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पानी की शुद्धता के लिए मिले 486 करोड़, फिर 445 करोड़ खर्च क्यों नहीं हुए?

प्रकाशित: 7 September 2026, 3:49 pm

राजस्थान में जल जीवन मिशन के अंतर्गत केवल नल कनेक्शन देना ही उद्देश्य नहीं था। ग्रामीण परिवारों तक पहुँचने वाला पानी सुरक्षित है या नहीं, इसकी नियमित जाँच भी आवश्यक थी। इसी उद्देश्य से जल गुणवत्ता निगरानी एवं सर्विलांस के लिए वर्ष 2019 से 20 जनवरी 2025 तक 486.23 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए गए।

सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार इस राशि में से केवल 40.39 करोड़ रुपये, यानी 8.31 प्रतिशत, खर्च किए गए। शेष 445.84 करोड़ रुपये अर्थात 91.69 प्रतिशत राशि का उपयोग नहीं हो सका।

यह धन प्रयोगशालाओं में पानी की जाँच, फील्ड टेस्टिंग किट खरीदने, ग्रामीण स्तर पर निगरानी, महिलाओं और कर्मचारियों के प्रशिक्षण तथा दूषित पानी मिलने पर उपचारात्मक कार्रवाई के लिए था। राशि खर्च नहीं होने के कारण जल परलाएँ शुरू नहीं हो सकीं और प्रशिक्षण गतिविधियाँ भी प्रभावित हुईं।

सरकार ने प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृतियों में देरी, चुनाव आचार संहिता और वार्षिक कार्ययोजना का अनुमोदन नहीं होने जैसे कारण बताए। लेकिन मूल प्रश्न यह है कि जनता के स्वास्थ्य के लिए उपलब्ध धन समय पर जनहितकारी व्यवस्था में क्यों नहीं बदला?

सरकारी धन की उपयोगिता आवंटन से नहीं, उससे जनता को मिले लाभ से तय होती है। पानी की शुद्धता से जुड़ी 91.69 प्रतिशत राशि का अप्रयुक्त रहना केवल वित्तीय कमी नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति गंभीर प्रशासनिक उदासीनता को रेखांकित करता है।


20 हजार से अधिक नलकूपों से पानी दिया, लेकिन क्या वह पीने योग्य था?

राजस्थान में वर्ष 2021-22 के दौरान ग्रामीण परिवारों को 20,619 नलकूपों से पानी की आपूर्ति की गई। लेकिन सीएजी की जाँच में सामने आया कि उस वर्ष विभाग ने इन नलकूपों के पानी की गुणवत्ता का परीक्षण नहीं किया।

जल जीवन मिशन के निर्धारित मानकों के अनुसार प्रत्येक जल स्रोत की रासायनिक जाँच वर्ष में एक बार और जीवाणु संबंधी जाँच मानसून से पहले एवं बाद में दो बार की जानी चाहिए। इसके विपरीत वर्ष 2022-23 में 20,640 नलकूपों में से केवल 1,869 नलकूपों—9.06 प्रतिशत का परीक्षण हुआ। वर्ष 2023-24 में भी केवल 9,409 नलकूपों—45.58 प्रतिशत की जाँच की गई।

सीएजी ने वर्ष 20ीक्षणों में कुल 68.45 प्रतिशत की कमी दर्ज की। वर्ष 2019 से 2022 तक के परीक्षण संबंधी पूरे आँकड़े भी लेखा-परीक्षा को उपलब्ध नहीं कराए गए।

बिना जाँच के यह मान लेना संभव नहीं कि प्रत्येक स्रोत का पानी दूषण से मुक्त था। विशेष रूप से फ्लोराइड, नाइट्रेट, खारापन और जीवाणु प्रदूषण से प्रभावित प्रदेश में नियमित परीक्षण नहीं होना ग्रामीण परिवारों के स्वास्थ्य को अनिश्चितता में डालता है।

नल या नलकूप उपलब्ध करा देना योजना का आधा हिस्सा है। वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब हर परिवार को मिलने वाला पानी नियमित रूप से जाँचा हुआ और पीने योग्य भी हो।