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राजस्थान निकाय चुनाव: बड़े शहरों में भाजपा का दबदबा, कांग्रेस ने भी कई गढ़ों में बदली तस्वीर; त्रिशंकु निकायों में निर्दलीय बने सत्ता की चाबी

प्रकाशित: 14 September 2026, 1:20 pm

जयपुर। राजस्थान के नगरीय निकाय चुनावों के परिणामों ने प्रदेश की शहरी राजनीति की नई तस्वीर सामने रख दी है। राज्य के 309 नगर निकायों के करीब 10,245 वार्डों में हुए चुनाव में भारतीय जनता पार्टी कुल मिलाकर सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरी है। कांग्रेस ने भी बीकानेर, अजमेर, सीकर, झालावाड़ और भवानीमंडी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रभावशाली प्रदर्शन करते हुए यह संकेत दिया है कि प्रदेश का जनादेश पूरी तरह एकतरफा नहीं है। बड़ी संख्या में निर्दलीय प्रत्याशियों की जीत ने कई नगर निगमों, नगर परिषदों और नगरपालिकाओं में बोर्ड गठन का गणित उलझा दिया है।

उपलब्ध प्रदेशव्यापी परिणामों में भाजपा ने लगभग 4,042, कांग्रेस ने करीब 3,498, निर्दलीयों ने लगभग 2,215 तथा अन्य दलों ने करीब 169 वार्डों में जीत दर्ज की। कुछ वार्डों के परिणाम अथवा आधिकारिक समेकन शेष होने के कारण अंतिम आंकड़ों में मामूली परिवर्तन संभव है। परिणामों का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि भाजपा प्रदेश के शहरी निकायों में सबसे आगे रही, लेकिन कांग्रेस ने अनेक प्रमुख शहरों में मजबूत चुनौती दी और दो बड़े नगर निगमों में स्पष्ट अथवा लगभग स्पष्ट बढ़त प्राप्त की।

जयपुर में भाजपा का स्पष्ट और मजबूत जनादेश

राजधानी जयपुर के 150 वार्डों में भाजपा ने 95 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है। कांग्रेस को 43 सीटें मिलीं, जबकि शेष 12 वार्ड निर्दलीय और अन्य प्रत्याशियों के खाते में गए। बहुमत के लिए 76 पार्षदों की आवश्यकता है और भाजपा इस आंकड़े से 19 सीट आगे है। इसलिए जयपुर में भाजपा का बोर्ड बनने तथा भाजपा समर्थित प्रत्याशी के महापौर निर्वाचित होने में फिलहाल कोई संख्यात्मक बाधा दिखाई नहीं देती।

जयपुर का परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पुराने जयपुर ग्रेटर और जयपुर हेरिटेज नगर निगमों के पुनर्गठन के बाद एकीकृत नगर निगम के रूप में यह बड़ा चुनाव था। भाजपा की जीत बताती है कि राजधानी के मतदाताओं ने स्थानीय असंतोष, प्रत्याशियों के व्यक्तिगत प्रभाव और निर्दलीय चुनौती के बावजूद निगम की सत्ता स्पष्ट बहुमत वाले दल को सौंपने का निर्णय किया।

उदयपुर में भाजपा का दबदबा कायम

उदयपुर नगर निगम के 80 वार्डों में भाजपा ने 53 सीटों पर जीत दर्ज की। कांग्रेस को 23 सीटें मिलीं, जबकि तीन निर्दलीय और एक माकपा प्रत्याशी विजयी रहा। यहां बहुमत के लिए 41 पार्षद आवश्यक हैं। भाजपा के पास बहुमत से 12 सीट अधिक हैं, इसलिए उदयपुर में लगातार सातवीं बार भाजपा का बोर्ड बनने की राह पूरी तरह साफ है।

उदयपुर के परिणाम में निर्दलीयों की संख्या इतनी नहीं है कि वे बोर्ड गठन को प्रभावित कर सकें। भाजपा के भीतर महापौर पद के उम्मीदवार के चयन को लेकर प्रतिस्पर्धा हो सकती है, लेकिन बोर्ड किस दल का बनेगा, इस प्रश्न पर कोई वास्तविक अनिश्चितता नहीं दिखाई देती।

कोटा में भाजपा की निर्णायक वापसी

कोटा नगर निगम के 100 वार्डों में उपलब्ध अंतिम परिणामों के अनुसार भाजपा ने लगभग 61 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया है। कांग्रेस 35 सीटों पर सिमट गई, जबकि चार निर्दलीय उम्मीदवार विजयी रहे। निगम में बहुमत के लिए 51 पार्षद चाहिए। भाजपा के पास इससे करीब 10 सीट अधिक होने के कारण कोटा में पार्टी का बोर्ड बनना लगभग निश्चित है।

कोटा में पूर्व में दो नगर निगमों के अलग-अलग राजनीतिक समीकरण रहे थे। नए स्वरूप में हुए चुनाव में भाजपा का स्पष्ट बहुमत प्राप्त करना प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाएगा। निर्दलीय पार्षद यहां बोर्ड गठन के लिए आवश्यक नहीं हैं, हालांकि महापौर और समितियों के गठन में उनका समर्थन राजनीतिक रूप से उपयोगी हो सकता है।

बीकानेर में कांग्रेस ने भाजपा से छीनी बढ़त

बीकानेर नगर निगम के 80 वार्डों में कांग्रेस ने 42 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। भाजपा को 27, निर्दलीयों को 10 और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी को एक सीट मिली। बहुमत का आंकड़ा 41 है, इसलिए कांग्रेस को बोर्ड बनाने के लिए किसी निर्दलीय पार्षद के समर्थन की अनिवार्य आवश्यकता नहीं है।

बीकानेर का परिणाम कांग्रेस के लिए प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण परिणामों में से एक है। पिछले नगर निगम में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन इस बार कांग्रेस ने न केवल अपनी संख्या बढ़ाई, बल्कि स्वयं के दम पर बहुमत भी प्राप्त किया। यदि पार्टी के सभी पार्षद एकजुट रहते हैं तो कांग्रेस समर्थित महापौर का निर्वाचन लगभग निश्चित माना जा सकता है। यहां निर्दलीय पार्षद बोर्ड को गिराने या बनाने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन समितियों और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों में उनकी भूमिका बनी रहेगी।

अजमेर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी, निर्दलीयों पर टिकी सत्ता

अजमेर नगर निगम के 80 वार्डों में कांग्रेस ने 37, भाजपा ने 32 और निर्दलीयों ने 11 सीटें जीती हैं। बहुमत के लिए 41 पार्षद आवश्यक हैं। कांग्रेस बहुमत से केवल चार सीट दूर है, जबकि भाजपा को बोर्ड बनाने के लिए कम-से-कम नौ अतिरिक्त पार्षदों का समर्थन चाहिए।

संख्यात्मक दृष्टि से अजमेर में कांग्रेस का पलड़ा भाजपा की तुलना में भारी है। कांग्रेस यदि 11 निर्दलीयों में से केवल चार को अपने पक्ष में कर लेती है तो उसका बोर्ड बन सकता है। भाजपा के लिए नौ निर्दलीयों को साथ लाना अपेक्षाकृत कठिन होगा। इसके अतिरिक्त चुनाव से पहले अजमेर में कांग्रेस के कई बागी उम्मीदवार निर्दलीय के रूप में मैदान में थे। यदि विजयी निर्दलीयों में कांग्रेस की पृष्ठभूमि वाले पार्षदों की संख्या अधिक है तो कांग्रेस के लिए समर्थन जुटाना और आसान हो सकता है।

इसके बावजूद अजमेर का बोर्ड अभी कांग्रेस का घोषित बोर्ड नहीं माना जा सकता। निर्दलीय पार्षद महापौर पद, समिति अध्यक्षता, स्थानीय विकास कार्यों और राजनीतिक समझौते के आधार पर निर्णय ले सकते हैं। राज्य में भाजपा की सरकार होने के कारण भाजपा विकास और सरकारी समन्वय का तर्क देकर निर्दलीयों को साधने का प्रयास कर सकती है। फिर भी केवल वर्तमान संख्याबल के आधार पर देखें तो अजमेर का प्रारंभिक झुकाव कांग्रेस की ओर अधिक दिखाई देता है।

जोधपुर में मुकाबला बराबरी पर, कोई भी पक्ष बना सकता है बोर्ड

जोधपुर नगर निगम के उपलब्ध 99 परिणामों में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने 44-44 सीटें जीती हैं, जबकि 11 निर्दलीय प्रत्याशी विजयी हुए हैं। एक वार्ड का परिणाम उपलब्ध समेकित आंकड़ों में शामिल नहीं था। 100 सदस्यीय निगम में बहुमत के लिए 51 पार्षदों की आवश्यकता होगी। मौजूदा स्थिति में भाजपा और कांग्रेस दोनों को कम-से-कम सात अतिरिक्त पार्षदों का समर्थन चाहिए।

जोधपुर में दोनों दलों की शुरुआती स्थिति बिल्कुल बराबर है। इसलिए यहां केवल सबसे बड़ी पार्टी होने का लाभ भी किसी दल को नहीं मिल रहा। वास्तविक फैसला 11 निर्दलीय पार्षदों तथा शेष एक वार्ड के परिणाम से होगा। यदि अंतिम वार्ड भाजपा या कांग्रेस में से किसी एक के पक्ष में जाता है तो उस दल को मामूली मनोवैज्ञानिक बढ़त मिल सकती है, लेकिन फिर भी बहुमत के लिए निर्दलीयों का समर्थन आवश्यक रहेगा।

कांग्रेस को जोधपुर में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के प्रभाव, स्थानीय संगठन और पुराने राजनीतिक संपर्कों का लाभ मिल सकता है। दूसरी ओर भाजपा प्रदेश में सत्तारूढ़ है और नगर विकास, बजट तथा राज्य सरकार के साथ बेहतर समन्वय का तर्क देकर निर्दलीय पार्षदों को अपने पक्ष में करने का प्रयास करेगी। इसलिए जोधपुर में राजनीतिक झुकाव किसी एक दल की ओर निश्चित रूप से बताना अभी उचित नहीं होगा। सत्ता और सरकारी समन्वय के कारण भाजपा को व्यावहारिक बढ़त मिल सकती है, जबकि स्थानीय राजनीतिक संबंधों के आधार पर कांग्रेस की दावेदारी भी उतनी ही मजबूत है। जो पक्ष सात या उससे अधिक निर्दलीयों को एक साथ रखने में सफल होगा, उसी का बोर्ड बनेगा।

सीकर और झालावाड़ में कांग्रेस की महत्वपूर्ण सफलता

सीकर नगर परिषद में कांग्रेस ने 65 में से 38 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। भाजपा को 22, निर्दलीयों को चार और आरएलपी को एक सीट मिली। यहां कांग्रेस को बोर्ड गठन के लिए किसी बाहरी समर्थन की आवश्यकता नहीं है।

झालावाड़ नगर परिषद में भी कांग्रेस ने 45 में से 29 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। भाजपा को 13, निर्दलीयों को दो और आम आदमी पार्टी को एक सीट मिली। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखे जाने वाले झालावाड़ में कांग्रेस की यह जीत राजनीतिक रूप से विशेष महत्व रखती है।

बारां में आम आदमी पार्टी और नोखा में माकपा ने बनाया मुकाबला बहुकोणीय

बारां नगर परिषद में आम आदमी पार्टी ने अप्रत्याशित रूप से मजबूत प्रदर्शन करते हुए बोर्ड गठन की स्थिति बनाई है। इससे राजस्थान की निकाय राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के अतिरिक्त तीसरे दल के लिए सीमित लेकिन महत्वपूर्ण जगह बनने का संकेत मिला है। इसी प्रकार नोखा में माकपा का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा। छोटे दलों की ये सफलताएं स्थानीय नेतृत्व, प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़ और क्षेत्रीय मुद्दों के प्रभाव को दर्शाती हैं।

चित्तौड़गढ़ में भाजपा, भवानीमंडी में कांग्रेस

चित्तौड़गढ़ नगर परिषद के 60 वार्डों में भाजपा ने 32 सीटें जीतकर बहुमत प्राप्त किया। कांग्रेस को 24 और निर्दलीयों को चार सीटें मिलीं। यहां भाजपा का बोर्ड बनना तय माना जा सकता है।

इसके विपरीत भवानीमंडी नगर पालिका के 40 वार्डों में कांग्रेस ने 26 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। भाजपा को 13 और निर्दलीय को एक सीट मिली। ये परिणाम बताते हैं कि प्रदेशव्यापी बढ़त के बावजूद भाजपा का प्रदर्शन हर शहर में समान नहीं रहा और अनेक स्थानीय निकायों में कांग्रेस ने प्रभावी वापसी की है।

जहाँ स्पष्ट बहुमत नहीं, वहाँ कैसे बनेगा बोर्ड?

त्रिशंकु नगर निकायों में बोर्ड गठन का वास्तविक आधार केवल सबसे बड़ी पार्टी होना नहीं है। महापौर, सभापति अथवा अध्यक्ष का निर्वाचन निर्वाचित पार्षदों के मतदान से होगा। इसलिए जिस दल के पास बहुमत से कम सीटें हैं, उसे निर्दलीय अथवा छोटे दलों के पार्षदों का औपचारिक या अनौपचारिक समर्थन प्राप्त करना होगा।

अजमेर में कांग्रेस को केवल चार अतिरिक्त पार्षदों की जरूरत होने से उसका दावा अधिक मजबूत दिखाई देता है। जोधपुर में दोनों दल बराबरी पर हैं, इसलिए वहां राजनीतिक वार्ता, निर्दलीयों की मूल पृष्ठभूमि और स्थानीय नेताओं के व्यक्तिगत संबंध निर्णायक होंगे। अलवर, पाली, भरतपुर, चूरू तथा कई नगर परिषदों और नगरपालिकाओं में भी निर्दलीय पार्षदों के समर्थन के बाद ही स्पष्ट बोर्ड सामने आएगा।

ऐसे निकायों में तीन संभावनाएं रहती हैं—पहली, निर्दलीय पार्षद किसी एक दल को सामूहिक समर्थन दे दें; दूसरी, छोटे-छोटे समूह अलग-अलग शर्तों पर समर्थन दें; और तीसरी, बोर्ड गठन से ठीक पहले किसी दल के बागी या पुराने कार्यकर्ता अपने मूल राजनीतिक दल में लौट जाएं। इसलिए केवल निर्दलीय के चुनाव चिह्न से उसकी भावी राजनीतिक दिशा का निश्चित अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

प्रदेश के जनादेश का राजनीतिक संदेश

राजस्थान निकाय चुनावों का समग्र संदेश यह है कि भाजपा ने शहरी क्षेत्रों में अपनी संगठनात्मक बढ़त बनाए रखी है। जयपुर, उदयपुर और कोटा जैसे बड़े नगर निगमों में स्पष्ट बहुमत मिलना भाजपा के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। प्रदेश में अपनी सरकार होने से भाजपा को त्रिशंकु निकायों में भी अतिरिक्त राजनीतिक लाभ मिल सकता है।

दूसरी ओर कांग्रेस का प्रदर्शन पूरी तरह कमजोर नहीं कहा जा सकता। बीकानेर में स्पष्ट बहुमत, अजमेर में सबसे बड़ी पार्टी तथा सीकर, झालावाड़ और भवानीमंडी में मजबूत जीत कांग्रेस के लिए उत्साहजनक संकेत हैं। इन परिणामों से यह भी स्पष्ट होता है कि स्थानीय चुनावों में प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि, वार्ड स्तर का जनसंपर्क, स्थानीय समस्याएं और दलों के भीतर टिकट वितरण का असंतोष बड़ी भूमिका निभाते हैं।

स्पष्ट बहुमत वाले निकायों में तस्वीर लगभग तय है—जयपुर, उदयपुर और कोटा में भाजपा तथा बीकानेर, सीकर और झालावाड़ में कांग्रेस का बोर्ड बनने की प्रबल संभावना है। अजमेर का झुकाव संख्यात्मक रूप से कांग्रेस की ओर है, जबकि जोधपुर पूरी तरह खुला मुकाबला है। त्रिशंकु निकायों में अंतिम राजनीतिक तस्वीर महापौर, सभापति और अध्यक्ष के चुनाव के बाद ही सामने आएगी।