस्र नामों का उच्चारण तथा विविध पदार्थों व धातुओं से निर्मित शिवलिंग— जैसे कि पारद, पाषाण, पार्थिव (मिट्टी), स्वर्ण, गोमय (गाय के गोबर) अथवा स्फटिकमणि के शिवलिंग का पूजन व अभिषेक करना व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में मंगल एवं आनंद का संचार करता है। पूजन की शास्त्रोक्त विधि के अंतर्गत रुद्राष्टाध्यायी के नमक-चमक विधान से अभिषेक करने का महत्व है, किंतु यदि यह कठिन लगे तो सर्वसाधारण लोग ‘ॐ नमः शिवाय’ इस पंचाक्षर मंत्र के माध्यम से भी संपूर्ण पूजन विधि श्रद्धापूर्वक संपन्न कर सकते हैं। भगवान शिव को अपने अनगिनत नामों में “महादेव” नाम अत्यंत प्रिय है। शास्त्रों के अनुसार, शिवलिंग के समक्ष प्रतिदिन तीन बार इस प्रिय नाम का भावपूर्ण स्मरण करने से साधक को असीम आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। इसी महिमा को स्पष्ट करते हुए सुप्रसिद्ध श्लोक में कहा गया है
“ॐ महादेव महादेव महादेवेति यो वदेत्। एकेन मुक्तिमाप्नोति द्वाभ्यां शम्भु ऋणी भवेत्॥”
अर्थात् जो मनुष्य एक बार निष्काम भाव से ‘महादेव’ नाम का उच्चारण करता है, वह मुक्ति को प्राप्त कर लेता है और दो बार उच्चारण करने पर स्वयं भगवान शिव उसके ऋणी हो जाते हैं।
