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जब स्कूल में हम ‘मुर्गा’ बनते थे—अब जाकर पता चला, उसमें भी व्यायाम छिपा था!

प्रकाशित: 13 September 2026, 4:27 pm

बचपन के स्कूल की यादें भी बड़ी विचित्र होती हैं। कुछ यादें हँसाती हैं, कुछ डराती हैं और कुछ ऐसी होती हैं, जिन्हें याद करते ही शरीर अपने आप पुरानी मुद्रा में आने लगता है। ऐसी ही एक प्रसिद्ध स्कूली मुद्रा थी—“मुर्गा बन जाओ!”

गृहकार्य पूरा नहीं किया, स्कूल देर से पहुँचे, पहाड़ा सुनाते-सुनाते अटक गए, कक्षा में दोस्त से बातें कर लीं या शिक्षक के सवाल का जवाब नहीं आया—बस तत्काल आदेश मिल जाता था, “चलो, मुर्गा बनो!”

इसके बाद विद्यार्थी नीचे झुकता, अपने हाथ घुटनों के पीछे से निकालता और दोनों कान पकड़कर चुपचाप खड़ा हो जाता। उस समय मन में केवल यही चलता था कि शिक्षक कब कहेंगे—“ठीक है, अब बैठ जाओ।” आसपास बैठे मित्र पढ़ाई कम करते और दबे स्वर में हँसते अधिक थे। कई बार तो एक विद्यार्थी को देखकर पूरी कक्षा की हँसी छूट जाती और फिर दो-चार दूसरे विद्यार्थी भी उसके साथ मुर्गा बनने पहुँच जाते थे।

अब वर्षों बाद जब उस मुद्रा को याद करते हैं, तो लगता है कि हमारे शिक्षक हमसे एक साथ कितने काम करवा लेते थे! घुटने मुड़े हुए, कमर झुकी हुई, हाथ पीछे से घूमे हुए और कान मजबूती से पकड़े हुए—आज कोई फिटनेस प्रशिक्षक ऐसी मुद्रा करवाए तो शायद उसका शानदार अंग्रेजी नाम रख दे और लोग फीस देकर उसे सीखें!

उस समय हमें यह सजा लगती थी, लेकिन आज याद करने पर उसमें व्यायाम भी दिखाई देने लगता है। जांघों पर जोर, पैरों का संतुलन, कमर का झुकाव, हाथों का खिंचाव और चेहरे पर पूर्ण एकाग्रता—मानो स्कूल ने बिना जिम, बिना योगा मैट और बिना किसी मशीन के पूरा “ऑल बॉडी वर्कआउट” करवा दिया हो!

कान पकड़ने का भी अपना अलग दृश्य था। विद्यार्थी कान इसलिए नहीं पकड़ता था कि उसे अपनी गलती का गहरा बोध हो गया था, बल्कि इसलिए पकड़ता था क्योंकि हाथ छोड़ते ही शिक्षक की आवाज आ सकती थी—“ठीक से मुर्गा बनो!”

आज के बच्चों को यदि इस पुराने स्कूली दंड का किस्सा सुनाया जाए तो संभव है वे पहले इंटरनेट पर उसकी तस्वीर खोजें और फिर पूछें—“इसका ऐप कौन-सा था?” उन्हें क्या पता कि हमारे समय में शिक्षक ही ऐप थे, घंटी notification थी और मुर्गा बनना तत्काल fitness challenge!

समय बदल गया, विद्यालय बदल गए और अनुशासन के तरीके भी बदल गए। अब किसी को मुर्गा बनाने की बात नहीं, लेकिन पुरानी यादों की गठरी खोलें तो यह दृश्य चेहरे पर मुस्कान अवश्य ले आता है।

सच तो यह है कि हम स्कूल में केवल पढ़े ही नहीं—कभी दौड़े, कभी मैदान में खेले, कभी बेंच पर खड़े हुए और कभी मुर्गा भी बने। तब यह सब भारी लगता था, आज वही किस्से बचपन की सबसे हल्की-फुल्की और रोचक स्मृतियों में शामिल हैं।

बचपन भी अद्भुत था—गलती हमारी होती थी, मुर्गा हम बनते थे और मनोरंजन पूरी कक्षा का होता था!