भारतवर्ष ऋषि-मुनियों का देश है, प्राचीन भारत के ऋषि-मुनि ही वैज्ञानिक थे – महामण्डलेश्वर स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरी
ऋषि पंचमी विशेष
भारतवर्ष के प्रत्येक अंचल, क्षेत्र और प्रान्तों में सामान्यजनों और प्रबुद्धजनों से यह कहते सुना गया है कि हम सभी भारतीय सन्तानें, हम सभी ऋषियों के ही वंशज हैं। हमारे पूर्वज ऋषिगण ही हैं।
हम सब भारतीय जनमानस यह मान्यता और अवधारणाजन्य स्वाभिमान अपनी मन-मंजूषा में संजोते हैं कि हम ऋषियों की संतानें हैं। हमारी पारम्परिक अवधारणा का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि हमारे गोत्रों में किसी न किसी ऋषि का नाम जुड़ा है।
यदि लम्बे कालखण्ड और अनेक कारणों से गोत्र विस्मृत भी हो गया हो, तो भी एक लोकोक्ति हमारे देश में प्रसिद्ध है – “इसरे-बिसरे कश्यप गोत्र”। अर्थात् जिन्हें अपना गोत्र विस्मृत हो गया है, वे भी अपने को कश्यप ऋषि के गोत्र का स्मरण कर सकते हैं।
1. ऋषि पंचमी – कृतज्ञता का पर्व – मुनिगण या ऋषिगण कभी विस्मृत न हों, इसके लिये भारतीय पर्व परम्परा में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को *”ऋषि पंचमी”* के नाम से जाना जाता है।
संयोगवश ज्योतिषीय काल-गणना के क्रम में आज दिनांक 15 सितम्बर 2026 को ऋषि पंचमी है। आज की तिथि में भारतीय ऋषियों का स्मरण और ऋषि पूजन लगभग सभी भारतीयों के घर में पारम्परिक और प्रतीकात्मक रूप से होता है, जहाँ हम अपने पूर्वज ऋषिगणों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं।
2. सृष्टि के संचालक – प्रथम ऋषि -सृष्टि के आरम्भिक काल में भगवान् श्री नारायण की इच्छा और आज्ञा के अनुपालन में सृष्टि के प्रथम ऋषियों ने वैवाहिक जीवन पद्धति, जिसे हम पाणिग्रहण संस्कार मानते हैं, को स्वीकार कर श्रेष्ठ पुत्र-पुत्रियों के जन्म के निमित्त सृष्टि के क्रम को संचालित किया। पौराणिक ग्रन्थों में मुनि, ऋषियों तथा ऋषिकाओं का पर्याप्त उल्लेख उपलब्ध है।हमारे प्राचीनकाल के ऋषि कितने मनस्वी, तपस्वी, तेजस्वी, विचारक, चिंतक, दार्शनिक तथा शोधकर्ता थे; उनका अन्वेषण ही विविध क्षेत्रों की विधाओं से ओत-प्रोत है। परिणामतः उनकी संतानें ही कालान्तर में बड़ी प्रखरता और तेजस्विता के साथ सम्पूर्ण विश्व को मुखर जीवन शैली और जीवन-मूल्य प्रदान कर गईं।
3. मुनि और ऋषि – थ्यौरी राइटर और रिसर्चर – मुनि परम्परा को विवरण-संग्रहकर्ता कहा जाता है। आज की आधुनिक भाषा में उन्हें “थ्यौरी राइटर” कहते हैं, ये ही प्राचीन भारत के “मुनि” हैं। उनके विवरण ग्रन्थों (संग्रहीत तथ्यात्मक सूत्रों) के आधार पर ही अन्वेषणकर्ता ऋषियों और ऋषिकाओं ने शोध के आधारभूत सूत्र खोजकर विविध क्षेत्रों में अपने अनुसंधान के परिणाम प्रस्तुत किये।प्राचीन भारतीय ऋषियों की अन्वेषण-प्रयोगशाला सम्पूर्ण प्रकृति ही थी।
अनुसंधान के उपकरण उनके शरीर में विद्यमान अंग-प्रत्यंग – ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ और अंतःकरण चतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त, अहं) थे। वे सर्वप्रथम बौद्धिक प्रयोगशाला में अनुसंधान करके अनुभव की प्रयोगशाला में परिणाम निकाल लेते थे।
शास्त्रों में मुनि का लक्षण बताया गया है – “मननात् मुनिः”। चिंतनशीलता का नाम ही मुनि-वृत्ति है। सामान्यतः मुनि एकान्तवासी, योगाभ्यासी और विरक्त स्वभाव के होते हैं, वे गृहस्थाश्रमी नहीं होते थे।किन्तु ऋषिगण गृहस्थाश्रमी रहे हैं, उन्हें हम आज की प्रचलित भाषा में “रिसर्चर्स” (अनुसंधानकर्ता) कहते हैं। स्मृति ग्रन्थकारों ने उनके लक्षण में लिखा है – “ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्”।
ऐसे ही प्राचीन भारतीय मुनि-ऋषियों के लिये ही आज की प्रचलित अंग्रेजी भाषा में “साइंटिस्ट” शब्द का प्रयोग किया गया है। “थ्योरिटिकल और प्रैक्टिकल” ये दो शब्द आधुनिक विज्ञान की भाषा के बड़े महत्त्वपूर्ण हैं। कल्पना करें, यदि विवरण के सूत्र उपलब्ध न हों तो प्रयोगधर्मी अनुसंधाता विवरण के सूत्र कहाँ से लायेंगे? अतः मुनि परम्परा और ऋषि परम्परा भारतवर्ष में सदैव सम्मानित रही है।
उपसंहार – आज के दिन हम सभी अपने पूर्वज मुनिगण एवं ऋषि समूह को प्रणाम करते हुए उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। भारतीय समाज और विश्व मानव समूह सभी मुनि और ऋषि परम्परा का सदैव चिरकाल तक ऋणी रहेगा।—


