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वीर विक्रमादित्य का लोकधर्म:- 1. उज्जैन से उठी आदर्श राजत्व की पुकार

प्रकाशित: 7 October 2026, 6:41 pm

वीर विक्रमादित्य की स्मृति में शक्ति के साथ जनता का सम्मान

भारतीय स्मृति में कुछ राजाओं का नाम उनके राज्य से अधिक उनके आचरण के कारण जीवित रहता है। उज्जैन के वीर विक्रमादित्य ऐसी ही राजकीय स्मृति हैं। उनकी कथाएं पूछती हैं कि शासन की सफलता किसमें है: सीमा के विस्तार में, राजकोष के धन में, अथवा उस व्यक्ति की सुरक्षा में जो अपने दुख के साथ राज्य का द्वार खटखटाता है?

परंपरा उज्जैन के विक्रमादित्य को शक-विजेता और विक्रम संवत् का प्रवर्तक मानती है। इस संवत् का आरंभ 57 ईसा पूर्व माना जाता है। विन्सेंट ए. स्मिथ की पुस्तक ‘द ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ में उज्जैन के राजा, शक-विजय और 58–57 ईसा पूर्व के संवत्-प्रवर्तन की परंपरा का उल्लेख है। यह संवत् की आरंभिक तिथि है; इसे राज्यारोहण का वर्ष कहने के स्थान पर ‘प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व की परंपरा से जुड़े राजा’ कहना उपयुक्त है।

इतिहास में ‘विक्रमादित्य’ उपाधि का प्रयोग भी मिलता है। चंद्रगुप्त द्वितीय के चौथी–पांचवीं शताब्दी के सिक्कों पर उनका नाम इस उपाधि के साथ अंकित है। इसलिए इस श्रृंखला में संवत्-प्रवर्तक की परंपरा, ऐतिहासिक उपाधि और साहित्यिक कथाओं को उनके अपने संदर्भ में पढ़ा जाएगा। जहां कोई ग्रंथ विशेष नाम या वंश बताता है, वही विवरण सामने रखा जाएगा।

इस सावधानी के साथ विक्रमादित्य की स्मृति का महत्त्व कम नहीं होता। उससे एक बड़ी सार्वजनिक अपेक्षा सामने आती है: शक्ति रखने वाला व्यक्ति करुणा रखे, धन रखने वाला उदार हो और निर्णय लेने वाला निर्भय होकर न्याय करे। राजा के गुणों को आज केवल शासक तक सीमित करना भी पर्याप्त नहीं। कार्यालय में अधिकारी, व्यापार में मालिक, विद्यालय में शिक्षक और घर में सक्षम सदस्य अपने व्यवहार से इसी लोकधर्म को निभा सकते हैं।

विक्रमादित्य की यात्रा का पहला प्रश्न हमारे लिए यही है: हमारे पास जितनी शक्ति है, उससे किसका भय घटता है? यदि किसी निर्बल को हमारा साथ मिलने पर राहत मिलती है, तो आदर्श राजत्व का एक अंश हमारे जीवन में उतरता है।

कविता 1 हमें ऐसा आदर्श चाहिए

हमें ऐसा आदर्श चाहिए,

जो जन का दुख जान सके;

कांप रही निर्बल की वाणी,

जिसको अपना मान सके।

उज्जयिनी की स्मृति पुकारे,

सुनो समय के पहरेदार;

राजमुकुट का भार उठाना,

पहले सीखो जन से प्यार।

वीर विक्रम की यशगाथा,

केवल रण का गान न हो;

भूखे घर की बुझी अंगीठी,

उससे भी अनजान न हो।

जिसके रहते कोई दुर्बल,

डरकर अपना सत्य न छोड़े;

जिसके होते धन का दर्प,

न्यायालय की राह न मोड़े।

अपने भीतर दीप जलाएं,

अपने हिस्से भार उठाएं;

जिसे सहारा चाहिए आज,

उसके पास स्वयं हम जाएं।

ऐसा मन और कर्म चाहिए,

जो संकट में साथ निभाए;

हमें ऐसा नेतृत्व चाहिए,

जो जनता की पीर घटाए।