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डिग्री से रोजगार तक: शिक्षा व्यवस्था सुधरेगी तो देश भी आगे बढ़ेगा

प्रकाशित: 30 August 2026, 4:59 am

आलेख:- महिपाल सिंह (सह-संपादक)

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है। लेकिन यही युवा यदि वर्षों तक पढ़ाई करने, डिग्री लेने और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के बाद भी रोजगार के लिए भटकता रहे, तो शिक्षा व्यवस्था के उद्देश्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आज आवश्यकता केवल अधिक स्कूल और कॉलेज खोलने की नहीं, बल्कि ऐसी शिक्षा देने की है जो ज्ञान के साथ कौशल, रोजगार, चरित्र और जिम्मेदार नागरिक भी तैयार करे।

भारत की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर औपनिवेशिक काल का ऐतिहासिक प्रभाव रहा है। स्वतंत्रता के बाद इसमें व्यापक बदलाव हुए और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने कौशल एवं व्यावसायिक शिक्षा पर विशेष जोर दिया है। फिर भी शिक्षा और रोजगार की आवश्यकता के बीच बड़ा अंतर आज भी दिखाई देता है।

डिग्री और रोजगार के बीच बढ़ती दूरी

Mercer-Mettl के India Graduate Skill Index 2025 में नौकरी के लिए आवेदन करने वाले भारतीय स्नातकों में लगभग 42.6 प्रतिशत को समग्र रूप से रोजगार के लिए तैयार पाया गया। इसका अर्थ यह नहीं कि बाकी विद्यार्थी अयोग्य हैं, बल्कि यह संकेत है कि डिग्री और बाजार को आवश्यक व्यावहारिक कौशल में दूरी बनी हुई है।

विश्व बैंक भी शिक्षा को कौशल, रोजगार और आर्थिक विकास की बुनियाद मानता है। उसके अनुसार शिक्षा रोजगार और आय की संभावनाएं बढ़ाती है, गरीबी कम करती है, नवाचार को प्रोत्साहित करती है और समाज में स्थिरता तथा सामाजिक एकता मजबूत करती है।

पेपर लीक केवल परीक्षा का अपराध नहीं

बार-बार होने वाले पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताएं इस संकट को और गंभीर बनाती हैं। NEET-UG 2024 मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्वीकार किया था कि हजारीबाग और पटना में प्रश्नपत्र लीक होने का तथ्य विवादित नहीं था। अदालत ने यह भी कहा कि लाखों विद्यार्थियों के करियर से जुड़े ऐसे मामलों में परीक्षा प्रक्रिया पर विद्यार्थियों का विश्वास बना रहना आवश्यक है।

समस्या की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Act, 2024 लागू किया। जुलाई 2026 में सरकार ने कानून को और कड़ा करने के लिए संशोधन विधेयक भी प्रस्तुत किया। सरकार ने स्वयं माना कि पेपर लीक केवल नियम का उल्लंघन नहीं करता, बल्कि ईमानदार अभ्यर्थी की मेहनत और व्यवस्था में उसके विश्वास को भी तोड़ता है।

हाल के वर्षों में बेरोजगारी, परीक्षा अनियमितताओं और पेपर लीक को लेकर विभिन्न छात्र आंदोलनों का उभरना भी इसी असंतोष का संकेत है। इन आंदोलनों की राजनीति से अलग मूल प्रश्न यह है कि यदि वर्षों की मेहनत के बाद परीक्षा ही निष्पक्ष न रहे या नियुक्तियां लगातार विवादों में फंसी रहें तो युवा व्यवस्था पर विश्वास कैसे करेगा?

शिक्षा और देश की शांति का संबंध

शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी दिलाना भी नहीं है। अच्छी शिक्षा नागरिक को विवेक, वैज्ञानिक दृष्टि, संवैधानिक समझ, सहिष्णुता और सामाजिक जिम्मेदारी देती है। विश्व बैंक के अध्ययनों में भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को सामाजिक एकता और स्थिरता मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण माध्यम माना गया है।

जब युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, निष्पक्ष परीक्षा और सम्मानजनक रोजगार का रास्ता मिलता है, तो उनका विश्वास लोकतांत्रिक और सामाजिक संस्थाओं में मजबूत होता है। इसके विपरीत लंबे समय तक बेरोजगारी, अवसरों की असमानता और परीक्षा व्यवस्था में अविश्वास सामाजिक निराशा पैदा कर सकता है।

सुधार कहाँ से शुरू हो?

सबसे पहले प्राथमिक स्तर पर भाषा, गणित और तार्किक क्षमता मजबूत करनी होगी। माध्यमिक शिक्षा से ही विद्यार्थियों को कंप्यूटर, AI, वित्तीय साक्षरता, तकनीकी कौशल और स्थानीय व्यवसायों से परिचित कराया जाए।

कॉलेज की प्रत्येक डिग्री को internship, apprenticeship और practical project से जोड़ा जाना चाहिए। ITI और Polytechnic को कमजोर विकल्प नहीं, बल्कि रोजगार का मजबूत मार्ग बनाया जाए। पाठ्यक्रम स्थानीय उद्योगों की मांग के अनुसार समय-समय पर बदले जाएं।

इसके साथ प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सुरक्षित डिजिटल सिस्टम, प्रश्नपत्र की मजबूत सुरक्षा, दोषियों पर त्वरित कार्रवाई और भर्ती का निश्चित समय-चक्र आवश्यक है।

आम परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा बच्चे की शिक्षा पर इसलिए खर्च करता है कि उसका भविष्य बेहतर हो। इसलिए शिक्षा की सफलता का अंतिम पैमाना केवल अंक और डिग्री नहीं होना चाहिए। असली सवाल यह होना चाहिए—बच्चे ने क्या सीखा, वह क्या कर सकता है, क्या वह रोजगार या व्यवसाय के योग्य है और क्या वह एक जिम्मेदार नागरिक बन रहा है?

भारत को यदि आर्थिक रूप से विकसित, सामाजिक रूप से शांत और विश्व स्तर पर मजबूत देश बनना है तो सबसे बड़ा निवेश शिक्षा में ही करना होगा। सही शिक्षा केवल रोजगार नहीं देती; वह बेहतर व्यक्ति, बेहतर समाज और अंततः बेहतर राष्ट्र का निर्माण करती है।