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‘100% प्राकृतिक’ या ‘100% शुद्ध’ के दावों पर आंख मूंदकर भरोसा न करें: भ्रामक विज्ञापनों पर लगातार बढ़ रही सख्ती

प्रकाशित: 6 August 2026, 7:24 am अपडेट: 12 August 2026, 6:00 am

‘100% प्राकृतिक’ या ‘100% शुद्ध’ के दावों पर आंख मूंदकर भरोसा न करें: भ्रामक विज्ञापनों पर लगातार बढ़ रही सख्ती

नई दिल्ली। उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए खाद्य, आयुर्वेदिक, स्वास्थ्य और कॉस्मेटिक उत्पादों पर किए जाने वाले ‘100% प्राकृतिक’, ‘100% शुद्ध’, ‘100% ऑर्गेनिक’, ‘चमत्कारी’, ‘गारंटीड परिणाम’ जैसे दावों पर अब नियामक संस्थाएं लगातार सख्ती कर रही हैं। हाल ही में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने डाबर इंडिया के कुछ उत्पादों की बिक्री और प्रचार-प्रसार में प्रयुक्त कुछ दावों पर आपत्ति जताते हुए आवश्यक संशोधन के निर्देश दिए हैं। समाचारों के अनुसार कंपनी को पैकेजिंग एवं प्रचार सामग्री में बदलाव करने और नियमानुसार अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कहा गया है।

यह पहला अवसर नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न कंपनियों के भ्रामक विज्ञापनों और अतिरंजित दावों को लेकर FSSAI, केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA), आयुष मंत्रालय तथा अन्य नियामक संस्थाओं द्वारा समय-समय पर नोटिस, चेतावनी और कार्रवाई की गई है। कुछ मामलों में कंपनियों को अपने विज्ञापन वापस लेने, पैकेजिंग बदलने या दावों के समर्थन में वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत करने के निर्देश भी दिए गए। इसी प्रकार, कुछ प्रसिद्ध आयुर्वेदिक और स्वास्थ्य उत्पाद निर्माताओं के भ्रामक प्रचार को लेकर न्यायालयों तक भी मामले पहुंचे हैं और जिम्मेदार विज्ञापन पर जोर दिया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ‘100 प्रतिशत’ जैसे पूर्ण दावे तभी किए जाने चाहिए जब उनके समर्थन में वैज्ञानिक परीक्षण, वैधानिक स्वीकृति और पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हों। केवल आकर्षक शब्दों या प्रचार के आधार पर किसी उत्पाद को श्रेष्ठ या पूरी तरह सुरक्षित मान लेना उचित नहीं है।

उपभोक्ताओं के लिए भी यह आवश्यक है कि वे केवल विज्ञापन देखकर कोई उत्पाद न खरीदें। उत्पाद का लेबल, निर्माण तिथि, सामग्री (Ingredients), FSSAI लाइसेंस संख्या, निर्माता का विवरण, उपयोग संबंधी निर्देश और यदि उपलब्ध हो तो स्वतंत्र परीक्षण या प्रमाणन अवश्य देखें। यदि किसी उत्पाद के दावे असामान्य या अवास्तविक प्रतीत हों, तो उनके संबंध में आधिकारिक जानकारी प्राप्त करना बेहतर है।

उपभोक्ता अधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि भ्रामक विज्ञापन केवल अनुचित व्यापार व्यवहार का विषय नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य और उपभोक्ता विश्वास का भी प्रश्न है। इसलिए नियामक संस्थाओं की सख्ती के साथ-साथ उपभोक्ताओं की जागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है।