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जालोर नगर परिषद में किसका बनेगा बोर्ड? कांग्रेस बढ़त में, निर्दलीय निर्णायक और माली समाज की दावेदारी ने बढ़ाया राजनीतिक रोमांच

प्रकाशित: 14 September 2026, 1:14 pm

धर्मेंद्र सुंदेशा, संस्थापक—मारवाड़ पत्रिका

जालोर नगर परिषद चुनाव के परिणामों ने शहर की राजनीति को दिलचस्प मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। कुल 40 वार्डों वाली नगर परिषद में कांग्रेस के 19, भारतीय जनता पार्टी के 14 और सात निर्दलीय पार्षद निर्वाचित हुए हैं। किसी भी दल के पास अपने दम पर स्पष्ट बहुमत नहीं है। बोर्ड बनाने के लिए कम से कम 21 पार्षदों का समर्थन आवश्यक होगा। ऐसे में सात निर्दलीय पार्षद सत्ता की चाबी लेकर खड़े हैं।

संख्या के आधार पर कांग्रेस बोर्ड बनाने की दौड़ में भारतीय जनता पार्टी से काफी आगे दिखाई दे रही है। कांग्रेस को बहुमत के लिए केवल दो निर्दलीय पार्षदों की आवश्यकता है, जबकि भाजपा को अपने सभी 14 पार्षदों के साथ सातों निर्दलीयों का समर्थन जुटाना होगा। भाजपा के लिए यह गणित कठिन अवश्य है, लेकिन स्थानीय निकायों की राजनीति में अंतिम निर्णय होने तक किसी संभावना को पूरी तरह समाप्त भी नहीं माना जा सकता।

कांग्रेस के पास सबसे सरल संख्यात्मक रास्ता

कांग्रेस के पास 19 पार्षद हैं। यदि पार्टी अपने सभी पार्षदों को एकजुट रखती है और दो निर्दलीय पार्षदों का समर्थन हासिल कर लेती है, तो उसका बोर्ड बन सकता है। इसलिए बोर्ड गठन की पहली और स्वाभाविक दावेदार कांग्रेस है।

लेकिन कांग्रेस के सामने चुनौती केवल दो निर्दलीयों को साथ लेने की नहीं है। सबसे पहले उसे अपने 19 पार्षदों के बीच सभापति पद को लेकर सहमति बनानी होगी। यदि एक से अधिक प्रभावशाली दावेदार सामने आते हैं तो आंतरिक असंतोष पार्टी की आसान दिखाई दे रही राह को कठिन बना सकता है। इसलिए कांग्रेस का पहला लक्ष्य अपने निर्वाचित पार्षदों की एकजुटता और दूसरा लक्ष्य निर्दलीयों के साथ भरोसेमंद समझौता होना चाहिए।

यदि कांग्रेस सामाजिक समीकरणों से अलग हटकर पार्टी की वरिष्ठता, स्वीकार्यता और नगर परिषद चलाने की क्षमता के आधार पर चेहरा तय करती है, तो मुमताज अली और तरुण सोलंकी संभावित दावेदारों के रूप में चर्चा में आ सकते हैं। मुमताज अली निर्वाचित पार्षद हैं और स्थानीय राजनीति में उनका अपना आधार है। वहीं तरुण सोलंकी भी कांग्रेस की ओर से संभावित चेहरे के रूप में देखे जा सकते हैं। अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व, पार्षदों की सहमति और निर्दलीयों की स्वीकार्यता पर निर्भर करेगा।

भाजपा के सामने सात निर्दलीयों को साथ लाने की चुनौती

भारतीय जनता पार्टी के पास 14 पार्षद हैं। उसे बहुमत तक पहुंचने के लिए सातों निर्दलीय पार्षदों का समर्थन चाहिए। इसका अर्थ है कि किसी एक निर्दलीय पार्षद के अलग रहने पर भी भाजपा का गणित बिगड़ सकता है। इसलिए भाजपा का रास्ता कांग्रेस की तुलना में अधिक कठिन और राजनीतिक रूप से अधिक जोखिमपूर्ण दिखाई देता है।

भाजपा यदि बोर्ड बनाने का गंभीर प्रयास करती है तो उसे ऐसा सभापति प्रत्याशी सामने लाना होगा जो पार्टी के 14 पार्षदों के साथ सभी सात निर्दलीयों को भी स्वीकार हो। इसके लिए केवल संगठनात्मक पकड़ पर्याप्त नहीं होगी। उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, सामाजिक स्वीकार्यता, व्यवहार-कुशलता और निर्दलीय पार्षदों से संवाद की क्षमता भी निर्णायक होगी।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि पिछले दो कार्यकाल में जालोर नगर परिषद में भाजपा का बोर्ड रहा है। इसके बावजूद शहर में ड्रेनेज व्यवस्था, सुंदेलाव तालाब के ओवरफ्लो, क्षतिग्रस्त सड़कों, अव्यवस्थित नालियों और नगर परिषद से संबंधित सामान्य कार्यों में देरी जैसी समस्याएं लगातार चर्चा में रही हैं। आम नागरिकों को छोटे-छोटे कामों के लिए भी परेशान होना पड़ा। चुनाव परिणामों को इन समस्याओं पर मतदाताओं की प्रतिक्रिया के रूप में भी देखा जा रहा है।

इसलिए भाजपा के सामने केवल बहुमत जुटाने की चुनौती नहीं है; उसे पिछले बोर्डों के प्रति बनी जनधारणा का जवाब भी देना होगा। यदि पार्टी फिर से बोर्ड बनाने का प्रयास करती है तो उसे नया, सहज, सक्रिय और जनविश्वास वाला चेहरा सामने लाने की आवश्यकता होगी।

14 माली पार्षदों से बना महत्वपूर्ण सामाजिक समीकरण

स्थानीय सामाजिक गणना के अनुसार 40 निर्वाचित पार्षदों में से लगभग 14 पार्षद माली समाज से संबंधित हैं। यह संख्या कुल सदन के एक-तिहाई से अधिक है। ऐसे में सभापति पद के चयन में माली समाज की दावेदारी को नजरअंदाज करना दोनों प्रमुख दलों के लिए राजनीतिक रूप से कठिन हो सकता है।

हालांकि किसी भी दल पर कानूनी रूप से यह बाध्यता नहीं है कि वह माली समाज के व्यक्ति को ही सभापति पद का प्रत्याशी बनाए। यह पूरी तरह राजनीतिक रणनीति, पार्षदों की संख्या, आंतरिक समर्थन और निर्दलीयों की सहमति से जुड़ा निर्णय होगा। फिर भी 14 पार्षदों की सामाजिक भागीदारी दोनों दलों पर ऐसा उम्मीदवार चुनने का दबाव अवश्य बना सकती है जो इस बड़े समूह को स्वीकार हो।

यदि माली समाज के पार्षद पार्टी की सीमाओं से ऊपर उठकर किसी एक सामाजिक उम्मीदवार के पक्ष में लामबंद होते हैं, तो वे बोर्ड गठन के पूरे समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन यह तभी संभव होगा जब उनमें आंतरिक एकता हो। केवल समान सामाजिक पृष्ठभूमि होना राजनीतिक एकजुटता की गारंटी नहीं है, क्योंकि निर्वाचित पार्षद अलग-अलग दलों और स्थानीय राजनीतिक समूहों से जुड़े हुए हैं।

भाजपा में नितिन सोलंकी और दिनेश महावर संभावित चेहरे

भारतीय जनता पार्टी यदि माली समाज के किसी नेता पर दांव लगाती है तो सीए नितिन सोलंकी और दिनेश महावर प्रमुख संभावित चेहरों के रूप में सामने आ सकते हैं। दोनों के नाम सामाजिक और राजनीतिक चर्चाओं में जगह बना सकते हैं।

भाजपा के लिए प्रत्याशी चयन में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होगा कि कौन-सा चेहरा सातों निर्दलीय पार्षदों या उनमें से आवश्यक संख्या को अपने पक्ष में ला सकता है। चूंकि भाजपा को अपने प्रत्येक समर्थक मत की आवश्यकता होगी, इसलिए उम्मीदवार को पार्टी के भीतर निर्विवाद होने के साथ निर्दलीयों के बीच भी स्वीकार्य होना पड़ेगा।

यदि माली समाज का कोई प्रत्याशी सामाजिक समर्थन, संगठनात्मक तालमेल और निर्दलीयों की सहमति—इन तीनों स्तरों पर संतुलन बना पाता है, तो भाजपा कठिन गणित के बावजूद मुकाबले में बनी रह सकती है। लेकिन सातों निर्दलीयों को एक साथ लाना व्यावहारिक रूप से एक बड़ी चुनौती होगी।

कांग्रेस में वंशीलाल माली और शोभा सुंदेशा की संभावना

कांग्रेस यदि माली समाज की संख्या और सामाजिक समीकरण को प्राथमिकता देती है तो वंशीलाल माली तथा शोभा सुंदेशा संभावित दावेदारों के रूप में चर्चा में आ सकते हैं। कांग्रेस के पास इसका एक अतिरिक्त लाभ यह होगा कि उसे भाजपा की तरह सात निर्दलीयों को साथ लेने की आवश्यकता नहीं है। केवल दो निर्दलीय पार्षदों का समर्थन मिलने से उसका बहुमत पूरा हो सकता है।

कांग्रेस ऐसा उम्मीदवार चुन सकती है जो अपने 19 पार्षदों को एकजुट रखने के साथ कम से कम दो निर्दलीयों का भरोसा प्राप्त कर सके। यदि माली समाज से आने वाला प्रत्याशी इन दोनों कसौटियों पर खरा उतरता है तो सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक स्थिरता का संतुलन बन सकता है।

इसके विपरीत यदि कांग्रेस जातिगत समीकरण की जगह अनुभव, पार्टी निष्ठा, प्रशासनिक क्षमता और सभी वर्गों की स्वीकार्यता को प्राथमिकता देती है, तो मुमताज अली और तरुण सोलंकी जैसे नामों पर भी विचार हो सकता है। इसलिए कांग्रेस की रणनीति इस बात पर निर्भर करेगी कि वह सामाजिक प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता देती है अथवा व्यापक राजनीतिक स्वीकार्यता और नगर परिषद के संचालन की क्षमता को।

क्या कोई तीसरा राजनीतिक रास्ता भी संभव है?

स्पष्ट बहुमत नहीं होने के कारण कुछ अन्य राजनीतिक संभावनाएं भी बन सकती हैं। निर्दलीय पार्षद किसी साझा उम्मीदवार के समर्थन की शर्त रख सकते हैं। दोनों दलों के असंतुष्ट पार्षदों पर भी सबकी नजर रहेगी। अंतिम समय में समर्थन का स्वरूप बदलना, किसी सर्वमान्य चेहरे पर सहमति बनना अथवा निर्दलीयों द्वारा किसी विशेष उम्मीदवार का नाम आगे करना भी संभव है।

फिर भी दल-बदल संबंधी प्रावधान, पार्टी अनुशासन और संगठनात्मक निर्णयों का प्रभाव रहेगा। इसलिए किसी भी संभावित क्रॉस-वोटिंग या पाला बदलने को निश्चित मानना उचित नहीं होगा। फिलहाल सबसे व्यावहारिक परिदृश्य कांग्रेस द्वारा दो निर्दलीयों का समर्थन जुटाकर बोर्ड बनाने का है। भाजपा के लिए संभावना तभी बन सकती है जब वह सभी सात निर्दलीयों को एक मंच पर लाने में सफल हो और अपने 14 पार्षदों की पूरी एकजुटता बनाए रखे।

जातीय समीकरण से आगे शहर की जरूरतों पर हो फैसला

जालोर को इस समय ऐसे सभापति और बोर्ड की आवश्यकता है जो राजनीतिक तथा सामाजिक समीकरण साधने के साथ शहर की बुनियादी समस्याओं पर ठोस काम कर सके। ड्रेनेज, सुंदेलाव तालाब का ओवरफ्लो, जल निकासी, क्षतिग्रस्त सड़कें, नालियों की सफाई, कचरा प्रबंधन, स्ट्रीट लाइट और आम नागरिकों के नगर परिषद संबंधी काम—ये सभी तत्काल ध्यान मांगते हैं।

पिछले वर्षों में नागरिकों की एक प्रमुख शिकायत यह रही है कि नगर परिषद में सामान्य कार्यों के लिए भी उन्हें बार-बार चक्कर लगाने पड़े। इस स्थिति में केवल राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्ति को सभापति बनाना पर्याप्त नहीं होगा। उम्मीदवार ऐसा होना चाहिए जो जनता के लिए सहज उपलब्ध हो, प्रशासन से समन्वय कर सके, निर्वाचित पार्षदों को साथ लेकर चले और निर्णय लेने की क्षमता रखता हो।

दोनों दलों के हित में यही है कि वे विवादों से दूर, ईमानदार छवि, संघर्षशील स्वभाव, संगठनात्मक क्षमता और सेवाभाव वाले चेहरे को आगे करें। ऐसा नेतृत्व ही पांच वर्षों तक स्थिर बोर्ड चलाने और नागरिकों का भरोसा दोबारा कायम करने में सफल हो सकता है।

कांग्रेस की बढ़त स्पष्ट, लेकिन निर्दलीयों के हाथ में अंतिम चाबी

वर्तमान संख्या के आधार पर कांग्रेस बोर्ड गठन की सबसे मजबूत स्थिति में है। उसे केवल दो अतिरिक्त मतों की आवश्यकता है। भाजपा का रास्ता कठिन है क्योंकि उसे सातों निर्दलीयों का समर्थन जुटाना होगा। इसके बावजूद सभापति पद के उम्मीदवार का चयन, माली समाज के 14 पार्षदों की भूमिका, पार्टी के अंदरूनी समीकरण और निर्दलीयों की शर्तें अंतिम परिणाम को प्रभावित कर सकती हैं।

माली समाज की संख्या ने दोनों दलों के सामने प्रतिनिधित्व का गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है, लेकिन समाज का उम्मीदवार देना किसी दल की अनिवार्य मजबूरी नहीं है। अंतिम जीत उस उम्मीदवार की संभावना अधिक करेगी जो सामाजिक समीकरणों के साथ अपने दल को एकजुट रख सके, निर्दलीयों का भरोसा प्राप्त कर सके और शहर के सभी वर्गों को स्वीकार हो।

जालोर की जनता ने खंडित जनादेश देकर राजनीतिक दलों को स्पष्ट संदेश दिया है कि सत्ता किसी एक दल की बपौती नहीं है। अब असली परीक्षा बोर्ड बनाने की नहीं, बल्कि ऐसा नेतृत्व चुनने की है जो नगर परिषद को पारदर्शी, जवाबदेह और जनहितकारी तरीके से चला सके।