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पंचतंत्र की अमर कथा: बोलने से पहले सोचो

प्रकाशित: 14 September 2026, 1:16 pm

एक घने जंगल में कम्बुग्रीव नाम का कछुआ रहता था। उसी तालाब पर संकट और विकट नाम के दो हंस भी आते थे। तीनों में गहरी मित्रता हो गई थी। वे प्रतिदिन धर्म, नीति और संसार की बातें किया करते थे।

एक वर्ष वर्षा बहुत कम हुई। तालाब का पानी धीरे-धीरे सूखने लगा। हंसों ने कछुए से कहा, “मित्र! निकट के वन में एक विशाल सरोवर है। वहाँ पानी और भोजन की कोई कमी नहीं है। तुम्हें भी हमारे साथ चलना चाहिए।”

कछुए ने उदास होकर कहा, “मैं उड़ नहीं सकता। इतनी दूर कैसे जाऊँगा?”

कुछ विचार करने के बाद हंसों ने उपाय खोज लिया। वे एक मजबूत लकड़ी ले आए और कछुए से बोले, “तुम इस लकड़ी को बीच से अपने मुँह में मजबूती से पकड़ लेना। हम दोनों इसके सिरों को चोंच में दबाकर उड़ेंगे। किंतु पूरे मार्ग में तुम्हें चुप रहना होगा। यदि तुमने मुँह खोला, तो नीचे गिर जाओगे।”

कछुए ने वचन दिया कि वह कुछ नहीं बोलेगा।

दोनों हंस लकड़ी लेकर उड़ चले। कछुआ बीच में लटका हुआ था। मार्ग में एक नगर आया। आकाश में ऐसा विचित्र दृश्य देखकर लोग घरों से बाहर निकल आए। कोई हँसने लगा, तो कोई बोला, “देखो! दो हंस कितने मूर्ख कछुए को उठाकर ले जा रहे हैं।”

कछुए को लोगों की हँसी सहन नहीं हुई। वह भूल गया कि उसकी सुरक्षा मौन रहने में है। जैसे ही उसने उत्तर देने के लिए मुँह खोला, लकड़ी छूट गई और वह नीचे गिर पड़ा। अपने क्रोध तथा असंयमित वाणी के कारण उसने प्राण गँवा दिए।

कथा की सीख

हर बात का उत्तर देना आवश्यक नहीं होता। कभी-कभी मौन ही सबसे बुद्धिमत्तापूर्ण उत्तर होता है। क्रोध, अहंकार और उपहास से विचलित होकर बोला गया एक शब्द भी बड़ी हानि करा सकता है।

मनुष्य को बोलने से पहले विचार करना चाहिए—क्या कहना आवश्यक है, क्या कहना उचित है और क्या कहने का यह सही समय है? जो व्यक्ति अपनी वाणी पर नियंत्रण रखता है, वह अनेक विवादों और संकटों से बच जाता है।

नीति-वचन

“वाणी पर संयम रखने वाला व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा, संबंध और भविष्य—तीनों की रक्षा करता है।”