पाबूजी की फड़: लोकदेवता की महिमा और उनकी गाथा सँजोते भोपा
राजस्थान की मरुभूमि में लोकदेवताओं की गाथाएँ लोगों की आस्था और जीवन से गहराई से जुड़ी हैं। रामदेवजी, गोगाजी, तेजाजी, हड़बूजी और मल्लीनाथजी की तरह पाबूजी भी लोकमानस में प्रतिष्ठित हैं। उनकी महिमा को पीढ़ियों से जन-जन तक पहुँचाने वाली अनूठी परंपरा है—‘पाबूजी की फड़’। इसमें चित्र, गायन, वादन और कथावाचन मिलकर लोकदेवता का चरित्र सजीव कर देते हैं।
पाबूजी का संबंध पश्चिमी राजस्थान के कोलू गाँव और राठौड़ वंश से है। शोध साहित्य में उन्हें सामान्यतः चौदहवीं शताब्दी का वीर बताया जाता है। विद्वान जॉन डी. स्मिथ के अनुसार उनकी कथा का सबसे पुराना ज्ञात लिखित रूप सत्रहवीं शताब्दी की ‘मुहणोत नैणसी री ख्यात’ में मिलता है। उनकी स्मृति लिखित इतिहास, लोकसाहित्य और पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक परंपरा में सुरक्षित रही है।
वचनपालन और पशुधन की रक्षा के लिए बलिदान
पाबूजी के चरित्र का सबसे मार्मिक प्रसंग देवल चारणी के पशुधन की रक्षा से जुड़ा है। लोकगाथा के अनुसार देवल से केसर कालमी घोड़ी प्राप्त करते समय उन्होंने उनकी रक्षा का वचन दिया था। विवाह के दौरान पशुधन लूटे जाने का समाचार आया तो पाबूजी विवाह की रस्में छोड़कर अपना वचन निभाने निकल पड़े। पशुधन की रक्षा के लिए हुए संघर्ष में उन्होंने प्राण न्योछावर कर दिए। यही प्रसंग उन्हें वचनपालन, साहस और त्याग का आदर्श बनाता है।
उनकी गाथा में भतीजी के लिए ऊँटनियाँ लाने, साथियों के साहस और अलौकिक शक्तियों के प्रसंग भी आते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही लोकआस्था में ये प्रसंग पाबूजी की दिव्य सामर्थ्य और लोककल्याणकारी स्वरूप के साक्ष्य माने जाते हैं। श्रद्धालु उन्हें ऐसे लोकदेवता के रूप में पूजते हैं, जिन्होंने अपनी वीरता, वचनबद्धता और दिव्य शक्तियों से संकटग्रस्त लोगों तथा पशुधन की रक्षा की। पशुपालक राइका–रेबारी समुदाय के लिए पाबूजी विशेष श्रद्धा के केंद्र हैं। पशुधन की रक्षा उनके लिए परिवार की आजीविका की रक्षा भी है।
फड़: चित्रों में जीवनगाथा, स्वरों में आराधना
फड़ कपड़े पर बनी लंबी चित्रपटिका होती है, जिसमें पाबूजी, उनके साथी और जीवन के अनेक प्रसंग चित्रित रहते हैं। भीलवाड़ा–शाहपुरा क्षेत्र के पारंपरिक जोशी चित्रकार परिवार इसे तैयार करते आए हैं। श्रद्धालुओं के लिए फड़ पवित्र देवस्थान का स्वरूप है, जिसे भोपा अपने साथ गाँव-गाँव लेकर पहुँचते हैं।
परंपरागत प्रस्तुति में रात्रि के समय फड़ खोली जाती है और आराधना के बाद कथा गायन शुरू होता है। भोपा रावणहत्था बजाते हुए प्रसंग सुनाता है तथा भोपी गायन में साथ देती है। दीपक के प्रकाश में चित्रों के संबंधित हिस्से दिखाए जाते हैं। कथा, संगीत, नृत्य और श्रोताओं के संवाद से फड़ पर अंकित घटनाएँ जीवंत हो उठती हैं। इसी को प्रचलित भाषा में ‘फड़ बाँचना’ भी कहा जाता है।
भोपा–भोपी: पीढ़ियों से लोकधरोहर के संरक्षक
पाबूजी की फड़ गाने वाले पारंपरिक परिवार मुख्यतः नायक समुदाय से जुड़े हैं। ‘भोपा’ लोकदेवता के पुजारी, अनुष्ठानकर्ता और गायक की भूमिका का नाम भी है; राजस्थान की अन्य लोकदेवता परंपराओं में भी यह संबोधन मिलता है।
फड़ गायन में भोपी का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। शोधकर्ता एलिजाबेथ विकेट ने इस परंपरा में उनके प्रभावशाली गायन और स्त्री स्वर की विशेष भूमिका रेखांकित की है। भोपा–भोपी की जोड़ी मिलकर कथा की भावनात्मक गहराई श्रोताओं तक पहुँचाती है। परिवार में सुनने, अभ्यास करने और प्रस्तुतियों में भाग लेने से इसका ज्ञान अगली पीढ़ी तक पहुँचता है। अनहद फाउंडेशन द्वारा दर्ज राजू देवी का अनुभव बताता है कि उन्होंने यह कला अपने दादा-दादी और माता-पिता को सुनते हुए सीखी।
बदलते समय में आजीविका की चुनौती
इस गौरवशाली परंपरा को निभाने वाले अनेक कलाकार आज कठिन परिस्थितियों से जूझ रहे हैं। बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पारंपरिक संरक्षण में कमी और मनोरंजन के नए साधनों ने फड़ गायन के अवसर प्रभावित किए हैं।
चार मई 2025 की पीटीआई रिपोर्ट में चूरू के खाबरपुरा से जुड़े भोपा परिवारों की भूमिहीनता, आवास संबंधी कठिनाइयों और रोजगार के लिए पलायन का उल्लेख है। कुछ कलाकार जीविका चलाने के लिए रावणहत्थे पर फिल्मी गीत बजाने लगे हैं। रिपोर्ट में पारंपरिक आयोजनों की कमी और अगली पीढ़ी के कला से दूर होने की चिंता भी सामने आती है। ये अनुभव संबंधित परिवारों की स्थिति बताते हैं; पूरे समुदाय की परिस्थितियाँ एक जैसी नहीं हैं।
इन चुनौतियों के बीच कई परिवार परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। अनहद फाउंडेशन ने पुष्कर क्षेत्र में राजू देवी, जतीराम और उनके परिवार की प्रस्तुतियाँ दर्ज की हैं। मेलों तथा पारिवारिक आयोजनों में ऐसे कलाकार आज भी पाबूजी की महिमा गा रहे हैं।
इस धरोहर के संरक्षण के लिए कलाकारों को सम्मानजनक पारिश्रमिक, नियमित प्रस्तुति के अवसर और नई पीढ़ी को सीखने का सहयोग मिलना चाहिए। सांस्कृतिक संस्थाएँ, विद्यालय और सामाजिक संगठन भोपा–भोपी की प्रस्तुतियाँ आयोजित करके इस कार्य में योगदान दे सकते हैं। उनकी अनुमति से गाथाओं की रिकॉर्डिंग और कलाकारों को उचित श्रेय देना भी आवश्यक है।
पाबूजी की फड़ का वीडियो देखते समय चित्रों के साथ भोपा–भोपी के स्वर, कथावाचन और रावणहत्थे की धुन पर ध्यान दीजिए। इनमें राजस्थान की लोकआस्था, वचन की प्रतिष्ठा, पशुधन के प्रति संवेदना और पीढ़ियों की साधना एक साथ सुनाई देती है।
