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EMI की गिरफ्त में जिंदगी: सामान बढ़ा, सुकून घटा

प्रकाशित: 29 September 2026, 1:01 pm

कमाई हमारी, सपने बाजार के और किश्तें बैंक की—फिर भी कहा जाता है कि हम “सुविधा-संपन्न” हैं!

लेखक: दीपक बी. सोलंकी, जालौर

कभी आदमी जरूरत के हिसाब से चीजें खरीदता था। अब चीजें आदमी की जरूरत तय करती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले जेब देखकर खरीदारी होती थी, अब क्रेडिट लिमिट देखकर सपने देखे जाते हैं।

बाजार ने बड़ी चालाकी से हमें समझा दिया है कि जरूरत वह नहीं, जो हमारे पास नहीं है; जरूरत वह है, जो विज्ञापन हमें बता दे कि हमारे पास होनी चाहिए।

घर छोटा है तो बड़ा घर चाहिए।
गाड़ी पुरानी है तो नई चाहिए।
मोबाइल ठीक चल रहा है तो नया मॉडल चाहिए।
टीवी चल रहा है तो स्मार्ट टीवी चाहिए।
और अगर जेब में पैसे नहीं हैं तो कोई बात नहीं—EMI तो है!

यानी अब पैसा नहीं है तो भी खरीदारी रुकने की जरूरत नहीं। आखिर बैंक किस दिन के लिए बैठे हैं?

बैंक का आदमी मुस्कुराकर कहता है—

“सर, आपकी जरूरत हम समझते हैं।”

वास्तव में वह जरूरत नहीं, आपकी कमाई की भविष्य की किश्तें समझ रहा होता है।

और आम आदमी भी खुश है। उसे लगता है कि उसने अपनी हैसियत से बड़ी चीज खरीद ली। वह यह भूल जाता है कि चीज आज घर आ गई है, लेकिन उसकी कीमत आने वाले कई महीनों तक घर से बाहर नहीं जाएगी।

पहले महीने की तनख्वाह आती थी तो घर में खुशी आती थी। अब तनख्वाह आती है तो मोबाइल में मैसेज आते हैं—

EMI कट गई।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
फिर बीमा।
फिर स्कूल फीस।
फिर बिजली का बिल।

और महीने के आखिर में बैंक बैलेंस देखकर आदमी खुद से पूछता है—

“तनख्वाह मेरी है या मैं तनख्वाह का सिर्फ चौकीदार हूँ?”

सबसे मजेदार स्थिति तब होती है, जब आदमी एक कर्ज चुकाने के लिए दूसरा कर्ज लेता है। इसे आर्थिक भाषा में कुछ भी कहा जाए, आम आदमी इसे बड़ी सरल भाषा में जानता है—

“पुरानी मुसीबत को नई EMI में बदलना।”

बाजार का कमाल देखिए। पहले वह आपको बताता है कि आप अधूरे हैं, क्योंकि आपके पास अमुक वस्तु नहीं है। फिर वह वस्तु खरीदने के लिए आसान EMI देता है। और जब EMI का बोझ बढ़ जाता है तो नया ऑफर लेकर कहता है—

“आपके लिए और भी आसान लोन उपलब्ध है।”

यानी समस्या भी बाजार की, समाधान भी बाजार का और बिल भी बाजार का!

आम आदमी की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उसकी आय बढ़ने से पहले उसकी जरूरतें बढ़ जाती हैं। महंगाई जेब काटती है, इच्छाएँ बजट काटती हैं और EMI बची-खुची नींद।

अब तो हालत यह है कि आदमी अपने बच्चों को यह नहीं समझाता कि—

“बेटा, जितनी चादर हो उतने पैर पसारो।”

बल्कि खुद मोबाइल पर कैलकुलेटर खोलकर देखता है कि—

“इतनी EMI में कितनी बड़ी चादर आ सकती है?”

सवाल यह नहीं कि EMI बुरी है। जरूरत के समय कर्ज एक उपयोगी वित्तीय साधन हो सकता है। असली सवाल यह है कि हम सुविधा खरीद रहे हैं या भविष्य की आय पहले ही बेच रहे हैं?

क्योंकि EMI सिर्फ बैंक खाते से पैसा नहीं काटती, वह कई बार भविष्य की स्वतंत्रता भी काटती है।

एक नौकरी छूटने पर वही गाड़ी बोझ लगने लगती है, जिसे खरीदते समय परिवार ने स्टेटस माना था। अचानक बीमारी आ जाए तो वही घर, जिसके लिए वर्षों की EMI स्वीकार की थी, चिंता का कारण बन जाता है।

फिर भी बाजार मुस्कुराता रहता है।

नया मॉडल आ चुका है।
नई स्कीम आ चुकी है।
नई EMI आ चुकी है।

और हम फिर से सोचने लगते हैं—

“पुराना वाला अभी कितने में एक्सचेंज हो जाएगा?”

शायद हमें यह समझने की जरूरत है कि हर चीज, जो हम खरीद सकते हैं, जरूरी नहीं कि उसे खरीदना भी चाहिए।

क्योंकि जिंदगी का असली सुख यह नहीं कि हमारे पास कितनी चीजें हैं, बल्कि यह है कि उन चीजों की किश्तें चुकाने के बाद हमारे पास कितना सुकून बचा है।

आज जरूरत है कि हम EMI की सुविधा के साथ उसकी कीमत भी समझें। वरना कहीं ऐसा न हो कि आने वाली पीढ़ी को विरासत में जमीन-जायदाद से ज्यादा किश्तों की सूची मिले।

और तब इतिहासकार लिखेंगे—

“यह वह दौर था, जब आदमी ने अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए कर्ज लिया, फिर कर्ज चुकाने के लिए अपनी जरूरतें कम कर दीं।”

यही हमारी आधुनिक समृद्धि का सबसे बड़ा व्यंग्य है—

सामान बढ़ता गया, सुविधाएँ बढ़ती गईं, EMI बढ़ती गई…
बस जेब और सुकून दोनों छोटे होते गए।