जालोर नगर परिषद चुनाव: लक्ष्मण सिंह सांखला और मिस्री मल गहलोत की हार ने चौंकाया, कांग्रेस ने खोए दो अनुभवी दावेदार
धर्मेंद्र सुंदेशा, संस्थापक—मारवाड़ पत्रिका
जालोर नगर परिषद चुनाव में कांग्रेस 19 पार्षदों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है, लेकिन पार्टी के दो अनुभवी और संघर्षशील नेताओं—लक्ष्मण सिंह सांखला तथा मिस्री मल गहलोत—की हार ने राजनीतिक हलकों को चौंका दिया है। दोनों नेता चुनाव जीतते तो कांग्रेस के संभावित बोर्ड और सभापति पद की दावेदारी के समीकरण अधिक व्यापक हो सकते थे।
वार्ड 21 में केवल 19 मतों से हारे लक्ष्मण सिंह सांखला
लक्ष्मण सिंह सांखला ने कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में वार्ड संख्या 21 से चुनाव लड़ा। उन्हें 282 मत मिले, जबकि निर्दलीय प्रत्याशी हुकमीचंद सोलंकी 301 मत प्राप्त कर 19 मतों से विजयी रहे। भाजपा प्रत्याशी दिलीप सोलंकी को 96 मत मिले। इस प्रकार बेहद नजदीकी मुकाबले में कांग्रेस ने यह सीट गंवा दी। वर्ष 2019 के चुनाव में लक्ष्मण सिंह इसी वार्ड से कांग्रेस पार्षद निर्वाचित हुए थे।
लक्ष्मण सिंह सांखला पेशे से अधिवक्ता हैं और स्थानीय राजनीति में संघर्षशील तथा जुझारू व्यक्तित्व के रूप में पहचाने जाते हैं। वे प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली कांग्रेस की विभिन्न संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करते रहे हैं। उन्होंने किसी बड़े राजनीतिक पद की बजाय अपने संघर्ष, निरंतर सक्रियता और संगठन के प्रति समर्पण के आधार पर अपनी अलग पहचान बनाई है।
दूसरी बार चुनाव मैदान में उतरे लक्ष्मण सिंह सांखला की केवल 19 मतों से हुई हार बताती है कि मुकाबला कितना कड़ा था। वार्ड में भाजपा और अन्य निर्दलीय प्रत्याशियों को मिले मतों ने चुनावी गणित को प्रभावित किया। इतने कम अंतर की हार कांग्रेस के लिए भी समीक्षा का विषय होगी, क्योंकि कुछ मतों का परिवर्तन परिणाम को पूरी तरह पलट सकता था।
वार्ड 12 में मिस्री मल गहलोत की पराजय भी अप्रत्याशित
कांग्रेस के एक अन्य वरिष्ठ नेता मिस्री मल गहलोत ने वार्ड संख्या 12 से चुनाव लड़ा। इस वार्ड में निर्दलीय प्रत्याशी कैलाश 270 मत लेकर विजयी रहे। भाजपा प्रत्याशी चतराराम को 224 और कांग्रेस प्रत्याशी मिस्री मल को 134 मत मिले। वार्ड में कुल सात प्रत्याशी मैदान में थे, जिनमें पांच निर्दलीय शामिल थे।
मिस्री मल गहलोत पूर्व में तीन बार पार्षद रह चुके हैं। नगर परिषद की कार्यप्रणाली का लंबा अनुभव होने के साथ कांग्रेस संगठन में भी उनकी मजबूत भूमिका रही है। जुझारू और संघर्षशील व्यक्तित्व के कारण उनकी उम्मीदवारी को महत्वपूर्ण माना जा रहा था। लेकिन बहुकोणीय मुकाबले तथा निर्दलीय प्रत्याशियों की प्रभावी मौजूदगी के बीच उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।
उनकी हार इसलिए भी चौंकाने वाली मानी जा रही है क्योंकि तीन कार्यकाल का अनुभव किसी स्थानीय निकाय नेता को प्रशासनिक कामकाज, वार्डों की आवश्यकताओं और नगर परिषद के राजनीतिक समीकरणों की गहरी समझ देता है। इसके बावजूद मतदाताओं ने इस बार नया जनादेश दिया।
जीतते तो सभापति पद के मजबूत दावेदार हो सकते थे
जालोर नगर परिषद के 40 वार्डों में कांग्रेस के 19, भाजपा के 14 और सात निर्दलीय पार्षद जीते हैं। कांग्रेस को बोर्ड बनाने के लिए केवल दो निर्दलीयों का समर्थन चाहिए। ऐसी स्थिति में लक्ष्मण सिंह सांखला और मिस्री मल गहलोत चुनाव जीतते तो दोनों सभापति पद के संभावित और मजबूत दावेदारों में शामिल हो सकते थे।
मिस्री मल गहलोत के पक्ष में तीन बार पार्षद रहने का अनुभव, नगर परिषद की कार्यप्रणाली की जानकारी और संगठन में पकड़ महत्वपूर्ण आधार बन सकते थे। वहीं लक्ष्मण सिंह सांखला की अधिवक्ता के रूप में योग्यता, पार्टी की प्रदेश एवं राष्ट्रीय गतिविधियों में सक्रियता तथा संघर्षशील छवि उन्हें एक सशक्त दावेदार बना सकती थी।
दोनों की विशेषता यह है कि उनकी राजनीतिक पहचान केवल चुनाव के समय की सक्रियता पर आधारित नहीं रही। संगठन से लगातार जुड़े रहने, सार्वजनिक मुद्दों पर संघर्ष करने और कार्यकर्ताओं के बीच अपनी जगह बनाने के कारण दोनों नेता कांग्रेस के संभावित बोर्ड में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते थे।
चुनावी हार, राजनीतिक भूमिका का अंत नहीं
स्थानीय निकाय चुनाव में हार कई बार उम्मीदवार की राजनीतिक क्षमता से अधिक वार्ड स्तर के सूक्ष्म समीकरणों, व्यक्तिगत संपर्क, प्रत्याशियों की संख्या और मतों के विभाजन से निर्धारित होती है। लक्ष्मण सिंह सांखला की 19 मतों की मामूली हार इसका स्पष्ट उदाहरण है। वहीं वार्ड 12 में बड़ी संख्या में निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में होने से मुकाबला बहुकोणीय बन गया था।
इन परिणामों के बावजूद दोनों नेताओं का राजनीतिक और संगठनात्मक महत्व समाप्त नहीं होता। कांग्रेस का बोर्ड बनने की स्थिति में वे निर्वाचित पार्षद के रूप में सभापति पद के दावेदार नहीं रहेंगे, लेकिन संगठनात्मक समन्वय, निर्दलीय पार्षदों से संवाद, बोर्ड गठन और शहर के मुद्दों को पार्टी नेतृत्व तक पहुंचाने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
कांग्रेस के लिए भी आवश्यक होगा कि वह चुनाव हारने वाले अनुभवी नेताओं को हाशिये पर रखने के बजाय उनके अनुभव और संगठनात्मक क्षमता का उपयोग करे। नगर परिषद में संख्या जुटाना एक चरण है, लेकिन स्थिर बोर्ड चलाने और जनता के विश्वास पर खरा उतरने के लिए अनुभवी राजनीतिक कार्यकर्ताओं का सहयोग भी उतना ही आवश्यक है।
लक्ष्मण सिंह सांखला और मिस्री मल गहलोत की हार जालोर नगर परिषद चुनाव के उन परिणामों में शामिल है, जिन पर लंबे समय तक चर्चा होगी। दोनों चुनाव जीतते तो कांग्रेस के भीतर सभापति पद की प्रतिस्पर्धा अधिक मजबूत और रोचक होती। फिलहाल इनकी पराजय ने कांग्रेस के संभावित नेतृत्व समीकरण से दो अनुभवी नाम अवश्य कम कर दिए हैं, लेकिन शहर और संगठन की राजनीति में उनकी सक्रिय भूमिका आगे भी बनी रहने की संभावना है।

