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जीवन का समय: अपनी संपत्ति नहीं, ईश्वर से मिला उत्तरदायित्व

प्रकाशित: 28 August 2026, 12:26 pm

मनुष्य को ईश्वर की श्रेष्ठतम कृति माना गया है। उसे बुद्धि मिली, विवेक मिला, प्रेम और करुणा का भाव मिला तथा सही और गलत के बीच चुनाव करने की क्षमता मिली। लेकिन मनुष्य को मिला जीवन और जीवन का समय क्या वास्तव में उसकी अपनी संपत्ति है?

साधारण भाषा में हम कहते हैं—“यह मेरा जीवन है, मेरा समय है; मैं इसका जैसे चाहूँ उपयोग करूँ।” किंतु थोड़ा गंभीर होकर विचार करें तो यह दावा पूरी तरह सही दिखाई नहीं देता। जिस समय को हमने स्वयं अर्जित नहीं किया, जिसके समाप्त होने की तारीख हमें मालूम नहीं, जिसे हम अपनी इच्छा से रोक नहीं सकते और जिसका उपयोग भी हमेशा अपनी इच्छा के अनुसार नहीं कर सकते, उस समय को अपनी निजी संपत्ति कैसे कहा जा सकता है?

यदि समय हमारी संपत्ति होता तो हमें पता होता कि वह हमें कब, कहाँ और किस प्रयास से मिला। हमें यह भी मालूम होता कि वह हमारे पास कितने वर्षों तक रहेगा। हम उसे अपनी इच्छा से बचा सकते, बढ़ा सकते और आवश्यकता पड़ने पर रोक सकते। लेकिन वास्तविकता यह है कि किसी को नहीं पता कि उसके पास जीवन के पचास वर्ष शेष हैं, पांच वर्ष, पांच दिन या केवल पांच मिनट।

इसलिए जीवन के समय को अपनी संपत्ति से अधिक ईश्वर और प्रकृति द्वारा सौंपी गई अमानत मानना उचित है। इसे “ईश्वर से मिला उधार” भी कहा जा सकता है। यह शास्त्र का कोई शब्दशः वाक्य नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाई को समझाने वाला एक सरल दार्शनिक रूपक है। जैसे उधार में मिली वस्तु के उपयोग का हिसाब देना पड़ता है, वैसे ही जीवन के समय का हिसाब हमारे कर्म, विचार और व्यवहार देते हैं।

संसार में कुछ भी हमारा स्थायी अधिकार नहीं

ईशावास्य उपनिषद् का प्रथम मंत्र कहता है—

«ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥»

इसका सरल अर्थ है—इस संसार में जो कुछ भी है, उसमें ईश्वर की उपस्थिति है। इसलिए संसार की वस्तुओं का उपयोग त्याग, संयम और जिम्मेदारी के साथ करो। किसी वस्तु को अपनी स्थायी संपत्ति मानकर उससे अत्यधिक आसक्त मत हो।

हमारा शरीर प्रकृति से बना है। हमें मिलने वाला भोजन, जल, वायु और प्रकाश भी प्रकृति के हैं। शरीर समाप्त होने पर वह पुनः प्रकृति में मिल जाता है। जब शरीर ही स्थायी रूप से हमारा नहीं है, तब शरीर के साथ मिला समय पूर्णतः हमारा कैसे हो सकता है?

मृत्यु निश्चित है, लेकिन उसका समय अज्ञात है

महाभारत के यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में एक गहरा प्रश्न पूछा गया—संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया—

«अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्।
शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्॥»

अर्थात प्रतिदिन मनुष्य दूसरे लोगों को संसार से जाते हुए देखता है, फिर भी वह अपने आपको स्थायी मानकर जीता रहता है। इससे बड़ा आश्चर्य क्या होगा?

हम किसी परिचित की मृत्यु पर कुछ समय के लिए गंभीर होते हैं। हमें लगता है कि जीवन बहुत छोटा है और हमें अच्छे कार्य करने चाहिए। लेकिन कुछ दिनों बाद हम फिर उसी दौड़, अहंकार, विवाद, संग्रह और दिखावे में लौट जाते हैं। मृत्यु को देखना आसान है, लेकिन उससे मिलने वाली सीख को अपने जीवन में उतारना कठिन है।

हम अपना समय कहाँ-कहाँ व्यर्थ कर रहे हैं?

आज समय नष्ट करने के साधन पहले से बहुत अधिक हो गए हैं। मोबाइल पर बिना उद्देश्य के घंटों वीडियो देखते रहना, सोशल मीडिया पर दूसरों के जीवन से अपनी तुलना करना, निरर्थक विवाद करना, राजनीतिक या सामाजिक घृणा फैलाने वाले संदेशों में उलझे रहना और दूसरों की निंदा करना—ये सब धीरे-धीरे जीवन का बड़ा हिस्सा खा जाते हैं।

इसके अतिरिक्त हम अपना समय इन कार्यों में भी व्यर्थ करते हैं—

  • आवश्यकता से अधिक मनोरंजन और भोग-विलास में;
  • दिखावे और सामाजिक प्रतिष्ठा की झूठी प्रतिस्पर्धा में;
  • पुराने विवादों, क्रोध और बदले की भावना को पकड़े रखने में;
  • दूसरों की कमियां खोजने और उनकी निंदा करने में;
  • धन और वस्तुओं के अनावश्यक संग्रह में;
  • अपने से कमजोर व्यक्ति का अपमान करने में;
  • ऐसी चिंताओं में, जिनका कोई समाधान हमारे हाथ में नहीं;
  • अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय उसे सही साबित करने में;
  • परिवार के बीच रहते हुए भी मोबाइल और आभासी संसार में खोए रहने में;
  • ज्ञान प्राप्त किए बिना केवल सूचना एकत्र करने में।

मनोरंजन अपने आप में बुरा नहीं है। शरीर और मन को विश्राम चाहिए। परिवार के साथ आनंद, संगीत, यात्रा, खेल और हास्य भी जीवन के आवश्यक अंग हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब मनोरंजन विश्राम का माध्यम न रहकर जीवन का मुख्य उद्देश्य बन जाता है। जो गतिविधि हमें थोड़ी देर के लिए ताजगी देने के बजाय कर्तव्य, परिवार, स्वास्थ्य और आत्मचिंतन से दूर कर दे, वह समय का सदुपयोग नहीं रह जाती।

मनुष्य जीवन दुर्लभ भी है और अस्थायी भी

श्रीमद्भागवत महापुराण में कहा गया है—

«लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते
मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः।
तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु याव-
न्निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात्॥»

इसका सरल भाव है—अनेक जन्मों के बाद प्राप्त मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ और श्रेष्ठ फल देने वाला है, लेकिन यह स्थायी नहीं है। इसलिए मृत्यु आने से पहले मनुष्य को अपने वास्तविक कल्याण के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

मनुष्य जीवन केवल भोजन, कमाई, परिवार चलाने, सुविधाएं जुटाने और अंततः संसार से चले जाने के लिए नहीं मिला। ये सभी जीवन-व्यवस्था के आवश्यक अंग हैं, लेकिन जीवन का संपूर्ण उद्देश्य नहीं। मनुष्य को यह भी जानना है कि वह कौन है, उसके कर्मों का दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है और उसके जीवन से संसार में करुणा बढ़ रही है या पीड़ा।

समय का सदुपयोग कैसे किया जाए?

समय का सदुपयोग किसी बहुत बड़े और असाधारण कार्य से ही हो, यह आवश्यक नहीं। छोटे-छोटे अच्छे कार्य भी जीवन को सार्थक बनाते हैं।

हम प्रतिदिन किसी जरूरतमंद की सहायता कर सकते हैं। किसी निराश व्यक्ति की बात धैर्यपूर्वक सुन सकते हैं। किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई में सहयोग कर सकते हैं। किसी अशिक्षित व्यक्ति को सरकारी योजना, बैंक, अस्पताल या कानूनी प्रक्रिया समझा सकते हैं। किसी बीमार, वृद्ध या असहाय व्यक्ति को समय देना भी सेवा है।

ज्ञान का प्रसार भी समय का श्रेष्ठ उपयोग है। यदि हम किसी व्यक्ति को पढ़ना सिखाते हैं, किसी विद्यार्थी का मार्गदर्शन करते हैं, किसी व्यापारी को सही जानकारी देते हैं अथवा किसी नागरिक को उसके अधिकार और कर्तव्य समझाते हैं, तो हम केवल एक व्यक्ति की सहायता नहीं करते; हम समाज के भविष्य को बेहतर बनाते हैं।

जीवन का सदुपयोग यह भी है कि हमारे कारण किसी के मन में भय, अपमान, घृणा या निराशा पैदा न हो। हमारी वाणी सत्य हो, लेकिन कठोर और अपमानजनक न हो। हमारे व्यवहार से लोगों के मन में अच्छे भाव उत्पन्न हों। हम जहाँ जाएं, वहाँ विवाद बढ़ाने के बजाय शांति, सहयोग और विश्वास बढ़े—यह भी आध्यात्मिक साधना है।

प्रकृति की सेवा वास्तव में अपने जीवन की रक्षा है

प्रकृति केवल हमारे आसपास का दृश्य नहीं है; वही हमारे जीवन का आधार है। पेड़ हमें प्राणवायु देते हैं, जल जीवन देता है, मिट्टी भोजन देती है और वनस्पतियां वातावरण का संतुलन बनाए रखती हैं। इसलिए प्रकृति-संरक्षण कोई अतिरिक्त सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि जीवन के प्रति हमारा मूल कर्तव्य है।

हम अपने समय का कुछ भाग पौधे लगाने और उनकी देखभाल करने में लगा सकते हैं। केवल पौधारोपण की तस्वीर लेना पर्याप्त नहीं; पौधे को पेड़ बनने तक जल, सुरक्षा और देखभाल देना वास्तविक सेवा है। हम जल को व्यर्थ बहने से रोक सकते हैं, प्लास्टिक का उपयोग कम कर सकते हैं, सार्वजनिक स्थानों को गंदा नहीं कर सकते और पक्षियों तथा जीवों के लिए जल और सुरक्षित वातावरण की व्यवस्था कर सकते हैं।

एक व्यक्ति द्वारा लगाया गया वृक्ष संभव है कि उसके जीवनकाल से भी अधिक समय तक लोगों को छाया, फल और शुद्ध वायु देता रहे। इस प्रकार प्रकृति में लगाया गया समय मृत्यु के बाद भी समाज के काम आता रहता है।

प्रतिदिन ध्यान, मनन और आत्मपरीक्षण आवश्यक

मनुष्य दिनभर संसार को देखता है, लेकिन स्वयं को देखने के लिए समय नहीं निकालता। हमें प्रतिदिन कुछ समय शांत बैठकर अपने दिन का निरीक्षण करना चाहिए। इसे ध्यान, मनन, प्रार्थना या आत्मचिंतन—किसी भी नाम से कहा जा सकता है।

रात्रि में स्वयं से कुछ सरल प्रश्न पूछे जा सकते हैं—

  • आज मैंने अपना समय कहाँ लगाया?
  • क्या मेरे कारण किसी को दुख पहुंचा?
  • क्या मैंने किसी की सहायता की?
  • क्या मैंने क्रोध या अहंकार में अनुचित व्यवहार किया?
  • क्या आज मैंने कुछ नया और उपयोगी सीखा?
  • क्या मैंने प्रकृति और समाज के प्रति अपना कोई कर्तव्य निभाया?
  • यदि आज मेरे जीवन का अंतिम दिन होता तो क्या मैं अपने आचरण से संतुष्ट होता?

इन प्रश्नों का उत्तर किसी दूसरे को नहीं देना है। स्वयं के प्रति ईमानदार होना ही आत्म-सुधार की शुरुआत है। प्रतिदिन की छोटी समीक्षा धीरे-धीरे व्यक्ति के विचार, वाणी और कर्म को बदल सकती है।

सही मार्गदर्शन कहाँ से मिलेगा?

आज संत, कथावाचक और प्रवचनकार बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं। इनमें अनेक निष्ठापूर्वक समाज को दिशा देने वाले भी हैं, लेकिन धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में प्रदर्शन, प्रतिस्पर्धा और बाजारीकरण भी बढ़ा है। भव्य मंच, प्रचार, चमत्कारों के दावे, व्यक्ति-पूजा और धन-संग्रह कभी-कभी मूल आध्यात्मिक संदेश को पीछे छोड़ देते हैं। इससे सामान्य व्यक्ति की आस्था डगमगाती है।

परंतु किसी कथावाचक या प्रवचनकार की कमजोरी से शास्त्रों का सत्य कमजोर नहीं हो जाता। धर्म को किसी एक व्यक्ति के आचरण से नहीं, उसके मूल सिद्धांतों से समझना चाहिए। हमारे पास वेद, उपनिषद्, भगवद्गीता, रामायण, महाभारत, पुराण और संतों की अनुभूतिपूर्ण वाणी उपलब्ध है। इनके साथ मनुष्य को अपना विवेक भी मिला है।

किसी आध्यात्मिक मार्गदर्शक को उसकी वेशभूषा, लोकप्रियता, भीड़ या मंच की भव्यता से नहीं परखना चाहिए। यह देखना चाहिए कि उसकी वाणी मनुष्य में करुणा, सत्य, संयम, सेवा और विवेक बढ़ाती है अथवा भय, अंधविश्वास, घृणा और व्यक्ति-पूजा। सच्चा मार्गदर्शन मनुष्य को पराधीन नहीं बनाता; वह उसके विवेक को जाग्रत करता है।

कठोपनिषद् मनुष्य के सामने दो मार्ग बताता है—“श्रेय” और “प्रेय।” प्रेय वह है जो अभी अच्छा और सुखद लगे; श्रेय वह है जो अंततः मनुष्य और समाज का कल्याण करे। समझदार व्यक्ति क्षणिक आकर्षण के बजाय दीर्घकालीन कल्याण को चुनता है।

समय का सही हिसाब क्या है?

जीवन की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि हमने कितना धन कमाया, कितनी संपत्ति बनाई या कितना प्रभाव प्राप्त किया। वास्तविक प्रश्न यह है कि हमारे कारण कितने लोगों का जीवन थोड़ा बेहतर हुआ। हमने कितने दुख कम किए, कितने लोगों को शिक्षित किया, कितने पेड़ बचाए, कितने जीवों पर दया की और कितनी बार अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर न्याय तथा मानवता का साथ दिया।

अनुकूल समय हमारा अधिकार नहीं, अवसर है। स्वास्थ्य, बुद्धि, साधन और स्वतंत्रता जब हमारे पास हों, तब हमें उनका उपयोग अच्छे कर्मों में करना चाहिए। समय कब वापस ले लिया जाएगा, यह हमें मालूम नहीं। लेकिन जब तक वह हमारे पास है, हम उसे करुणा, सेवा, ज्ञान, प्रकृति-संरक्षण और आत्मविकास में लगा सकते हैं।

अंततः जीवन की लंबाई हमारे हाथ में नहीं, लेकिन उसकी गुणवत्ता काफी हद तक हमारे निर्णयों में है। हमें यह नहीं पता कि हमें कितना समय मिला है; इतना अवश्य तय कर सकते हैं कि जो समय मिला है, वह केवल बीते नहीं—किसी के काम आए, किसी का दुख घटाए, प्रकृति को समृद्ध करे और हमारी आत्मा को पहले से अधिक निर्मल बनाकर जाए।