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रक्षाबंधन: 50 साल पहले की सादगी से आज के डिजिटल दौर तक बदल गया भाई-बहन के प्रेम का अंदाज

By MAHIPAL SINGH RP प्रकाशित: 28 August 2026, 10:26 am

आलेख :- महिपाल सिंह

रक्षाबंधन केवल कलाई पर राखी बांधने का त्योहार नहीं, बल्कि भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करने का पर्व है। समय के साथ समाज, तकनीक, जीवनशैली और बाजार में बड़े बदलाव आए हैं। इसका असर रक्षाबंधन मनाने के तरीके पर भी साफ दिखाई देता है। करीब 50 वर्ष पहले जहां रक्षाबंधन मुख्य रूप से परिवार और भावनाओं से जुड़ा सादा पर्व था, वहीं आज यह परंपरा और आधुनिकता के मेल का त्योहार बन चुका है।

50 साल पहले कैसी होती थी रक्षाबंधन?

आज से लगभग पांच दशक पहले रक्षाबंधन का स्वरूप काफी सादा हुआ करता था। गांवों और कस्बों में बहनें कई बार घर पर ही उपलब्ध सामान से राखी तैयार करती थीं। बाजार में आज की तरह हजारों प्रकार की डिजाइनर राखियों की भरमार नहीं थी।

रक्षाबंधन से कई दिन पहले ही घर में इसकी तैयारी शुरू हो जाती थी। बहनें भाई के लिए राखी संभालकर रखतीं और त्योहार के दिन सुबह स्नान के बाद पूजा की तैयारी होती। थाली में रोली, अक्षत, दीपक, मिठाई और राखी रखी जाती। बहन भाई के माथे पर तिलक लगाकर उसकी कलाई पर राखी बांधती और भाई बहन की रक्षा तथा सम्मान का संकल्प लेते हुए उसे उपहार देता।

उस दौर में उपहारों का मूल्य कम और भावनाओं का महत्व अधिक माना जाता था। कपड़े, मिठाई, नारियल, फल या थोड़े पैसे भी बहन के लिए खुशी का कारण बन जाते थे।

दूर रहने वाले भाई-बहन भी निभाते थे रिश्ता

लगभग 50 वर्ष पहले परिवहन और संचार के साधन आज की तुलना में बहुत सीमित थे। टेलीफोन हर घर में उपलब्ध नहीं था और मोबाइल फोन तथा इंटरनेट की तो कल्पना भी नहीं थी।

यदि भाई या बहन दूसरे शहर में रहते थे तो राखी पहले ही डाक से भेज दी जाती थी। कई परिवारों में बहनें भाई के घर पहुंचने के लिए बस, ट्रेन या अन्य साधनों से लंबी यात्रा करती थीं।

इस वजह से रक्षाबंधन का मिलना-जुलना अपने आप में एक विशेष अवसर होता था। लंबे समय बाद भाई-बहन के मिलने पर घर में उत्सव जैसा माहौल बन जाता था।

तब संयुक्त परिवारों में दिखती थी अलग रौनक

50 वर्ष पहले अनेक परिवारों में संयुक्त परिवार की परंपरा अधिक मजबूत थी। एक ही घर में दादा-दादी, चाचा-चाची, भाई-बहन और अन्य रिश्तेदार साथ रहते थे।

रक्षाबंधन पर परिवार के सभी सदस्य एक जगह एकत्र होते। घर में पकवान बनते, रिश्तेदार आते-जाते और बच्चे पूरे दिन उत्साह में रहते। त्योहार केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं रहता था, बल्कि पूरा परिवार इसका हिस्सा बनता था।

आज की रक्षाबंधन में क्या बदला?

समय के साथ परिवारों की संरचना और जीवनशैली में बदलाव आया है। नौकरी, शिक्षा और व्यवसाय के कारण भाई-बहन अलग-अलग शहरों और देशों में रहने लगे हैं। इसके बावजूद तकनीक ने दूरियों को कम करने का नया रास्ता दिया है।

आज बहनें घर बैठे ऑनलाइन राखी और मिठाई भेज सकती हैं। वीडियो कॉल के माध्यम से भाई की कलाई पर राखी बांधने की रस्म का हिस्सा बन सकती हैं। डिजिटल भुगतान के जरिए भाई बहन को उपहार या राशि भेज सकता है।

इस तरह रक्षाबंधन का मूल भाव कायम है, लेकिन उसे मनाने का माध्यम बदल गया है।

राखी भी हुई आधुनिक

पहले साधारण मौली, धागे और छोटी सजावटी राखियां अधिक प्रचलित थीं। आज बाजार और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बच्चों, युवाओं और बड़ों के लिए अलग-अलग डिजाइन की राखियां उपलब्ध हैं।

नाम वाली राखी, फोटो राखी, कार्टून राखी, चांदी की राखी, रुद्राक्ष राखी, पर्यावरण-अनुकूल राखी और विभिन्न धार्मिक प्रतीकों वाली राखियां लोगों को आकर्षित करती हैं।

हालांकि आधुनिक राखियों की विविधता बढ़ी है, लेकिन पारंपरिक लाल-पीले धागे और मौली वाली राखियों का महत्व आज भी बना हुआ है।

मिठाई और उपहारों में आया बड़ा बदलाव

पहले घर में बने लड्डू, घेवर, मालपुआ, खीर और अन्य पारंपरिक पकवान रक्षाबंधन की मिठास बढ़ाते थे। आज मिठाई की दुकानों और ऑनलाइन बाजार में विशेष रक्षाबंधन पैकेज उपलब्ध होते हैं।

अब भाई-बहन एक-दूसरे को कपड़े, घड़ी, मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक सामान, आभूषण, गिफ्ट कार्ड, ऑनलाइन शॉपिंग वाउचर और अन्य पसंदीदा वस्तुएं भी उपहार में देते हैं।

अर्थात उपहारों का स्वरूप बदला है, लेकिन उपहार देने के पीछे का स्नेह आज भी वही है।

सोशल मीडिया ने भी बदला त्योहार का अंदाज

आज रक्षाबंधन के अवसर पर लोग फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करते हैं। भाई-बहन की पुरानी तस्वीरों के साथ यादें साझा करना, शुभकामना संदेश भेजना और वीडियो कॉल पर त्योहार मनाना आम हो गया है।

जहां पहले शुभकामना देने के लिए व्यक्तिगत मुलाकात या पत्र का सहारा लिया जाता था, वहीं अब कुछ सेकंड में संदेश दूसरे शहर या देश तक पहुंच जाता है।

महिलाओं की भूमिका और सोच में भी आया बदलाव

आज रक्षाबंधन को केवल इस अर्थ में नहीं देखा जाता कि भाई बहन की रक्षा करेगा। आधुनिक समय में भाई-बहन एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े होने और एक-दूसरे के सम्मान, सुरक्षा तथा अधिकारों की रक्षा का संकल्प लेते हैं।

कई परिवारों में बहनें भी भाइयों को उपहार देती हैं और भाई-बहन दोनों एक-दूसरे की सफलता तथा खुशहाली की कामना करते हैं। इस बदलाव ने रक्षाबंधन के संदेश को और व्यापक बनाया है।

पर्यावरण के प्रति बढ़ी जागरूकता

आज रक्षाबंधन में पर्यावरण संरक्षण की भावना भी दिखाई देने लगी है। कई लोग प्लास्टिक और अत्यधिक पैकेजिंग से बचते हुए कपास, कागज, लकड़ी, बीज या अन्य पर्यावरण-अनुकूल सामग्री से बनी राखियों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

यह बदलाव बताता है कि त्योहारों की परंपरा को निभाते हुए नई पीढ़ी पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी समझ रही है।

क्या बदला और क्या नहीं बदला?

रक्षाबंधन मनाने का तरीका निश्चित रूप से बदला है। राखी के डिजाइन बदले, उपहार बदल गए, संचार के साधन बदल गए और परिवारों के रहने का तरीका भी बदल गया।

लेकिन एक चीज आज भी लगभग वैसी ही है—भाई-बहन का भावनात्मक रिश्ता।

50 वर्ष पहले बहन भाई की कलाई पर राखी बांधकर उसकी लंबी उम्र और खुशहाली की कामना करती थी। आज भी यही भावना दिखाई देती है। पहले भाई उपहार देकर बहन के प्रति अपना स्नेह जताता था, आज भी वह अलग-अलग माध्यमों से वही स्नेह व्यक्त करता है।

साधन बदले, रिश्ते की मिठास नहीं

रक्षाबंधन की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि समय बदलने के बावजूद इसकी आत्मा नहीं बदली। पहले राखी का धागा साधारण था, आज डिजाइनर हो गया है; पहले संदेश पत्र से पहुंचता था, आज मोबाइल से पहुंच जाता है; पहले भाई-बहन मिलने के लिए लंबी यात्रा करते थे, आज वीडियो कॉल से एक-दूसरे को देख सकते हैं।

फिर भी राखी का वह छोटा-सा धागा आज भी भाई-बहन के रिश्ते में विश्वास, स्नेह, जिम्मेदारी और अपनापन जोड़ता है।

रक्षाबंधन हमें यही संदेश देता है कि तकनीक और समय चाहे जितना बदल जाए, सच्चे रिश्तों की कीमत हमेशा भावनाओं से तय होती है, साधनों से नहीं।